ध्यान का प्रपंच और भोली -भाली जनता* *भाग-4*

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विशेष : आजकल आपको अधिकांश बड़े शहरों में ध्यान केंद्र और ध्यान गुरु मिलेंगे ,लेखी। ये ध्यान के नाम पर अपनी दुकान चला रहे है।ध्यान की स्थिति तक पहुंचने से पहले साधक को किस किस स्थिति से गुजरना होता है ,ये नहीं बताया जाता।
ये लेख माला 7 भागों में है ,जो वैदिक विद्वानों के लेख और विचारों पर आधारित है। जनहित में आपके सम्मुख प्रस्तुत करना मेरा उद्देश्य है , कृपया ज्ञानप्रसारण के लिए शेयर करें और अपने विचार बताए।
डॉ डी के गर्ग

योग का चौथा अंग – प्राणायाम

प्राण और मन का घनिष्ठ सम्बन्ध है।जहां-जहां प्राण जाता है,वहां-वहां मन भी जाता है।यदि प्राण वश में हो जाए तो मन बिना प्रयास के स्वयं वश में हो जाता है। प्राणायाम क्या है? महर्षि पतंजलि लिखते हैं- तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम:। -यो० द० साधन० ४९
आसन सिद्ध होने पर श्वास और प्रश्वास की गति को रोकने का नाम प्राणायाम है। महर्षि मनु ने प्राणायाम की महत्ता के सम्बन्ध में लिखा है- दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मला:। तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषा: प्राणस्य निग्रहात्।। -मनु० ६/७१
जैसे अग्नि में तपाने से स्वर्णादि धातुओं के मल नष्ट होकर वे शुद्ध हो जाते हैं,वैसे ही प्राणायाम के द्वारा मन आदि इन्द्रियों के दोष दूर होकर वे निर्मल हो जाती हैं।
प्राणायाम से ज्ञान का आवरण, जो अज्ञान है, नष्ट होता है। ज्ञान के उत्कृष्टतम स्तर से वैराग्य उपजता है।
प्राणायाम के नाम पर जो कपाल-भाति, अनुलोम-विलोम आदि क्रियाएं करवाई जाती है ,ये प्राणायाम नहीं अपितु
श्वसन क्रियाएं हैं। ये क्रियाएं, हमें अनेकों रोगों से बचा सकने में सक्ष्म है, परन्तु इन्हें अपने आहार-विहार को सूक्ष्मता से जानने-समझने व जटिल रोगों में आयुर्वेद की सहायता लेने का विकल्प समझना हमारी भूल होगी।
योग साधना में प्राणायाम एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण व आवश्यक क्रिया है। प्राणायाम में प्राणों को रोका जाता है। प्राणायाम चार ही हैं, जो, पतंजलि ऋषि ने अपनी अमर कृति योग दर्शन में बताए हैं।
पहला प्राणायाम– फेफड़ों में स्थित प्राण को बाहर निकाल कर बाहर ही यथा सामर्थ्य रोकना और घबराहट होने पर बाहर के प्राण अर्थात वायु को धीरे-धीरे अन्दर ले लेना।
दूसरा प्राणायाम– बाहर के प्राण को अन्दर अर्थात् फेफड़ों में लेकर अन्दर ही रोके रखना और घबराहट होने पर रोके हुए प्राण को धीरे-धीरे बाहर निकाल देना।
तीसरा प्राणायाम– प्राण को जहां का तहां अर्थात् अन्दर का अन्दर व बाहर का बाहर रोक देना और घबराहट होने पर प्राणों को सामान्य चलने देना।
चौथा प्राणायाम– यह प्राणायाम पहले व दूसरे प्राणायाम को जोड़ करके किया जाता है। पहले तीनों प्राणायामों में वर्षों के अभ्यास के पश्चात, कुशलता प्राप्त करके ही, इस प्राणायाम को किया जाता है।

प्राणों को अधिक देर तक रोकने में शक्ति न लगाकर, विधि में शक्ति लगायें और कुशलता के प्रति ध्यान दें। प्राणों के रोके रखने को घबराहट होने से पहले अन्दर ले लेने अथवा बाहर छोड़ देने से प्राणायाम का वास्तविक लाभ नहीं मिलता।
प्राणायाम हमारे शरीर के सभी SYSTEMS को तो व्यवस्थित रखता ही है इससे हमारी बुद्धि भी अति सूक्ष्म होकर मुश्किल विषयों को भी शीघ्रता से ग्रहण करने में सक्षम हो जाती है। प्राणायाम हमारे शारीरिक और बौद्धिक विकास के साथ-साथ हमारी अध्यात्मिक उन्नति में भी अत्यन्त सहायक है। प्राणायाम द्वारा हमारे श्वसन तंत्र की कार्य क्षमता बढ़ती है। यदि मात्र प्राणायाम-काल को दृष्टिगत रखें, तो उस समय अधिक प्राण का ग्रहण नहीं होता। प्राणायाम के समय तो श्वास-प्रश्वास को रोक दिया जाता है, फलत: वायु की पूर्ति कम होती है, किन्तु प्राणायाम से फेफड़ों में वह क्षमता उत्पन्न होती है कि व्यक्ति सम्पूर्ण दिन में अच्छी तरह श्वास-प्रश्वास कर पाता है।
प्राणायाम को प्रतिदिन प्रयाप्त समय देना चाहिए। कुछ विद्वान मानते हैं कि हमें एक दिन में इक्कीस प्राणायाम से अधिक नहीं करने चाहिए। परन्तु, अन्य ऐसी बातों को अनावश्यक मानते हैं। प्राणायाम करते समय प्रभु से प्रार्थना करें कि हे प्राण प्रदाता! मेरे प्राण मेरे अधिकार में हों। प्राण के अनुसार चलने वाला मेरा मन मेरे अधिकार में हो।
प्राणायाम करते समय मन को खाली न रखें। प्राणायाम के काल में निरन्तर, मन्त्र ओम् भू: अर्थात् ईश्वर प्राणाधार है, ओम् भूव: अर्थात् ईश्वर दूखों को हरने वाला है, ओम् स्व: अर्थात् ईश्वर सुख देने वाला है ओम् मह: अर्थात् ईश्वर महान है, ओम् जन: अर्थात् ईश्वर सृष्टि कर्त्ता है व जीवों को उनके कर्मों के अनुसार उचित शरीरों के साथ संयोग करता है।, ओम् तप: अर्थात् ईश्वर दुष्टों को दुख देने वाला है, ओम् सत्यम् अर्थात् ईश्वर अविनाशी सत्य है, का अर्थ सहित जप करें।
प्राणायाम का मुख्य उद्देश्य मन को रोककर आत्मा व परमात्मा में लगाना एवं उनका साक्षात्कार करना है, ऐसा मन में रखकर प्राणायाम करें।
प्राणों को रोकने के अपने सामर्थ्य को धीरे-धीरे धैर्य पूर्वक बढ़ाना चाहिए।
उदाहरण के लिए बहुत लोग बहुत-बहुत देर तक सांस रोके रखते हैं, सरिया आदि मोड़ते हैं, किन्तु ऐसा नहीं कि उन सबका अज्ञान नष्ट होकर उन्हें विवेक-वैराग्य हो जाता हो। यदि प्राण को या सांस को तो रोक दिया, परन्तु मन पर ध्यान नहीं दिया, तो अज्ञान इस प्रकार नष्ट नहीं होता।
प्राणों के स्थिर होते ही मन स्थिर हो जाता है। स्थिर हुए मन को कहां लगायें? एक साधारण उदाहरण से भी समझे ,यदि आप पैसे में मन को लगायें, तो पैसा मिलता है। इसी प्रकार परमात्मा में मन लगाने से ईश्वर साक्षात्कार हो जाता है।
जो, यह कहता है कि मन वश में नहीं आता तो, इसका अर्थ यह है कि आत्मा या परमात्मा में उसकी रुचि या श्रद्धा नहीं है। टी.वी. का मनपसन्द सीरियल हम एक-दो घण्टे तक मनोयोग पूर्वक कैसे देख पाते हैं, यदि मन हमारे वश में न होता! इसका सीधा सा अर्थ है कि हमारा मन पर नियन्त्रण का अभ्यास तो परिपक्व है, किन्तु यह केवल सांसारिक विषयों में ही है। अत: हमें मनोनियन्त्रण की शक्ति को केवल परिवर्तित विषय पर लगाने की आवश्यकता है अर्थात इसका केन्द्र आत्मा और परमात्मा को ही बनाना है।
महर्षि दयानन्द लिखते हैं कि जैसे धार्मिक न्यायाधीश प्रजा की रक्षा करता है, वैसे ही प्राणायामादि से अच्छे प्रकार सिद्ध किये हुए प्राण योगी की सब दुखों से रक्षा करते हैं।

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