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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

*बंदे में था दम*!

लेखक आर्य सागर तिलपता ग्रेटर नोएडा 🖋️।

354 साल पहले आज ही के दिन 27 अक्टूबर 1670 को राजौरी जम्मू कश्मीर के एक साधारण क्षत्रिय परिवार में एक बालक का जन्म हुआ उस बालक की उम्र जब 15 वर्ष की हुई तो उसके हाथों एक गर्भवती हिरणी का शिकार हो गया पश्चाताप के कारण वह बालक घर नहीं गया उसमें वैराग्य जागृत हो गया ओर वह बन गया एक बैरागी साधु जो माधो दास बैरागी के नाम से जाना गया। शैव और वैष्णव दोनों ही मत में आस्था रखने वाला एक बैरागी साधू।

भारत की आध्यात्मिक संत परंपरा बड़ी निराली रही है यहां दक्षिण के संत उत्तर भारत में आकर साधना करते थे तो उत्तर के साधु संत पश्चिम व दक्षिण भारत में जाकर साधना करते थे।

माधव दास बैरागी की उम्र जब 25 वर्ष की हुई तो उसने अपनी कुटिया सुदूर महाराष्ट्र में नांदेड़ में गोदावरी नदी के तट पर बनाई। नियति का खेल निराला था किसी को क्या पता था जिस किशोर क्षत्रिय बालक ने हथियार छोड़कर वैराग्य का मार्ग चुना उसे फिर हाथ में हथियार उठाने पड़ेंगे।

सिखों के जांबाज अंतिम गुरु गोविंद सिंह 1704 में कुछ गद्दारों की गद्दारी के कारण आनंदपुर किले की लड़ाई हार गये। गोविंद सिंह के 7 वर्ष व 5 वर्ष के दो पुत्र जोरावर सिंह व फतेह सिंह सरहिंद के किले में क्रूर सरहिंद के सूबेदार वजीर खां के द्वारा जिंदा दीवार में चुनवा दिए गये। गुरु गोविंद सिंह के शेष दो पुत्र चमकौर की ऐतिहासिक लड़ाई में मारे गए। गुरु गोविंद सिंह की मां माता गुजरी इसी वियोग में चल बसी। यह सब कुछ पंजाब में घटित हो रहा था लेकिन सुदूर महाराष्ट में शिवाजी औरंगजेब को एक के बाद एक कई झटके दे रहे थे।

महाराष्ट्र को अपने लिए सुरक्षित मानकर गुरु गोविंद सिंह जी 1708 में एक युद्ध में घायल होकर गोदावरी नदी के किनारे बने एक गोपनीय शिविर में आराम कर रहे थे।

एक दिन वह अपने कुछ सिक्ख वफादारों के साथ गोदावरी के तट के किनारे भ्रमण कर रहे थे तो उनकी नजर एक तेजस्वी साधु पर पड़ती है जो वेशभूषा से साधु नजर आ रहा था लेकिन उसके कंधे डील डौल बता रहा था यह कोई पराकरमी क्षत्रिय राजकुमार है जो शायद मेरी ही भांति अज्ञातवास काट रहा है।

गुरु गोविंदा का यह बोध ऐसा ही था जैसा सुग्रीव को राम लक्ष्मण को मुनियों के भेष में देखकर हुआ था वनवास के दौरान ।

यही भेंट होती है माधव दास बैरागी व गुरु गोविंद सिंह की। गुरु गोविंद सिंह बहुत दूरदर्शी थे वह माधव दास बैरागी के व्यक्तित्व को भाप गए घायल गुरु गोविंद सिंह ने माधव दास बैरागी को तीन अपने सबसे वीर सिख्ख, पांच तीर व एक तलवार भेंट करते हुए कहा मुझे अब ज्यादा दिन जीने की कामना नहीं है मेरा शरीर युद्धों में क्षत विक्षत हो गया है लेकिन मुझे वचन दो मेरे गुरु तेग बहादुर का सर कलम करने वाले मेरे दो पुत्रों को जिंदा दीवार में चुनवाने वाले सरहिंद के जालिम सूबेदार वजीर खान से तुम मेरा प्रतिशोध लेकर रहोगे मुझे वचन दो। माधव दास बैरागी के मुंह से अचानक निकल गया गुरु का बंदा गुरु की इस आज्ञा को जरूर पूरी करेगा।

बस फिर क्या था माधव दास बैरागी आज से बंदा बैरागी के नाम से जाना गया और महज 20 महीनों में ढाई हजार किलोमीटर की यात्रा कर उसने सरहिंद के किले पर कब्जा कर लिया और क्रूर गवर्नर वजीर खान को किले पर ही फांसी से लटका दिया। गुरु को दिए गए अपने संकल्प को पूरा किया।

बंदा बहादुर ने कभी भी अपने सनातन हिंदू धर्म को नहीं त्यागा सभी सिख्ख इतिहासकार एक स्वर में इसे कहते हैं। एक राजनीतिक संकट के कारण उन्हें विवाह भी करना पड़ा।

बंदा बहादुर सनातनी हिंदू ही बने रहे इसका बोध हमें इस तथ्य से मिलता है गुरु गोविंद सिंह ने गुरुओं की परंपरा के अनुसार अपने बाद के किसी व्यक्ति को अपने उत्तराधिकारी के रूप में घोषणा नहीं की वह बंदा को गुरु के रूप में देखना चाहते थे लेकिन बंदा ने सिख पंथ को स्वीकार नहीं किया ऐसे में उन्हें गुरु ग्रंथ साहिब को ही सिक्खों का दसवां गुरु घोषित कर दिया।

निसंदेह गुरु गोविंद सिंह ने सिक्खों का सैन्यकरण किया लेकिन बंदा बहादुर ने अपने पराक्रम से सिक्खों का राजनीतिकरण किया और आज के समूचे पाकिस्तान भारत के पंजाब अफगानिस्तान तक उसने खालसा सल्तनत की स्थापना की। सिखों के बलिदानी गुरुओं के नाम पर सिक्के जारी किये।

सनातनी योद्धा बंदा बहादुर चुन चुन कर उन मुगलो से बदला ले रहा था जिन्होंने सिक्खों के गुरुओं पर व उनके परिवार पर अत्याचार किए थे। उसकी रणनीति बेहद अचूक थी वह कैथल सोनीपत सहित आज के पूरे हरियाणा व यमुना पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों को अपने दल में शामिल करता उन्हें सैन्य प्रशिक्षण देता और मुगलों का खजाना लुटता। सिख्ख इतिहास के लेखक सरदार खुशवंत सिंह लिखते हैं -पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जरों ने बंदा बहादुर का बहुत साथ दिया रोहिल्ला अफगान जो भाड़े के सैनिक रहे थे जिन्हें दिल्ली के अफगान शासको ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसाया था उनको बंदा बहादुर गुर्जरों ने दोनों ने हीं मिलकर लूटा मारा पीटा।

वीर प्रसूता भारत भूमि में गद्दारों कायरों की कमी नहीं रही है ऐसे ही एक सिख्ख गद्दार ने बंदा बहादुर के साथ गद्दारी की । 1714 में आज के आधुनिक शहर गुरदासपुर से चार मील उत्तर की ओर गुरदास नांगल नाम के गांव के किले में बंदा को दिल्ली के सम्राट बहादुर शाह के विश्वासपात्र गवर्नर समद खा के नेतृत्व में घेर लिया गया।

बंदा बहादुर के साथ उसके लिए में 1000 से अधिक सिख सैनिक थे 8 महीने तक किले की घेराबंदी जारी रही सैकड़ों जवान भूख से ही नष्ट हो गए मजबूरन बंदा बहादुर को आत्म समर्पण करना पड़ा बिना काठी के 377 ऊंटों पर बंदा बहादुर को 744 सिक्खों के साथ दिल्ली लाया गया। जब वीर बंदा बहादुर को दिल्ली की सड़कों पर घुमाया जा रहा तो तो पूरे दिल्ली वासी सड़कों पर आ गए उस सनातनी वीर के दर्शन के लिए साथ ही बड़े-बड़े बांसो पर 2000 सिक्खों के सर लटक रहे थे।

बंदा बहादुर सहित उसके साथियों को तरह-तरह की यातना 1 वर्ष तक दी गई। उन्हें इस्लाम कबूल करने पर जान बख्शने का प्रस्ताव दिया गया। अंत में बंदा बहादुर को 9 जून 1716 को बहादुर शाह की कब्र पर लाया गया वहां सबसे पहले उसके 4 वर्ष के बेटे अजय सिंह के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर उसके दिल को बंदा बहादुर के मुंह में ठुसा गया लेकिन बंदा बहादुर ने उफ तक नहीं की अंत में मुगल बादशाह फारुखशायर के आदेश पर जल्लाद ने बंदा बहादुर का सर धड से अलग कर
दिया। वह सनातनी वीर वीरगति को प्राप्त हो गया।

लेकिन भारत में बलिदान बलिदान के बाद प्रतिशोध प्रतिशोध के बाद बलिदान की समृद्ध सनातन परंपरा रही है बंदा ने गुरु गोविंद सिंह गुरु पुत्रों के बलिदान का बदला लिया तो बंदा के बलिदान का बदला वीर मराठो ने लिया उन्होंने दिल्ली पर हमला करके फर्रूखशायर को गिरफ्तार किया और उसकी दोनों आंखें फोड़ दी।

बंदा ने जो खालसा सल्तनत की स्थापना की उस सल्तनत की खेती को बाद में सरदार रणजीत सिंह ने काटा ।महाराजा रणजीत सिंह के अयोग्य वारिस उस सल्तनत की रक्षा नहीं कर पाए वह अंग्रेजों ने हड़प ली।

इतिहास की तारीखों से इस तथ्य को कभी नहीं मिटाया जा सकता कि सिख्ख साम्राज्य का संस्थापक एक सनातनी योद्धा वीर माधव दास बैरागी उर्फ बंदा बहादुर था भले ही आज के अलगाव वादी खालिस्तानी कुछ सिख्ख संगठनो व इसके रहनुमा जो कनाडा आदि देशों में बैठे हुए हैं उन्हें यह दिखाई दे या ना दे।

सनातन हिंदू व सिख्ख शौर्य परंपरा के एक मुख्य सेतु थे बंदा बहादुर। सिख पंथ हिंदू धर्म से किसी भी मामले में भिन्न नहीं है।

बंदा बहादुर की जयंती पर आज उस महावीर को शत-शत नमन।

लेखक आर्य सागर खारी तिलपता ग्रेटर नोएडा।

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