वैदिक संपत्ति – 256, वेदमंत्रों के उपदेश

वेदमंत्रों के उपदेश
(ये लेखमाला हम पं. रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक संपत्ति’ नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहें हैं)
प्रस्तुतिः देवेन्द्र सिंह आर्य (चेयरमैन ‘उगता भारत’)

गतांक से आगे …

दूसरे अन्न पशुओं को भी दिया जाता है, जिससे दूध और घृत की प्राप्ति होती है। तीसरे थोड़ा बहुत यज्ञशेषान प्रसाद के तौर पर रोज खाने का भी अभ्यास रक्खा जाता है, जिससे संकट के समय अन्न से भी निर्वाह किया जा सके। इसीलिए कहा गया है कि यज्ञशेष अन्त्र ही खाना चाहिये, अपने लिए पकाकर नहीं। तात्पर्य यह कि अनाज और शाकान्न आदि राजस आहार आर्यों की स्वाभाविक खुराक नहीं है। आयों का सात्विक आहार तो फल और दूध ही है, जो अर्थ और आहारसंग्रह के समस्त नियमों के अनुसार है और मोक्ष का सहायक है। इसीलिए शतपथ ब्राह्मण २।५।१६ में मिला है कि एतद्वै पय एवं अन्न मनुष्याणाम् अर्थात् यह दूध ही मनुष्य का अन्न है- आहार है। इसी तरह ऋवेद१०/१४६१५ में लिखा है कि स्वादो फलस्य जग्ध्वाय अर्थात् मोक्षमार्गी को सुस्वादु फलों का आहार करना चाहिये। यह बात आर्यों की आदिम सभ्यता के इतिहास से भी अच्छी तरह पुष्ट होती है। क्योंकि आदिम काल में तपस्वियों का आहार प्रायः फल फूल ही था, अन्न नहीं। वनस्थों के आहार का वर्णन करते हुए मनु लिखते हैं कि-

पुष्पमूलफलैर्वापि केवलैच तंयेत्सवा ।
कालपण्वः स्वयं शीणैर्वेसानसमते स्थितिः ।। (मनुस्मृति ६।२१)

अर्थात् पुष्प × मूल अथवा काल पाकर पके और स्वयं टपके हुए फलों से वानप्रस्थी निर्वाह करे। वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि रामचन्द्र, भरत, लक्ष्मण और सीता फलाहार करके ही तपस्वी जीवन निर्वाह करते थे। गुहराज के आतिथ्य करने पर रामचन्द्र कहते हैं कि-

कुशचीराजिनधरं फलमूलाशनं च माम् ।
विधिप्रणिहितं धर्म तापसं वनगोचरम् ।। (वाल्मीकि रा० अयोध्या० ५०/४४)

अर्थात् में कुशचीर पहने हुए, तापस भेष और मुनियों के धर्म में स्थित केवल फल फूल ही खाकर रह‌ता हूँ। भरत ने भी कहा है कि-

चतुर्दश हि वर्षाणि जटाचीरबरोम्यहम् ।
फलमूलाशनो बोर भवेयं रघुनन्दन ।। (वाल्मीकि रा० अयोध्या० ५०)

अर्थात् मैं भी चौदह वर्ष तक जटा धारण करके और फल फूल ही खाकर रहूंगा। लक्ष्मण भी कहते हैं कि-

आहरिष्यामि ते नित्य फूलानि च फलानि च ।
वन्यानि च तथान्यानि स्वाहार्हाणि तपस्विनाम् ।। (वाल्मीकि रा० प्रयोध्या० ३१।२६)

अर्थात् आपके लिए तपस्वियों के से वन्य पदार्थ लाकर दूंगा और में भी फल फूल ही खाकर रहूँगा। इसी तरह अयोध्याकाण्ड २७।१६ के अनुसार सीताजी भी कहती हैं कि फलमूलाशना नित्या भविष्यामि नः संतयः अर्थात् में सदैव फल फूल ही खाकर रहेंगी, इसमें सन्देह नहीं। इन प्रमाणों से ज्ञात होता है कि चौदह वर्ष तक फल फूल खाकर वृद्ध नहीं किन्तु जवान आदमी भी रह सकते थे और बड़े बड़े योद्धाओं के साथ युद्ध करके विजय प्राप्त करते थे। अब भी युक्तप्रान्त के बैसवाड़े में आम की फसल पर तीन महीने केवल आमों को ही खाकर लोग पहलवानी करते हैं। कहने का मतलब यह कि आर्यसभ्यता के उच्चादर्श के अनुसार मनुष्य का सूराक फल, फूल, दूध, यही ही है। अत्र तो यज्ञशेष पुरोडाश ही के नाम से खाया जाता था। पर जब खेती बड़ी और जंगलों का नाश हुआ तब लोग अन्नवाली जमीन का आश्रय करने लगे।

क्रमशः

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