ध्यान का प्रपंच और भोली -भाली जनता* *भाग-3*

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विशेष : ये लेख माला 7 भागों में है ,जो वैदिक विद्वानों के लेख और विचारों पर आधारित है। जनहित में आपके सम्मुख प्रस्तुत करना मेरा उद्देश्य है , कृपया ज्ञानप्रसारण के लिए शेयर करें और अपने विचार बताए।
डॉ डी के गर्ग

योग का तीसरा अंग;आसन

अष्टांग योग के पहले दो अंग यम और नियम आचरण और सदाचार से सम्बंधित थे और तीसरा अंग अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रेरित करता है। शायद आजकल आसन को योग का पर्याय और आसन का मुख्य उद्देश्य शरीर को रोग मुक्त करना माना जाने लगा है। आसन करने पर गौण रूप से शारीरिक लाभ भी होते हैं। परन्तु आसन का मुख्य उद्देश्य प्राणायाम, धारणा, ध्यान और समाधि हैं। जिस शारीरिक मुद्रा में स्थिरता के साथ लम्बे समय तक सुखपूर्वक बैठा जा सके, उसे आसन कहा गया है।
आसन शब्द की सही व्याख्या को लेकर अनेको भ्रांतिया है,और योग शिक्षकों की भरमार है जो अच्छे स्वास्थ्य के लिए शारीरिक क्रियाएं करवाते है। किसी भी शारीरिक व्यायाम की क्रिया को आसन कह देना ठीक नहीं है।
महर्षि पतंजलि के अनुसार आसन का अर्थ है- स्थिरसुखमासनम्। -यो० द० साधन० ४६ शरीर न हिले,न डुले,न दुखे और चित्त में किसी प्रकार का उद्वेग न हो,ऐसी अवस्था में दीर्घकाल तक सुख से बैठने को आसन कहते हैं। साधक को ऐसे आसन में बैठना चाहिए जिसमें उसे कष्ट न होकर स्थिर सुख की प्राप्ति हो। क्योंकि आसन के दृढ़ होने पर उपासना सरल हो जाती है।एक आसन में निश्चलतापूर्वक बैठने से श्वास-प्रश्वास की गति संयत होने लगती है और मन भी लय होने लगता है।आसन निरन्तर अभ्यास से ही सिद्ध किया जा सकता है।बिना हिले-डुले तीन घण्टे तक एक ही आसन में बैठना आसनजय कहलाता है।आसनजय के पश्चात् साधक योग के श्रेष्ठ और गुरुतर विषय प्राणायाम की ओर अग्रसर होने लगता है।
योगसाधना के लिए मुख्यासन चार हैं–सिद्धासन, पद्मासन, स्वस्तिकासन और सुखासन।
आजकल आसन को योगासन के रूप में ज्यादा जाना जाता है जो की गलत है ,मूल शब्द आसन ही है। क्योकि ये योग का तीसरा अंग है इसलिए मिलकर योगासन बन गया।
आसन के अभ्यास की आवश्यकता क्यों है ,इसका उत्तर है कि ध्यान के लिए स्थिर होकर बैठना आवश्यक है। मन को अगतिशील ईश्वर में लगाना तभी सम्भव है, जब हम अपने शरीर को स्थिर अथवा अचल करें। अचलता से ही पूर्ण एकाग्रता मिलती है। उछलते, कूदते-नाचते हुए मन को पूरा रोकना, पूर्ण एकाग्र करना सम्भव ही नहीं है।अतः जो आसन साधक को एकाग्रचित्त होने में मदद करे वह आसन कहलायेगा।
योग सूत्र 1.2 में कहा गया है: “योगस् चित्त वृत्ति निरोधः,” यानि ,”योग मन के उतार-चढ़ाव का निरोध है।” यह सूत्र मन पर नियंत्रण रखने और यह पहचानने में सक्षम होने के महत्व पर बल देता है कि मन में जो कुछ भी है वह मन के भीतर ही है। मनुष्य के इंद्रियां मन के अधीन है.मन चंचल है जिसके नियंत्रण की आवश्यकता है।

महर्षि पतंजलि के अनुसार पाँच प्रकार के मानसिक उतार-चढ़ाव (या वृत्तियाँ) हैं जो हमें अपने मन के कामकाज को बेहतर ढंग से समझने में मदद करते हैं। उनका कहना है कि ये पाँच वृत्तियाँ दर्दनाक या गैर-दर्दनाक हो सकती हैं।
चित्त का स्वरूप :-
चित्त अन्तः करण का ही एक अंग है जिसमें हमारे सभी संस्कारों, स्मृतियों का संग्रह होता है। यह चित्त सत्त्वगुण, रजोगुण, और तमोगुण से मिलकर बना एक पदार्थ है। जिससे चित्त तीन प्रकार के स्वभाव वाला ( प्रकाशशील, गतिशील, और स्थैर्यशील ) अर्थात त्रिगुणात्मक होता है।

इसी त्रिगुणात्मक स्वभाव के कारण चित्त के तीन रूप होते हैं;- 1. प्रख्या, 2. प्रवृति, और 3. स्थिति ।

‘प्रख्या’ सत्त्वगुण प्रधान, ‘ प्रवृत्ति’ रजोगुण प्रधान, व ‘स्थिति’ तमोगुण प्रधान होती है।

‘प्रख्या’ :- जब चित्त में सत्त्वगुण की प्रधानता होती है तो उसमें ज्ञान का प्रकाश होने से व्यक्ति में धर्म, ज्ञान, और वैराग्य की उत्पत्ति होती है। इस अवस्था में व्यक्ति शुभ कार्यों में प्रवृत ( अग्रसर ) रहता है।
‘प्रवृत्ति’ :- जब चित्त में रजोगुण की प्रधानता होती है तो व्यक्ति श्रमशील स्वभाव वाला होता है । जिसके फलस्वरूप वह समाज में मान– सम्मान, धन– दौलत, यश– कीर्ति को प्राप्त करने में प्रवृत्त रहता है।
‘स्थिति’ :- जब व्यक्ति के चित्त में तमोगुण प्रधान होता है तो वह आलस्य, प्रमाद, तंद्रा, अज्ञान, व अकर्मण्यता आदि भावों में प्रवृत्त होता है। इस अवस्था में वह अज्ञानता के वशीभूत होकर सभी निकृष्ट ( निषेध ) कार्य करता है ।
आशा है कि आपको आसन की सही व्याख्या स्पष्ट हो गई होगी।

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