ओ३म् “वेदज्ञान और वेदानुकूल आचरण से ही मनुष्य धार्मिक बनता है”

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धार्मिक मनुष्य के विषय में समाज में अविद्या पर आधारित अनेक आस्थायें व असद्-विश्वास प्रचलित हैं। इन आस्थाओं पर विचार करते हैं तो इसमें सत्यता की कमी अनुभव होती है। सच्चा धार्मिक मनुष्य कौन होता है? इसका उत्तर यह मिलता है कि सच्चा धार्मिक वही मनुष्य हो सकता है जिसको वेदज्ञान उपलब्ध वा प्राप्त होता है। जो सोच-विचार कर सत्य व असत्य का ग्रहण करता है। अपने प्रत्येक कर्म को सत्य की कसौटी पर कसकर उसे ग्रहण व धारण कर उसे क्रियान्वित रूप देता है। किसी भी आचार्य व व्यक्ति के कहने से किसी विचार व मान्यता को जीवन में धारण करना सच्ची धार्मिकता की कसौटी व विवेकवान मनुष्य की पहचान नहीं है। मनुष्य जीवन में सत्य व असत्य का महत्व होता है। सत्य को जानकर उसे ग्रहण व धारण करने से मनुष्य जीवन की उन्नति होती है। इसके विपरीत जाने अनजाने असत्य कर्म व आचरण करने से मनुष्य की हानि, पतन व अवनति होती है। कोई भी मनुष्य असत्य का आचरण कर जीवन में सुख व शान्ति को प्राप्त नहीं कर सकता। सुख व शान्ति की उपलब्धि मनुष्य को वेद ज्ञान के अनुरूप कर्म व पुरुषार्थ करने से ही होती है। संसार में अनेक मत-मतान्तर प्रचलित हैं जो अपनी मत की पुस्तकों का प्रचार कर उसके अनुरूप कर्म करने का प्रचार करते हैं। वेद व वेदानुयायी संसार के सभी मनुष्यों से यही अपेक्षा करते व आग्रह करते हैं कि वह किसी भी मत व विचारधारा को माने व आचरण करें, परन्तु उन्हें किसी भी धार्मिक, सामाजिक व अन्य कर्म को करते समय सत्य को सामने रखकर व उसकी परीक्षा कर ही उसे करना चाहिये। उन्हें यह विचार करना चाहिये कि उनके द्वारा किया जाने वाला प्रत्येक कर्म सत्य, हितकर, पक्षपातरहित व न्यायपूर्ण है अथवा नहीं। ऐसा नहीं है कि संसार की पुस्तकों की सभी बातें पूर्णतया विद्यायुक्त वा सत्य ही हों।

महर्षि दयानन्द ने संसार में प्रचलित प्रायः सभी मतों के सिद्धान्तों, परम्पराओं एवं पुस्तकों की समीक्षा अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘‘सत्यार्थप्रकाश” में की है। इस ग्रन्थ के उत्तरार्ध के चार अध्यायों में मत-मतान्तरों की पुस्तकों की समीक्षा कर उनमें विद्यमान कुछ असत्य मान्यताओं व कथनों से परिचित कराया गया है। असत्य को छोड़ना, सत्य का ग्रहण करना तथा सत्य को ही आचरण में लाना मनुष्य का कर्तव्य व धर्म कहलाता है। आर्यसमाज के अनुयायियों में यह गुण विशेष रूप से पाया जाता है। इसका कारण वेद एवं सत्यार्थप्रकाश सहित ऋषियों के प्राचीन ग्रन्थों उपनिषद, दर्शन आदि की सभी बातों का प्रायः सत्य पर आधारित होना है। हम भी इन ग्रन्थों को पढ़कर अपने विवेक एवं अन्य विद्वानों की समीक्षाओं से सत्य व असत्य का निर्णय कर सत्य का ग्रहण व असत्य का त्याग कर सकते हैं। ऋषि दयानन्द का धन्यवाद है कि उन्होंने मानव जाति को आर्यसमाज के श्रेष्ठ दस नियम दिये हैं जिनमें से एक चैथा नियम है ‘‘सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये।” यह मनुष्य जीवन में धारण करने योग्य आदर्श वाक्य है। इसे अपना लिया जाये तो हम अपने जीवन को उच्च व महान गुणों एवं आदर्शों वाला बना सकते हैं। ऐसा ही संसार में कुछ महापुरुषों एवं सभी वैदिक ऋषियों व मनीषियों ने किया था। वह वेदभाष्य, उपनिषद, दर्शन, शुद्ध मनुस्मृति तथा सत्यार्थप्रकाश आदि जो ग्रन्थ हमें प्रदान कर गये हैं उससे हमें सत्य का ज्ञान व सत्य के ग्रहण करने की प्रेरणा मिलती है और इनके अध्येता व हम सच्चे अर्थों में मननशील मनुष्य बनते हैं। ऐसे मनुष्यों का जीवन सत्य का ग्रहण व असत्य के त्याग का एक नमूना व उदाहरण होता है।

संसार में तीन सत्तायें अनादि व नित्य अस्तित्व वाली हैं। यह तीन सत्तायें हैं ईश्वर, जीव व प्रकृति। ईश्वर एक है और वह सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान तथा सर्वान्तर्यामी है। सभी जीव, जो कि संख्या में अनन्त वा असंख्य हैं, अल्पज्ञ एवं अल्पशक्तियों से युक्त होते हैं। सभी जीवों का ज्ञान पूर्णता से युक्त नहीं होता। वह माता, पिता, आचार्य तथा ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना से अपने ज्ञान की वृद्धि कर सकते हैं। पूर्ण ज्ञान ईश्वर व वेदों में ही प्राप्त होता है। यही कारण था कि हमारे प्राचीन सभी पूर्वज व ऋषि मुनि मुख्यतः वेदाध्ययन व वेदानुकूल ग्रन्थों का अध्ययन, उनका चिन्तन, मनन तथा उनके अनुसार ही आचरण करते थे। वेदाध्ययन से ही मनुष्य के ज्ञान की न्यूनता दूर होती है और वह कुछ कुछ पूर्णता को प्राप्त करते हैं। वेद व प्रमाणिक वैदिक साहित्य, यथा दर्शन, उपनिषद्, मनुस्मृति आदि के अध्ययन से ही मनुष्य ईश्वर व जीवात्मा सहित प्रकृति के सत्यस्वरूप व गुणों को यथार्थरूप में जान पाते हैं। जिन लोगों ने वेद व वैदिक साहित्य का अध्ययन नहीं किया, वह ज्ञान की वृद्धि नहीं कर सकते और न ही ज्ञान से सम्भावित पूर्णता को ही प्राप्त कर सकते है। ज्ञान की पूर्णता होने पर मनुष्य ऋषि, विद्वान व योगी बनता है। ऐसा हमें कहीं देखने को नहीं मिलता। अतः सभी ग्रन्थों, चाहें वह धार्मिक हों, साहित्यिक, सामाजिक, राजनैतिक या अन्य श्रेणी के, उन्हें किसी भी आचार्य व महापुरुष ने लिखा हो, उसकी प्रत्येक बात की परीक्षा कर ही उसके वेदानुकूल वा सत्य होने पर स्वीकार की जानी चाहिये। ऐसा करके ही हम सत्य मत को प्राप्त हो सकते हैं और अपने जीवन को सफल कर सकते हैं। ऐसा करने से ही हमें ईश्वर व उसकी कृपा प्राप्त हो सकती है। हमारा मनुष्य जन्म लेना सफल हो सकता है। इसके विपरीत किसी भी पुस्तक पर अपनी बुद्धि से परीक्षा किये बिना विश्वास कर लेना मननशील मनुष्य होने का लक्षण नहीं है।

वेदर्षि ऋषि दयानन्द जी का कोटिशः धन्यवाद है कि उन्होंने संसार को यह नियम दिया है वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेदों का पढ़ना व पढ़ाना तथा उनका सुनना-सुनाना, उनका प्रचार करना ही मनुष्यों का परम धर्म है। वेदों की इस महत्ता का कारण वेदों का ईश्वर प्रदत्त ज्ञान होना है। हमें वेद की सत्यता की परीक्षा का भी अधिकार प्राप्त है। इसके लिये हमें वेदांगों का ज्ञान प्राप्त करना होगा, सच्चा योगी बनकर ईश्वर का साक्षात्कार करना होगा तभी हम वेदों की परीक्षा कर सकेंगे। ऐसे विद्वानों व ऋषियों के कथनों की परीक्षा कर ही जो निभ्र्रान्त सत्य सामने आता है, उसे स्वीकार किया जाता है। ऐसा करके ही हम वेदों की पूर्ण सत्यता को गहराई से जान सकते हैं। सृष्टि की आदि से ऋषि दयानन्द तक जितने भी ईश्वर का प्रत्यक्ष किये हुए तथा वेदांगों के ज्ञाता ऋषि हुए हैं, उन सबने वेदों की पूर्ण सत्यता की घोषणा की है। उन्होंने अपने-अपने जीवन को वेदमय बनाया था और इससे उन्हें आत्मिक बल व मृत्यु पर विजय वा अमृत जिसे मोक्ष कहते हैं, प्राप्त हुआ। संसार के सब लोगों को, क्योंकि सब एक ईश्वर की सन्तानें हैं, एक सनातन, सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान ईश्वर की ही उपासना कर उसके वेदाज्ञान का नित्य प्रति स्वाध्याय कर सत्य सिद्धान्तों को प्राप्त होकर उसका पालन करते हुए अपने जीवन को व्यतीत करना चाहिये।

वेदज्ञान को प्राप्त कर ही मनुष्य सच्चा ज्ञानी और विद्वान बनता है। वेद ज्ञान से रहित मनुष्य को सच्चा विद्वान नहीं कह सकते। वेदज्ञान रहित मनुष्य ईश्वर व आत्मा के स्वरूप को सत्य-सत्य नहीं जान सकता तो फिर उसे विद्वान कहें तो किस आधार पर कहें? अतः वेदज्ञान की प्राप्ति सब मनुष्यों के लिए अनिवार्य है। वेदज्ञान प्राप्त कर ही मनुष्य सच्चे विद्वान व ज्ञानी बनते हैं। वेदज्ञान को प्राप्त होकर मनुष्य का वेदज्ञान के अनुकूल आचरण करना कर्तव्य होता है। इस कर्तव्य पालन को ही धर्म कहा जाता है। इस धर्म के पालन से ही मनुष्य सही अर्थों में धार्मिक बनता है। हम अपना समय वैदिक साहित्य के अध्ययन, चिन्तन तथा मनन में लगाते हैं। हमें इस बात का विश्वास है कि संसार में सभी मनुष्य एक ही परमात्मा सृष्टिकर्ता ईश्वर की सन्तानें हैं। संसार में एक ही ईश्वर है, दो व अधिक नहीं हैं। यह अटल सत्य है कि सभी मत-मतान्तर जो ईश्वर का होना स्वीकार करते हैं, उन सबका ईश्वर एक ही है। जब ईश्वर एक है तो उसका ज्ञान भी एक होगा। वह किसी भी अवस्था में परस्पर विरोधी नहीं हो सकता। यदि कहीं विरोध होता है, तो वह ईश्वर के मानने वाले लोगों की अल्पज्ञता के कारण होता है। यह अल्पज्ञता वेदाध्ययन से ही दूर होती है। जो लोग वेदों से दूर हैं और वेदों का विरोध करते हैं, वह कदापि सत्य ज्ञान व ईश्वर के सत्य स्वरूप का साक्षात्कार कर उसको प्राप्त नहीं हो सकते। उनको ईश्वर का साक्षात्कार होना सम्भव नहीं है। जीवन के अन्तिम लक्ष्य ‘‘अमृत व मोक्ष” की प्राप्ति मनुष्य को वेदज्ञान की प्राप्ति, उसके अनुकूल आचरण सहित उपासना करने व ईश्वर का साक्षात्कार करने पर होती है। इस स्थिति को प्राप्त मनुष्य ही सच्चे अर्थों में धार्मिक व महान् होते हैं। सबको वेदाध्ययन कर वेदानुकूल आचरण करना चाहिये और धार्मिक बनकर अमृतमय मोक्ष को प्राप्त करना चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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