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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

स्वतंत्रता सैनानी, गौ प्रेमी लाला हरदेवसहाय जी

आपका जन्म 26 नवम्बर सन 1892 ई० में हिसार शहर के निकटतम गांव सातरोड़ खुर्द के एक सर्व सम्पन्न अग्रवाल परिवार में ला. मुसद्दीलाल के यहां हुआ । आपका पालन – पोषण घर की सम्पन्नता के कारण बहुत अच्छे तथा अमीराना ढंग से हुआ । आपकी शिक्षा हिन्दी के माध्यम से हुई और उसके बाद आपने संस्कृत में शास्त्री परीक्षा तक पढ़ाई की । आप अंग्रेजी तथा उस जमाने में सरकारी दैनिक काम काज में इस्तेमाल होने वाली उर्दू भाषा के भी अच्छे ज्ञाता थे । आपकी रुचि आरम्भ से ही सूजबूझ वाली आयु में प्रवेश करते ही देखकर एक पाठशाला स्थापित की । साहित्यिक तथा अध्ययनशील थी आपने गांव में शिक्षा के अभाव को सन 1920-21 में जब भारत में गांधी युग आरम्भ हुआ , तो आपका हृदय भी देश व समाज सेवा के लिए हिलोरें लेने लगा । सन 1921 में महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में असहयोग नाम का जो प्रथम अहिंसात्मक स्वतन्त्रता का आंदोलन छिड़ा , उसमें आपने बहुत उत्साहपूर्वक भाग लिया , जिस पर आपको एक साल सख्त कैद की सजा हुई , जो कि आपने मियांवाली [अब पाकिस्तान] जिला जेल में काटी। जेल जीवन में आपको स्वामी श्रद्धानन्द जी के सानिध्य में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । उनकी प्रबल प्रेरणा से अपने इलाके में हिन्दी शिक्षा – प्रसार की धुन लेकर बाहिर निकले।

सन 1923 में आपने अपने अनन्य सहयोगी पंडित ठाकुरदास भार्गव के सहयोग में जिला हिसार में हिन्दी प्रसार तथा शिक्षा अभाव की पूर्ति के लिए ” विद्या प्रचारिणी सभा ” की स्थापना की। इस सभा के प्रबन्ध में लगभग 70 प्राथमिक पाठशालायें, सातरोड़ खुर्द में एक मिडल स्कूल तथा ला . लाजपतराय के नाम से एक शिल्प विद्यालय भी जारी किया गया। वास्तव में सभा के मन्त्री के नाते सारा कार्यभार तो आपके ही कन्धों पर रहता था। विद्या प्रचारिणी सभा की पाठशालायें नाम को तो केवल हिन्दी पाठशालायें थीं , लेकिन वास्तव में यह भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय जन जागरण, नवचेतना और समाज सेवा के केन्द्र थे। इनमें कार्यरत अध्यापक लोग गांधी जी के विचार के कर्मठ प्रचारक थे । अध्यापकों तथा विद्यार्थियों के लिए खादी प्रयोग का नियम था। हरिजन बच्चों के साथ समानता का व्यवहार तथा विशेष सहायता का प्रबन्ध था । इन पाठशालाओं में दैनिक जीवन में काम आने वाली दवाईयां भी रखी जाती थीं और प्रत्येक पाठशाला में एक छोटा सा पुस्तकालय भी होता था, जिनमें देश सेवा की प्रेरणा में परिपूर्ण पुस्तकें तथा छोटे – मोटे समाचार पत्र भी उपलब्ध थे। इन पाठशालाओं ने कितने अध्यापक तथा ऐसे नवयुवक तैयार किये, जिन्होंने समय – समय पर चलने वाले स्वाधीनता आंदोलनों में सक्रिय रूप से बढ़ कर भाग लेते हुए जेलों की यातनायें झेलीं। सातरोद खुर्द मिडल स्कूल तथा ला लाजपतराय शिल्पशाला तो एक प्रकार से स्वाधीनता संग्राम के लिये कार्यकर्ता तैयार करने का मुख्य शिक्षण केन्द्र था। ला. हरदेव सहाय जी स्वयं भी इसी स्कूल में एक छोटी सी कुटिया में लम्बे समय तक निवास करते रहे।

ग्राम सेवा मण्डल तथा ग्राम सेवक ग्रामीण जनता की विशेष सेवा करने हेतु लाला जी ने अपने परम सहयोगी मित्र स्वर्गीय बाबू ठाकुरदास जी भार्गव व अन्य देश भक्त साथियों के सहयोग से सन 1930 में एक नई संस्था ” ग्राम सेवा मण्डल ” की स्थापना की । इस संस्था ने अपने सम्मेलनों तथा प्रचारकों द्वारा गांवों में एकता, शिक्षा, गौ सेवा, खादी प्रचार, स्वदेशी, नशा व बाल विवाह निषेध इत्यादि विषयों का भरसक प्रचार किया । ग्राम सेवा मण्डल के उद्देश्यों का विशेष प्रचार तथा ग्रामीण जनता में जागृति करने के लिए हिन्दी भाषा में पाक्षिक ” ग्राम – सेवक ” अखबार निकाला गया , जो सन 1936 से 1942 तक पंजाब सरकार के बार – बार जमानतें मांगने के प्रहारों का मुकाबला करता हुआ , बराबर चलता रहा । इसी पत्र को कुछ समय बाद किन्हीं कारणों से ‘ सेवक ‘ नाम से भी जारी रखा गया । उन्होंने सन 1938-40 में जब जिला हिसार में भयंकर अकाल पड़ा तो भूख से तड़फते लाखों इन्सानों तथा हजारों गायों व मूक पशुओं के प्राण बचाने के लिये जिला कांग्रेस कमेटी के अल्प साधनों के माध्यम से जो सहायता कार्य किया , उसे तो स्वयं अंग्रेजी सरकार तथा उच्च अंग्रेज अधिकारियों ने भी भरपूर प्रशंसा भरे शब्दों में सराहाया था । सन 1940-41 में जब गांधी जी ने देश में व्यक्तिगत सत्याग्रह का बिगुल बजाया , तब आपने जिला कांग्रेस के महामंत्री के रूप में इस सारे सत्याग्रह का संचालन बहुत ही अच्छे ढंग पर चलाया । जिला प्रशासन को अग्रिम सूचना दी । जाती थी कि कौन सत्याग्रही , किस तिथि को , किस स्थान पर , किस समय सत्याग्रह करेगा । सारा सत्याग्रह बिना किसी गड़बड़ या उपद्रव के बहुत सुन्दर व सुखद ढंग से चलता रहा ।

भारत छोड़ो आन्दोलन में जेल यात्रा

सन 1942 में जब ” अंग्रेजो ! भारत छोड़ो आंदोलन का बिगुल बजा तो लाला जी के सभी सहयोगी इस स्वतन्त्रता संग्राम में कूद पड़े । सरकार ने अपना दमन चक्र चलाते हुए जिला कांग्रेस कार्यालय , विद्या प्रचारिणी सभा , ग्राम सेवा मण्डल तथा ‘ ग्राम सेवक ‘ अखबार आदि सभी संस्थाओं पर कब्जा करके ताले लगा दिये । इन संस्थाओं से सम्बन्धित बहुत से कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया । लाला जी आंदोलन का प्रचार करते नगर में एक सार्वजनिक सभा में भाषण करने के तुरन्त बाद गिरफ्तार कर सिरसा लाये गये और उन्हें सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट की अदालत ने दिनांक 28 अगस्त 1942 को एक साल सख्त कैद की सजा सुनाई । यह कारावास आपने ओल्ड सेन्ट्रल जेल मुलतान में बिताया । लाला जी कारावास बिता कर सन 1943 में जेल से मुक्त हुए और थोड़े समय पश्चात् आपने पुन : अपनी संस्थाओं के माध्यम से जन सेवा का कार्य आरम्भ कर दिया । स्वतन्त्रता प्राप्ति तक आप इन संस् का कार्य करते हुए , गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रम में व्यस्त रहे ।

गो – सेवा जीवन का मिशन बना

स्वतन्त्रता प्राप्ति के साथ ही जब देश का नया विधान बनाने के लिये , विधान सभा बैठी तो लाला जी ने भारतीय संविधान में गो – रक्षा सम्बन्धी धारा जोड़ने के लिये आंदोलन उठाया । इस आंदोलन में स्व ० पंडित ठाकुरदास नामधारी गुरु श्री प्रतापसिंह तथा दूसरे प्रसिद्ध गो – भक्तों के सहयोग से तथा स्वर्गीय राष्ट्रपति बाबू राजेन्द्रप्रसाद जी के आशीर्वाद से संविधान के निर्देशक तत्वों के अनुच्छेद में 48 वीं धारा सम्मलित कर ली गई , जिसमें गोहत्या बन्दी का पवित्र सिद्धान्त समाविष्ट हुआ । इतना कुछ होने पर भी देश में पूर्णतया गोहत्या बन्द नहीं की गई , तब लाला जी अपना गाँव सातरोड़ खुर्द छोड़कर सन 1948 में दिल्ली में ही आ बैठे और अपने परम सहयोगियों के सहयोग से “ भारत गो – सेवक समाज ” नामक एक मजबूत संगठन की स्थापना की । देश में पूर्ण गोहत्या निषेध के लिए अनेक सम्मेलन किये । आवेदन पत्र व शिष्ट मण्डल भेजे , परन्तु हमारी सरकार ने कोई ध्यान न दिया । लाला जी का हृदय रो उठा । उन्होंने अपने दिल में निश्चय कर लिया कि इस कार्य की सम्पन्नता के लिये अब कुछ करना ही पड़ेगा । उन्होंने गोहत्या आंदोलन चलाया और कई बार जेल गये । 30 सितम्बर 1962 को लाला जी का निधन हो गया ।

लेखक :- श्री रामसिंह जाखड़
पुस्तक :- स्वतंत्रता संग्राम में हरियाणा का योगदान
प्रस्तुतकर्ता :- अमित सिवाहा

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