सबसे पवित्र ग्रंथ नही हो सकता संविधान

राष्ट्रपति मुर्मु संविधान दिवस

भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान दिवस पर संसद के केंद्रीय कक्ष में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि संविधान सबसे पवित्र ग्रंथ है, क्योंकि हमने संविधान के जरिए सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के कई बड़े लक्ष्यों को हासिल किया है। संविधान निर्माताओं की प्रगतिशील और समावेशी सोच की छाप हमारे संविधान पर अंकित है। हालांकि, यह कहना गलत नहीं होगा कि संविधान सिर्फ एक कानूनी का ग्रंथ है, सबसे पवित्र ग्रंथ नहीं! क्योंकि पवित्र ग्रंथ तो वेद-पुराण, बाइबिल, कुरान आदि धार्मिक पुस्तकें हैं, जिनकी पंक्ति में किसी भी कानूनी दस्तावेज को खड़ा करना इन विश्वासों को खंडित करने जैसा है। दुनिया भर के संविधान इन आरोपों से परे नहीं हैं।

लिहाजा, राष्ट्रपति मुर्मू के इस विचार से पवित्र और पवित्रता शब्द के उपयोग पर एक नई बहस छिड़ना लाजिमी है। क्योंकि किसी भी धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था/वस्तुओं के लिए पवित्र शब्द का उपयोग करना, न तो भाषा सम्मत है, न ही न्यायसंगत! इससे विषयगत भ्रांतियां पैदा होती हैं। सच तो यह है कि भारत का संविधान सबसे पवित्र ग्रंथ नहीं, बल्कि सिर्फ एक कानूनी ग्रंथ है जो भेदभाव से परे नहीं है, इसलिए इसमें जनहित के नजरिए से व्यापक बदलाव अपेक्षित है! ऐसी मांगे समय-समय पर उठती आई हैं जिसे बहुमत द्वारा दबा दिया जाता है। इसलिए सर्वसम्मति वाले लोकतंत्र की जरूरत यहां ज्यादा है, क्योंकि यह विविधताओं में एकता वाला देश है। यहां के नियम-कानूनों में जाति-धर्म-भाषा-क्षेत्र आदि की बू नहीं आनी चाहिए, लेकिन ऐसा है!
वहीं, रही बात संविधान के पवित्र ग्रन्थ होने की तो यहां पर यह याद दिलाना जरूरी है कि पवित्र शब्द किसी ऐसी चीज़ का वर्णन करता है जो किसी देवता की सेवा या पूजा के लिए समर्पित या अलग रखी गई हो; जबकि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है। इसलिए पवित्र शब्द से इसकी उपमा दिया जाना न्यायोचित प्रतीत नहीं होता है। वैसे भी पवित्रता आध्यात्मिक सम्मान या भक्ति के योग्य मानी जाती है; या विश्वासियों के बीच भय या श्रद्धा को प्रेरित करती है । अमूमन, संपत्ति को वस्तुओं (एक “पवित्र कलाकृति” जिसे सम्मानित और आशीर्वाद दिया जाता है), या स्थानों (“पवित्र भूमि”) के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन इससे मतभिन्नता पैदा होती है।

आधुनिक लोकतंत्र के जन्मदाता फ्रांस के समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम ने पवित्र और अपवित्र के बीच के द्वंद्व को धर्मविशेष की केंद्रीय विशेषता माना है। क्योंकि “धर्म पवित्र चीजों से संबंधित विश्वासों और प्रथाओं की एक एकीकृत प्रणाली है, यानी अलग रखी गई और निषिद्ध चीजें।” दुर्खीम के सिद्धांत में, पवित्र समूह के हितों का प्रतिनिधित्व करता है, विशेष रूप से एकता, जो पवित्र समूह प्रतीकों में सन्निहित है, या मुसीबत से बाहर निकलने में मदद करने के लिए टीम वर्क का उपयोग करती है। दूसरी ओर, अपवित्र में सांसारिक व्यक्तिगत चिंताएँ शामिल हैं।

यह भी कड़वा सच है कि हमारा संविधान मनुस्मृति और चाणक्य के अर्थशास्त्र आदि व्यवस्थागत पुस्तकों का एक महज विस्तार भर है, जिसमें आधुनातन विचार शामिल किए गए हैं। यह इससे ज्यादा कुछ नहीं है! आप मानें या न मानें, लेकिन हमारा संविधान भी बहुमत पर आधारित एक सत्तागत प्रवृत्ति का द्योतक है जो सत्ता की प्रकृति के बदलते ही बदल जाएगी। भले ही इसमें सभी धर्मों/मतों की जरूरतें शामिल हैं, फिर भी इस्लाम मतावलंबियों द्वारा जिस तरह से सरिया कानून लागू करने की मांग उठ रही है, वह तो महज एक उदाहरण है। इसी तरह सनातन मतावलंबियों में भी वैदिक कानून लागू करने की मांग जोर पकड़ रही है, जो हिन्दू धर्म/सनातन मान्यताओं की परम्पराओं पर आधारित हों। वहीं, आदिवासी समुदाय की ओर से भी ऐसी मांगें उठी हैं। ऐसी मांगे भविष्य में सभी धर्मावलंबियों के द्वारा की जा सकती है। ऐसा किया जाना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि भारत के संविधान की रचना पश्चिमी देशों की मान्यताओं के अनुरूप की गई है, जो भारत के पुरातन संस्कारों से ज्यादा मेल नहीं खाती है। इसलिए इस पर एक स्वस्थ परिचर्चा अपेक्षित है।

वैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस मत से सहमत हुआ जा सकता है कि संविधान हमारी हर जरूरत और अपेक्षा पर खरा उतरा है, जो हमारा मार्गदर्शक है। देश में जब इमरजेंसी लगी तब भी संविधान ने लोकतंत्र की चुनौतियों का सामना किया और वह हर अपेक्षा पर खरा उतरा। परिवर्तन के दौर में संविधान गाइडिंग लाइट की तरह है जो रास्ता दिखा रहा है। उन्होंने स्वीकार किया है कि, विभिन्न मुद्दों पर संविधान सभा में लंबी बहस हुई थी और गम्भीर चर्चाएं हुई थी। लिहाजा, संविधान में ऐसी व्यवस्था की गई है कि उचित समय पर निर्णय लेते हुए इसकी व्याख्या की जा सकती है।

उनकी इस बात में भी दम है कि भारत की आकांक्षाएं समय के साथ नई ऊंचाई पर जाएंगी। इसलिए हमारा संविधान वर्तमान भारत और भविष्य का मार्गदर्शक है। इसने सभी चुनौतियों का समाधान करने का काम किया है और रास्ता दिखाया है। हालांकि, भारत के लोगों को क्वालिटी ऑफ लाइफ और गरिमामयी जिंदगी मिले, इसके लिए आर्थिक और सामाजिक न्याय अहम है। इसके लिए कुछ बदलाव अपेक्षित हैं। उन्होंने संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद को याद करते हुए ठीक ही कहा कि भारत को ईमानदार लोगों के समूह से ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। जो अपने हितों से आगे देश का हित रखेंगे। नेशन फर्स्ट की यही भावना भारत के संविधान को आने वाले कई सदियों को जीवंत बनाए रखेगी।

वहीं, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने भी ठीक ही कहा है कि भारत ने विभाजन की भयावहता, अशिक्षा, गरीबी और कमजोर लोकतांत्रिक व्यवस्था से लेकर एक आत्मनिर्भर, जीवंत लोकतंत्र और भू-राजनीतिक नेतृत्व कर्ता बनने तक का परिवर्तन कारी सफर तय किया है। इस बदलाव का श्रेय संविधान को है। इसलिए संविधान एक दस्तावेज भर नहीं है बल्कि यह जीने का तरीका बन चुका है और संविधान ने इस परिवर्तन में अहम भूमिका निभाई है। देश ने जो परिवर्तनकारी सफर तय किया है, उस यात्रा के पीछे भारत का संविधान है, जिसने यह परिवर्तन लाने में मदद की है। यह आज जीवन जीने का एक तरीका है, जिसका पालन किया जाना चाहिए। हालांकि, जिन लोगों की चिंता हमारा संविधान नहीं करता और बेतरतीब दलीलें संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक दी जाती हैं, उनकी चिंता भी इसमें शामिल करना होगा और संविधान संशोधन करने होंगे, अन्यथा इसके सर्वस्वीकार्यता पर सवाल खड़े होंगे ही।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि भारतीय संविधान एक जीवंत दस्तावेज है जो लोगों को मौलिक अधिकार और कर्त्तव्य का दायित्व देता है। वहीं सरकार को सुशासन के लिए नीतिनिर्देशक सिद्धांत भी देता है। यहां कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के काम में विभाजन है। फिर भी लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जब यह आरोप लगाते हैं कि बीजेपी और आरएसएस एससी, एसटी और ओबीसी के सामने खड़ी दीवार को और मजबूत कर रही है।और इसी क्रम में जब यह स्वीकार करते हैं कि उनकी पार्टी के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार में इस दीवार को कमजोर करने का काम जिस मजबूती से होना चाहिए, वह नहीं हुआ, तो संविधान व सरकार की सोच और सफलता दोनों पर सवाल उठना लाजिमी है।

बहरहाल, संविधान की संस्कृत भाषा के संस्करण का लोकार्पण प्रशंसनीय है, लेकिन संस्कृत के सर्वग्राही संस्कारों से इसे कब समृद्ध किया जाएगा, यह सवाल यक्ष प्रश्न बनकर समुपस्थित है। समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक जैसे इसके विचार व्यक्तिपरक होने चाहिए, दुर्भावना प्रेरित नहीं! इसलिए इसमें समसामयिक वाद-विवाद और संशोधन की गुंजाइश को सर्वसम्मत बनाया जाना चाहिए, बहुमत आधारित नहीं! वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवन्तु सुखिनः तभी सम्भव है, जब कानूनी भेदभाव तार्किक हो, परम्परागत नहीं!

– कमलेश पाण्डेय

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