अविमुक्तेश्वरानंद जी आर्य समाज की चुनौती स्वीकार करो

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ज्योतिष पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी का कहना है कि प्रयागराज में 14 जनवरी से चलने वाले महाकुंभ के मेले के अवसर पर आर्य समाजियों, बौद्धों और जैनियों को भी डुबकी नहीं लगानी चाहिए, क्योंकि उनकी मान्यता है कि गंगा में डुबकी लगाने से किसी के पाप नहीं धुल जाते। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के इस कथन के पश्चात आर्य जगत के सुप्रसिद्ध विद्वान और क्रांतिकारी अंतर्राष्ट्रीय संत स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज ने उन्हें आर्य समाज की ओर से शास्त्रार्थ की चुनौती दी है। यह तो हम सभी जानते हैं कि शंकराचार्य जी स्वामी सच्चिदानंद जी की इस चुनौती को कभी स्वीकार नहीं करने वाले, क्योंकि उनके तरकश में इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए एक भी बाण नहीं है।

हम स्वामी शंकराचार्य जी को बहुत विनम्रता के साथ यह बताना चाहते हैं कि भारत की प्रत्येक सांस्कृतिक, सामाजिक या धार्मिक परंपरा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण रहा है। उसके कोई न कोई ऐतिहासिक कारण रहे हैं। समकालीन समाज के योगियों, संन्यासियों, महात्माओं के द्वारा या राज्य सत्ता के द्वारा या धर्माधिकारियों के द्वारा कोई भी सांस्कृतिक उत्सव ऐसे ही नहीं आरंभ कर दिया गया था, निश्चित रूप से उसके पीछे ऐसी पवित्र मान्यता और परंपरा रही है जो वैदिक संस्कृति के अनुकूल थी। किसी भी पर्व की वैदिक वैज्ञानिकता पर आर्य समाज को कभी कोई आपत्ति नहीं रही। आपत्ति ढोंग और पाखंड को लेकर रही है।

यदि बात महाकुंभ मेले की करें तो इसके आयोजन के पीछे भी वैज्ञानिक कारण रहा है। हम सभी जानते हैं कि हमारे ऋषि – महर्षि विद्वज्जन प्राचीन काल से ही धर्म की सूक्ष्म मान्यताओं, सिद्धांतों और उसकी परंपराओं को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अनेक प्रकार के शास्त्रार्थों का समायोजन करते रहते थे। इसके अतिरिक्त ऋषियों की चर्चाएं बड़ी-बड़ी सभाओं के माध्यम से होती रहती थीं। इन सभाओं में देश के गणमान्य ऋषियों और विद्वानों को आमंत्रित किया जाता था। कभी-कभी संपूर्ण विश्व के ज्ञानीजनों को इनमें आमंत्रित किया जाता था। जिससे कि सनातन की परंपराओं में जंग न लगने पाए। इस प्रकार के आयोजनों में ऋषि महर्षियों के द्वारा सनातन के सिद्धांतों की सटीक व्याख्या दी जाती थी। यदि बीते 12 वर्ष में उनमें कोई दोष आ गया होता था तो उनको भी ठीक करने का प्रयास किया जाता था। जिन्हें लोग सुनकर देश के कोने-कोने में ही नहीं, विश्व के कोने कोने में ले जाकर लोगों को बताया समझाया करते थे कि सनातन की मान्यताएं और सिद्धांत क्या हैं ? और यदि कहीं कोई दोष आ गया है तो उसको ठीक कर लिया जाए। इस प्रकार की परंपरा के चलते सारे संसार के सनातनी एक ही प्रकार की मान्यता और एक ही प्रकार के सिद्धांत से शासित ,अनुशासित और संचालित होते रहते थे। इस प्रकार ये मेले या महाकुंभ जैसे पर्व संपूर्ण भूमंडल के सनातनियों के मध्य समरूपता लाने के लिए आयोजित किए जाते थे।

इसी के दृष्टिगत अनेक उपनिषद लिखे गए। उनमें धर्म की मीमांसा सहित ज्ञान के सूक्ष्म बिंदुओं पर गहन चिंतन उभर कर सामने आता था। जिसे स्वीकृति प्रदान कर ऋषि कोई न कोई उपनिषद रच दिया करते थे।

वास्तव में यह सारा पुरुषार्थ सत्य के अनुसंधान के लिए होता था। जिसमें धर्म सत्ता और राज्य सत्ता के साथ-साथ ब्रह्म बल और क्षत्र बल दोनों का समन्वय रहता था। सृष्टि नियमों के विपरीत कोई नई परंपरा ना चल पड़े, इस बात के दृष्टिगत भी इन सभाओं का आयोजन किया जाता था। सनातन के सिद्धांतों के विपरीत कोई पाखंड न पनप जाए, इसके लिए भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे।

बस, यही वह कारण था जिसके चलते कुंभ मेले का आयोजन भी परंपरा में आ गया। कम से कम 6 वर्ष के अंतराल पर एक बार किसी रमणीक स्थान पर हमारे ऋषि महात्मा धर्म की चर्चा के लिए बैठा करते थे। यह उनके लिए परंपरा में अनिवार्य हो गया था। 6 वर्ष के अंतराल पर आने वाले इस कुंभ के मेले के अवसर पर देश के गणमान्य ऋषि महात्मा उपस्थित होकर धर्म की मीमांसा और चर्चा किया करते थे। सत्य सिद्धांतों पर खुलकर चिंतन होता था। कोई नई वेद विरुद्ध परंपरा तो न पनप गई है, इस पर भी चिंतन होता था। जबकि 12 वर्ष के अंतराल पर आने वाले महाकुंभ के अवसर पर संपूर्ण संसार के विद्वानों, ज्ञानियों, महात्माओं और ऋषियों को आमंत्रित कर इस चर्चा को और भी ऊंचाई दी जाती थी। महाकुंभ के आयोजन के इस इतिहासगत सत्य को हमें समझने की आवश्यकता है।

ऋषि महात्माओं के द्वारा जिस ज्ञानामृत की वर्षा वहां पर होती थी, उसमें डुबकी लगाकर अर्थात अज्ञान के अंधकार से अपने आप को मुक्ति दिलाकर जो लोग वहां से लौटते थे , वह अपने आप को धन्य समझते थे। कालांतर में यह परंपरा गंगा नदी के साथ जोड़ दी गई। इतना ही नहीं, अलग-अलग स्थानों पर होने वाले कुंभ के इस मेले के आयोजन को भी किसी स्थान विशेष से जोड़ दिया गया।

कितने दु:ख की बात है कि आज के शंकराचार्य अपने ऋषियों की मान्यता, उनके सिद्धांतों और उनकी परंपराओं के विपरीत आचरण करते हुए लोगों को गंगा मात्र में डुबकी लगाने से ही पापों से मुक्ति दिला रहे हैं । कहने का तात्पर्य है कि जो धर्म के रक्षक थे, वही धर्म में मिलावट करने वाले बन गए। लोगों को गंगा में डुबकी लगवाकर जीवन में किए गए शुभ अशुभ कर्मों का फल दिलवाने की घोषणा कर सनातन की मान्यताओं के विरुद्ध कार्य कर रहे हैं। वास्तव में यह लोगों की धार्मिक आस्था के साथ किया जाने वाला खिलवाड़ है। जबकि वह यह भली प्रकार जानते हैं कि किए गए कर्म का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। किसी स्थान विशेष पर जाकर किसी नदी विशेष में डुबकी लगा लेने से कर्म का फल समाप्त नहीं हो जाता। सनातन के इस सिद्धांत पर आज के शंकराचार्यों को बैठकर चर्चा करनी चाहिए। ऋषि परंपरा का निर्वाह करते हुए पाखंडों पर खुलकर चर्चा करें और सनातन के वैज्ञानिक स्वरूप की घोषणा करते हुए लोगों को बताएं कि सत्य क्या है ? यहां पर वेदानुकूल चर्चाओं में उपस्थित होकर लोग अपने आप को इसलिए धन्य समझें कि वह सत्य ज्ञान की चर्चा से निकलने वाले अमृत को हृदय में अंगीकृत कर वहां से लौट रहे हैं। आदि शंकराचार्य जी ने वैदिक धर्म के उद्धार के लिए अपने जीवन को खपा दिया था। वह मूर्ति पूजा के भी विरोधी थे। उन्होंने सनातन में आए देशों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया था, परंतु आज के शंकराचार्यों का क्या किया जाए ? इन्होंने तो आदि शंकराचार्य जी के पुरुषार्थ पर भी पानी फेर दिया है। ये उपचारक को ही भक्षक घोषित कर रहे हैं।

जब शंकराचार्यों के द्वारा भारत के सांस्कृतिक पर्वों, उत्सवों, मेलों आदि के बारे में सत्य को स्थापित किया जाएगा, तब हम समझेंगे कि हम सनातन की वास्तविक सेवा कर रहे हैं। आर्य समाज, जैन और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों को डुबकी लगाने से रोकने से काम नहीं चलने वाला। न ही यह कहकर काम चलने वाला कि ये लोग गंगा में डुबकी लगाने से पापों की मुक्ति नहीं मानते, इसलिए इनको भी डुबकी लगाने से रोक दिया जाए। इसके विपरीत काम तो सत्य को स्वीकार करने से चलेगा। इसके लिए आवश्यक है कि वहां पर सनातन की मान्यताओं और उसके सिद्धांतों को लेकर शास्त्रार्थों का आयोजन हो। सत्य के अनुसंधान के लिए व्यापक रूप से होने वाली इन चर्चाओं में जो सत्य निकल कर सामने आए, उसे सनातन के सिद्धांत के रूप में सबको मानने के लिए प्रेरित किया जाए। तभी आदि शंकराचार्य के पुरुषार्थ पर हम पुष्पांजलि अर्पित कर पाएंगे। अच्छा हो कि शंकराचार्य जी आर्य समाज की ओर से स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज की शास्त्रार्थ की चुनौती को स्वीकार करें और खुले दिल से यह उद्घोषणा जारी करें कि हम सत्य के अनुसंधान के लिए तत्पर हैं। क्या ऐसा साहस ज्योतिष पीठाधीश्वर शंकराचार्य कर पाएंगे ?

– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है)

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