shri ram

भारतीय संस्कृति में पर्वों को मनाने की लंबी परंपरा है । यही कारण है कि यहां पर्वों का बहुत बड़ा महत्व है । लोगों के हृदय में आस्था है,विश्वास है, श्रद्धा है,भक्ति है और समर्पण है । हमारे देश में एक कहावत प्रचलित है “बारह महीने तेरह त्योहार” इन सभी पर्वों के पीछे बहुत बड़ी वैज्ञानिकता छिपी हुई है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत पर्वों का देश है किन्तु इन पर्वों को मनाने के पीछे क्या उद्देश्य है ? किस पर्व की क्या विशेषता और लाक्षणिकता है ? यह जान लेना परम आवश्यक है । वैज्ञानिक तथ्य को न जानकर”कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा” वाली उक्ति अनेक स्थलों पर चरितार्थ होती दिखाई पड़ती है । कौन से पर्व की क्या विशेषता होती है ? इसको न जानकर किसी भी पर्व के साथ किसी भी प्रसंग को जोड़ देना और उसके मर्म को न समझना यह उस पर्व के खिलवाड़ है ।

संस्कृत के किसी नीतिकार ने ठीक ही कहा है –

“यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रोक्तं न करोति यः।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति।।”

न तो हम पर्वों की वैज्ञानिकता को सही ढंग से जानने का प्रयत्न करते हैं और न ही प्रमाण से युक्त ग्रंथ को देखने का प्रयत्न करते हैं । दीपावली पर्व को लेकर भी तरह-तरह की भ्रान्तियाँ फैली हुई है। सबसे बडी भ्रान्ति तो यह है कि क्या दीपावली के दिन भगवान राम चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात् अयोध्या लौटे थे ? क्या अयोध्या वासियों ने भगवान राम के लौटने की खुशी में इसी दिन दीपक जलाए थे और आनंदोत्सव मनाया था ? आदि । आज विश्व में जितनी भी भाषाओं में रामायण के ग्रंथ उपलब्ध हैं उन सभी में “वाल्मीकि रामायण” को सबसे प्राचीन और प्रामाणिक ग्रंथ के रूप में अधिकतर विद्वज्जन मानते और स्वीकारते हैं । आज जब व्यक्ति स्वयं को समझदार और बुद्धिजीवी मानता है तो लोगों की सुनी-सुनाई मनगढ़ंत बातों पर विश्वास क्यों कर लेता है ? मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भारतीय संस्कृति – सभ्यता के प्राण हैं ।

श्री राम को कहा गया है –

“रामो विग्रहवान् धर्मः”

अर्थात् प्रभु राम धर्म की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं । अगर हम धर्म को देखना चाहते हैं तो श्री राम के संपूर्ण जीवन को अवलोकन करने का प्रयत्न करें । उनका समग्र जीवन धर्म और मर्यादा से अनुप्राणित है । भारत सहित विश्व के अनेक देश जिस भगवान को श्रद्धा भाव से देखते और पूजते हैं उन्हीं के बारे में प्रामाणिक जानकारी न रखना बहुत बड़ी विडंबना है। “वाल्मीकि रामायण” को अवलोकन करने के पश्चात् यह स्पष्ट प्रतिभाषित होता है कि प्रभु श्री राम कार्तिक माह की अमावस्या को रावण का वध करने के पश्चात् अयोध्या नहीं लौटे थे । किष्किंधा कांड के अंतर्गत सर्ग २६ के श्लोक क्रमांक १४ में प्रभु राम सुग्रीव को निर्देश देते हुए कहते हैं कि –

“पूर्वोsयं वार्षिको मासः श्रावणः सलिलागमः ।
प्रवृत्ताः सौम्य चत्वारो मासा वार्षिकसंज्ञिताः ।।

अर्थात् हे सौम्य गुण वाले सुग्रीव ! यह जल प्रदान करने वाला श्रावण का महीना आरंभ हो चुका है और ये चार महीने वर्षा काल के हैं जिन्हें हम चातुर्मास के नाम से भी जानते हैं । यह समय युद्ध के लिए उचित नहीं है। इसी प्रसंग में श्लोक क्रमांक १५ में कहते हैं कि —

“नायमुद्योगसमयः प्रविश त्वं पुरीं शुभाम् ।
अस्मिन् वत्स्याम्यहं सौम्य पर्वते सहलक्ष्मण ।।

हे सुग्रीव ! यह युद्ध के लिए प्रस्थान करने का उचित समय नहीं है इसलिए तुम अपनी किष्किंधा पुरी में प्रविष्ट होकर रहो और मैं यहां पर अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ गिरी गुहा में रहूंगा।
इसी सर्ग के श्लोक क्रमांक १७ के अंतर्गत मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम सुग्रीव को निर्देश देते हुए कहते हैं कि-

“कार्तिके समनुप्राप्ते त्वं रावणवधे यत ।”

हे मित्र सुग्रीव कार्तिक महीने के आ जाने पर तुम रावण के वध के लिए यत्न करना।
किष्किंधा कांड के अंदर सर्ग क्रमांक ३० तथा श्लोक क्रमांक ६० के अंतर्गत प्रभु श्री राम अपने अनुज लक्ष्मण को शरद काल के आगमन पर क्षत्रियों की विजय यात्रा के पर्व का शुभ संकेत देते हुए जिस युद्ध नीति का परिचय प्रदान करते हैं वह उनके अद्भुत युद्धकला कौशल का परिचायक है।

“अन्योन्यबद्धवैराणां जिगीषूणां नृपात्मज ।
उद्योगसमयः सौम्य पार्थिवानामुपस्थितः। ।

हे सुमित्रानंदन ! परस्पर वैर रखने वाले और एक दूसरे पर विजय की इच्छा करने वाले राजाओं का युद्ध के लिए प्रस्थान करने का समय आ चुका है। अनुकूल समय को देखकर हमें भी यथाशीघ्र लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए विजय यात्रा का शुभारंभ कर देना चाहिए।
इतना ही नहीं जब महाराज दशरथ ने अपने कुलगुरु वशिष्ठ तथा अन्य गुरुजनों से निवेदन किया कि अब मैं वृद्ध हो चला हूं, मेरी आयु बहुत हो चुकी है ,जीवन के समस्त उपभोग्य पदार्थों का उपभोग कर चुका हूं । धन-धान्य से परिपूर्ण इच्छा अनुसार पर्याप्त दक्षिणा वाले सैकड़ो यज्ञ कर चुका हूं। ऐसी स्थिति में मैं अपने ज्येष्ठ पुत्र गुणवान् ,नीतिमान् ,धर्म परायण,विनम्रशील ,वेदवेदांग तत्वज्ञ राम को युवराज के पद पर अभिषिक्त करना चाहता हूं।
कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ ने समस्त अयोध्या वासियों की अभिलाषा को देखते हुए महाराजा दशरथ से निवेदन किया कि हे राजन्! पुष्पित पल्लवित वनों वाला, पुण्य प्रदान करने वाला यह चैत्र मास आ चुका है। राम के युवराज पद के लिए शास्त्रोक्त विधि से जिस-जिस तैयारी की आवश्यकता है उसे पूरी कर लीजिए । अयोध्या कांड के अंतर्गत तीसरे सर्ग के श्लोक क्रमांक ४ में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

“चैत्रः श्रीमानयं मासः पुण्यपुष्पितकाननः।
यौवराज्याय रामस्य सर्वमेवोपकल्प्यताम्। ।

उसके पश्चात् युद्ध कांड के अंदर सर्ग क्रमांक १२४ और श्लोक क्रमांक १ में यह स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है कि प्रभु श्री राम जिस चैत्र शुक्ल पंचमी के दिन युवराज के पद पर अभिषिक्त होने वाले थे। उसी चैत्र महीने की पंचमी की तिथि को महर्षि भारद्वाज मुनि के आश्रम में पहुंचकर जितेन्द्रिय प्रभु राम ने उनकी वंदना की। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रभु राम चैत्र महीने में ही अयोध्या से वनवास की ओर प्रस्थान किए थे और १४ वर्ष की अवधि पूर्ण होने पर चैत्र माह की पंचमी के दिन अयोध्या वापस आए थे । चैत्र महीने से लेकर चैत्र महीने के आने पर ही एक वर्ष का क्रम और 14 वर्ष का वनवास पूर्ण होता है न कि कार्तिक महीने में। इन प्रमाणों से यह निर्विवाद सिद्ध होता है कि भगवान राम चैत्र महीने में अयोध्या लौटे थे।कार्तिक महीने में अयोध्या लौटने की बातें सर्वथा अप्रासंगिक हैं।

पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पञ्चम्यां लक्ष्मणाग्रजः ।
भरद्वाजाश्रमं प्राप्य ववन्दे नियतो मुनिम्l

भारतीय परंपरा में पहले “दर्श” और “पौर्णमास” के अवसर पर बृहद् यज्ञ हुआ करते थे।आज हम जिसे दीपावली के नाम से जानते और मनाते हैं उसका प्राचीन और सुसंस्कृत वैदिक नाम है “शारदीय नवसस्येष्टि ” है। जिसका शाब्दिक अर्थ है “शरद् ऋतु में उत्पन्न विविध नई फसल से यज्ञ”। शरद् ऋतु में उत्पन्न फसल को सामूहिक ‌रुप से एक निश्चित तिथि पर अर्थात् कार्तिक अमावस्या के दिन यज्ञ करके, उसमें नई फसल को यज्ञ सामग्री में मिलाकर, पहला भाग देवताओं को अर्पित करने और भोग लगाने का नाम है “शारदीय नवसस्येष्टि”। गीता के अंदर भगवान श्री कृष्ण जी ने इसी मर्म को उद्घाटित किया और लोगों को यज्ञ शेष ग्रहण करने के लिए प्रेरित किया ।

“यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै: ।

इसलिए हम देखते हैं दीपावली के पावन अवसर पर घर – बाजार में नई फसलों की आवक अत्यधिक होती है जिनमें धान,मक्का,तिल,उड़द,बाजरा, कुटकी आदि प्रमुख हैं।
दीपावली का शाब्दिक अर्थ है ‘दीपों की अवली’ अर्थात् ‘दीपों की पंक्ति’ अधिक से अधिक मात्रा में दीपक जलाना और अंधकार को दूर कर चहुंओर प्रकाश फैलाना ही ‘दीपावली’ का पावन उद्देश्य है। अमावस्या ‘रात्रि और अन्धकार’ का प्रतीक है तो दीपक ‘प्रकाश’ और आशा का प्रतीक है। इसलिए उपनिषद् का ऋषि कहता है “तमसो मा ज्योतिर्गमय” मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने समाज में व्याप्त अज्ञान, अंधकार,अनाचार,पापाचार आदि को मिटा कर एक सुव्यवस्थित स्वस्थ समाज की स्थापना कर आदर्श प्रस्तुत किया था । रावण जैसे अत्याचारी अभिमानी का वध करके चैत्र माह में जब अयोध्या लौटे थे तब अयोध्या वासियों ने असंख्य दीप जलाकर उनका स्वागत सत्कार किया था। प्रभु हम सभी के अंदर विवेक और सामर्थ्य प्रदान करे कि हम दीपावली के इस रहस्य को समझ सकें और सर्वत्र प्रचारित-प्रसारित कर सकें। साथ ही दृढ़ संकल्प लें कि हम “हैप्पी दिवाली” “हैप्पी होली” के स्थान पर “शुभ दीपावली” और “शुभ होली” कहने व कहलाने का प्रयत्न करें।

“सत्य सनातन वैदिक धर्म की जय”

आचार्य प्रेम प्रकाश शास्त्री
गुरुकुल नवप्रभात वैदिक विद्यापीठ
ओडिशा

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