शक्ति ही तो शांति का आधार है

“शक्ति ही तो शांति का आधार है ”। शांति स्थापित करने के लिए शक्तिमान बनना ही होगा । बार-बार आत्मसमर्पण को विवश होने से तो अच्छा है कि संगठन की शक्ति का शंखनाद हो और हिंदुओं में तेजस्विता का संचार हो । मुसलमानों के दिल में जगह बनाने के प्रयास में वर्षों से सक्रिय संघ प्रमुख भागवत जी क्या संघ के लाखों स्वयंसेवकों को बारंबार भ्रमित करके उनमें अपने प्रति कोई विद्रोह की भावना तो नहीं भड़का रहे हैं ?

जिस प्रकार किसी भी सेना की शक्ति उसके सेनापति में होती है और सेनापति की शक्ति भी वह सेना है उसी प्रकार झुंड की शक्ति भेड़िया है और भेड़िये की शक्ति झुंड है अर्थात सेनापति और सेना एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं । अतः शत्रु पर विजयी होने के लिये परस्पर सामंजस्य होना अति आवश्यक है । शास्त्रों और शस्त्रों को समयानुकूल सदुपयोग ही बुद्धिमत्ता होती है उसी प्रकार संगठन के कार्यकर्ताओं को भी साथ लेकर चलने में ही नेतृत्व की कुशलता है।

यह चिंता का विषय है कि राजनैतिक लाभ-हानि के विचार से हम बढते हुए इस्लामिक आतंकवाद और कट्टरवाद की आलोचना करने में घबराते है और आत्मनिंदा (हिन्दुत्व की निंदा) को पंथनिरपेक्षता मान कर मुस्लिम सांप्रदायिक कट्टरता को ही दुस्साहसी बना रहे हैं । हिन्दुत्व की रक्षार्थ हिन्दुओं की एकजुटता के सभी विरोधी हो जाते हैं परंतु आक्रामक मुस्लिम एकजुटता और कट्टरता पर कोई क्यों नहीं चिंता करता ? यह कैसी विडम्बना है कि पीड़ित हिन्दुओं का विरोध और जेहादियों से सहानुभूति को राष्ट्रवाद का रूप दिया जा रहा है ? जबकि यह सत्य है कि हिन्दुत्व सहिष्णुता का प्रतीक है पर सहिष्णुता की भी एक सीमा होती हैं । अतः जब राष्ट्रभक्ति के प्रवाह के बीच अवरोध उत्पन्न होगा तो अवरोध को भी अपनी प्रवृत्ति बदलने को विवश होना पड़ सकता है ।

हिन्दू राष्ट्र के स्वपन दृष्टा भाई परमानंदजी कहा करते थे कि “यह ठीक है कि मुसलमान पहले हिन्दू ही थे तथा वे हमारे समाज के ही अंग है, परंतु जिस प्रकार शरीर में दो प्रकार के कीटाणु होते हैं एक स्वास्थ के लिए व दूसरा रोग के लिए । उसी प्रकार ये रोग के कीटाणु हैं । जिस प्रकार स्वास्थ्य के कीटाणुओं को प्रबल करना आवश्यक है उसी प्रकार हिन्दू समाज का प्रबल होना भी आवश्यक है । इस देश की समस्या हिंदू-मुस्लिम एकता से नहीं समस्त हिन्दू समाज को एक झंडे तले लाकर ही सुलझेगी ।”

डॉ भीमराव अंबेडकर ने बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद भी अक्टूबर 1935 में लाहौर में आयोजित “जाति-पाति तोड़क मंडल” के एक कार्यक्रम में कहा था कि “हिन्दू संगठित नहीं बने तो एक दिन ऐसा आएगा जब उन्हें अपने समाज या जाति का कुछ भी बचा पाना सम्भव नहीं होगा । हिन्दू संगठन राष्ट्रीय कार्य है । वह स्वराज्य से भी अधिक महत्व का है । स्वराज्य का संरक्षण नहीं किया तो क्या उपयोग? स्वराज्य के रक्षण से भी स्वराज्य के हिन्दुओं का संरक्षण करना अधिक महत्त्व का है । हिंदुओं में सामर्थ्य नहीं होगा तो स्वराज्य का रूपांतर दासता में हो जाएगा ।”

भारतीय संस्कृति के उदार, सहिष्णु, अहिंसक, त्याग, क्षमा व दया आदि अनेक सकारात्मक तथ्यों को हम आत्मसात करके उसी अनुसार व्यवहार करते आ रहे हैं । लेकिन अपनी ही प्राचीन संस्कृति की अनमोल उक्तियों “जैसे को तैसा”, “हिंसक के आगे कैसी अहिंसा”, “दुर्जन के आगे कैसी सज्जनता”, “भय बिन होत न प्रीत” और “अन्याय एवं अत्याचार करने वालो का विरोध” आदि ऊर्जावान करने वाले अनमोल वाणी को भूलते रहे, परिणामत: हम हिन्दुओं को कायर, नपुंसक, दुर्बल, डरपोक व लालची आदि न जाने क्या-क्या समझा जाने लगा । क्या ऐसी विनम्रता से आक्रमकता का संगम हो सकता है? हमको बार-बार झुकाना नहीं झुकना सिखाया जाता है, क्यों?

अरब के सूखे रेगिस्तान में पला-बढा कट्टर लडाकू सम्प्रदाय है : “इस्लाम” ! इसमें रेगिस्तान के समान ही निर्ममता, संकीर्णता, असहिष्णुता और मजहबी कट्टरता है । मुसलमान इस्लाम में बने रहकर उनके सिद्धान्तों का त्याग नहीं कर सकता और उसके पालन का सीधा अर्थ है, युद्ध, विध्वंस और अशांति । वे कुरान को अल्लाह का संदेश समझते हैं, जिसका एक शब्द भी परिवर्तित या संशोधित नहीं किया जा सकता । मुसलमानों का पवित्रम धर्मग्रंथ कुरान घोषित करता है कि “काफ़िर तुम्हारे खुले शत्रु है” जबकि हिन्दू कहते हैं कि हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-इसाई सब हैं आपस में भाई-भाई ।

मुस्लिम संगठनों की ही व्यापक अड़ियल, अराजक, हिंसक व बर्बरतापूर्ण कार्यवाहियों के कारण जब धार्मिक आधार पर देश का विभाजन हुआ तो अब यह कहना कि भारत की अखंडता के लिये हिन्दू – मुस्लिम एक साथ आये, क्या इतिहास को भूला कर नकारना होगा? देश आज तक अपनी उन्हीं समस्याओं से जुझ रहा हैं । सन् 1947 के विभाजन का मुख्य ध्येय हिन्दू – मुस्लिम जनता की पूर्णतः अदला-बदली होना सुनिश्चित होते हुए भी उसे ठुकराया जाना तत्कालीन नेताओं की अदूरदर्शिता को भयंकर भूल मान कर मौन रहने को विवश कर देता है ।
जब तक काफ़िर – कुफ्र की रुग्ण मानसिकता प्राचीन अखंड भारत के मुस्लिम समाज को जिहाद के लिये उकसाती रहेगी तब तक मानवता और राष्ट्रवाद को सुरक्षित कैसे रख पायेंगे?

डी.एन.ए. एक शारीरिक जैविक परीक्षण होता है उससे शरीर के भौतिक गुणों की रचना का ज्ञान मिलता है। शांति, सौहार्द, एकता व स्वभाव आदि व्यवहारिक गुण तो केवल संस्कृति व संस्कारों के माध्यम से ही विकसित होते हैं। कौरवों व पांडवों का भी डीएनए एक ही था लेकिन संगत और संस्कारों के कारण उनके भी धर्म और अधर्म के लिए दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न हुए । इसलिए शांति व सौहार्द आदि को डीएनए के परीक्षण से नही जांचा जा सकता । अतः भारतीय संस्कृति व इस्लामिक संस्कृति के मूलभूत भेदों को मिटाये बिना सभ्यताओं के टकरावों को टाला जाना सरल नहीं होगा? ऐसे में रेगिस्तान की भूमि से उपजी इस्लामिक अमानवीय संस्कृति और भारत भक्ति के संस्कारों से निर्मित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घालमेल कैसे सम्भव हो पायेगा?
महात्मा कहे जाने वाले गांधी जी का एक पंक्ति में अहिंसा का सूत्र “वध होने के लिए स्वयं को हत्यारों के सम्मुख प्रस्तुत कर दो”, क्या स्वीकार्य होगा?

अल्पकालिक सामाजिक व राजनैतिक लाभ दीर्धकाल में विनाशकारी बन सकता है । ऐसे में समस्याओं के समाधान के स्थान पर सम्भवत अनगिनत संघर्षों का सामना करना पड़े तो कोई आश्चर्य नहीं होगा? जेहादियों की तैयारी ज़ारी है,जिनको हम शांतिदूत कहते हैं । अपना अस्तित्व सुरक्षित रखना है तो मित्र व शत्रु में भेद करना आना चाहिए । मुस्लिम नेताओं के जिहादी विचारों को बदला नही जा सकता जबकि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हमारे कुछ नेताओं के स्वार्थ सिद्ध होते ही विचारों में परिवर्तन आने लगता है।

जितना राष्ट्रवादी हिन्दू समाज मुसलमानों के लिये बाहें पसार रहा है उतना ही अधिक तेजी से भारत में मुस्लिम आतंकवादियों के स्लीपर सेल व ओवर ग्रांउड वर्कर के अतिरिक्त अब हाइब्रिड व पार्ट टाईम आतंकवादियों के नये नये रूपों के भी समाचार आने लगे हैं । आज हमारा राष्ट्र रूपी मंदिर आई.एस.आई व मुस्लिम आतंकवादियों के संगठनों के द्वारा घिरता जा रहा है । इनके जाल को फैलाने में मदरसे व मस्जिदे सहयोगी बने हुए है । किन्तु इनके विरूद्ध असरदार अभियान इसलिए नहीं चलाया जाता कि तथाकथित अल्पसंख्यक मतदाता नाराज हो जाएगा । ध्यान होना चाहिये कि हमारी सीमाओं पर निर्बाध गति से मस्जिदे व मदरसे अवैध रूप से बढ़ते जा रहे हैं और ये इस्लामिक आतंकवादियों के गढ़ बन चुके हैं । जिससे देश में अनेक आपराधिक व आतंकी षडयंत्रों का संचालन होता है। क्या ऐसे में विश्व का सबसे बड़ा अनुशासित व सामर्थ्यशाली संगठन आरएसएस अगर राष्ट्र की सीमाओं पर अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करता है तो यह उन समस्त घुसपैठियों, आतंकवादियों व भारतविरोधी शक्तियों के विरुद्ध राष्ट्र की रक्षा में एक बड़ा योगदान होगा।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये अतिवादी तत्व इसलिए बने हुए हैं, क्योंकि इनका पोषण करने वाला समाज अभी भी सक्रिय हैं । शासन-प्रशासन को इनके वैचारिक जिहादी दुष्प्रचारकों व उनसे सहानुभूति रखने वालों को भी पहचानना आवश्यक है । ऐसे कट्टरपंथियों को ढील देना संकट को निमंत्रण देना होगा । भारत भक्तों में जेहादियों के अत्याचारों के प्रति आक्रोश कौन भरेगा ?

लोकतांत्रिक व्यवस्था की ऐसी विडंबनायें जब भविष्य में राष्ट्र की संप्रभुता व अखंडता पर प्रहार करेगी तो प्रजा का कैसे और कौन बचाव करेगा ? क्या राष्ट्रीय हितों के लिए राजनैतिक स्वार्थो को त्यागना आवश्यक नहीं होगा? अतः शान्ति व मानवता की रक्षार्थ सभ्य समाज को भी इस्लामिक आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिये “शक्तिमान” बनना होगा।

विनोद कुमार सर्वोदय

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