वैदिक सम्पत्ति भाग- 352 (चतुर्थ खण्ड) – अर्थ की प्रधानता

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(यह लेख माला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की पुस्तक वैदिक सम्पत्ति नामक से अपने सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।)
प्रस्तुति -देवेंद्र सिंह आर्य
चैयरमेन- ‘उगता भारत’

गतांक से आगे ….

आ र्यसभ्यता की प्रधान चार आधारशिलाओं में मोक्ष को ही भाँति अर्थ की भी प्रधानता है। अर्थ का ही दूसरा नाम सम्पत्ति है। यह अर्थ मोक्ष का प्रधान सहायक है। विना अर्थशुद्धि के मोक्ष नहीं हो सकता। हम चारों पदार्थों का वर्णन करते हुए लिख आये हैं कि जिस प्रकार आत्मा के लिए मोक्ष की, बुद्धि के लिए धर्म की और मन के लिए काम की आवश्यकता होती है, उसी तरह शरीर के लिए अर्थ की भी आवश्यकता होती है। मोक्ष और धर्म की आवश्यकता केवल मनुष्य ही को होती है, परन्तु अर्थ और काम के बिना तो मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग और तृण- पल्लव किसी का भी निर्वाह नहीं हो सकता। कामके विना भी चल सकता है- मनोरञ्जन को हटाया जा सकता है। परन्तु जिस अर्थ के ऊपर प्राणीमात्र के शरीर स्थिर हैं और प्राणीमात्र की जिन्दगी ठहरी हुई है, उस अर्थ की प्रधानता का अनुमान सहज ही कर लेना चाहिये और उसकी मीमांसा बहुत ही सावधानी से करनी चाहिये। क्योंकि उसके अनुचित संग्रह से मोक्षमार्ग बिगड़ जाता है। आर्यों ने अर्थ के इस महत्त्व को समझा था। यही कारण है कि उन्होंने अर्थ के विषय में बहुत ही सूक्ष्म और उदारभाव से विचार किया है। मनुस्मृति में लिखा है कि सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् अर्थात् समस्त पवित्रताओं में अर्थ की पवित्रता ही सर्वश्रेष्ठ है। इसलिए संसार से अर्थसंग्रह करते समय बड़ी ही सावधानी से काम लेना चाहिये। अर्थसंग्रह के विषय में मनु भगवान् कहते हैं कि-

अद्रोहेणैव भूतानामल्पद्रोहेण वा पुनः ।
या वृत्तिस्तां समास्थाय विप्रो जीवेदनापदि ।।
यात्रामात्रप्रसिद्धचर्ष स्वैर्कर्मभिरर्गहितः ।
अक्लेशेम शरीरस्य कुर्वीत धनसंचयः ।
सर्वान् परित्यजेदर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः । (मनुस्मृति)

अर्थात् जिस वृत्ति में जीवों को बिलकुल ही पीड़ा न हो, अथवा थोड़ी ही पीड़ा हो, उस वृत्ति से आपत्तिरहित काल में वैदिक आर्य निर्वाह करे। विना अपने शरीर को क्लेश दिये अपने ही अर्गहित कर्मों से केवल निर्वाहमात्र के लिए अर्थ का संग्रह करे और उन समस्त अर्थों को छोड़ दे जो स्वाध्याय में विघ्न डालते हों। इन श्लोकों में आपत्ति- रहित समय में अर्थसंग्रह के पाँच नियम बतलाये गये हैं। पहिला नियम यह है कि अर्थसंग्रह करते समय किसी भी प्राणी को कष्ट न हो। दूसरा नियम यह है कि अर्थसंग्रह करते समय अपने शरीर को भी कष्ट न हो। तीसरा नियम यह है कि अपने ही पुरुषार्थ से उत्पन्न किये गये अर्थ से निर्वाह किया जाय, दूसरों की कमाई से नहीं। चौथा नियम यह है कि अपना उत्पन्न किया हुआ अर्थ भी किसी गर्हित कर्म के द्वारा न उत्पन्न किया गया हो। पाँचवा नियम यह है कि अर्थोपार्जन के कारण स्वाध्याय में पढ़ने लिखने में विघ्न उत्पन्न न होता हो। अर्थात् जो अर्थ इन पाँचों नियमों को ध्यान में रखकर उपार्जन किया जाता है, वही अर्थ आर्यसभ्यता के अनुसार पवित्र होता है, किन्तु जो अर्थ इन नियमों को दुर्लक्ष्य करके संग्रह किया जाता है, वह अनर्थ हो जाता है। इसलिए प्रत्येक आर्य को अनर्थ से बचते हुए ही अर्थोपार्जन करना चाहिये। क्योंकि वेद उपदेश करते हैं कि-

ईशावास्यमिद सर्व यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ।।
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः ।
एवं त्वयि नान्यचेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।। (यजुर्वेद 40/1-2)
अर्थात् इस संसार में परमात्मा को सर्वत्र हाजिर-नाजिर समझकर किसी के भी धन की इच्छा न करो, किंतु उतने ही से निर्वाह करो, जितना उसने तुम्हारे लिए स्थिर किया है। आजीवन इस प्रकार कर्म करने से ही मोक्ष हो सकता है और कोई दूसरा उपाय नहीं है। इन दोनों मन्त्रों का तात्पर्य यही है कि मोक्षार्थी को संसार से उतने ही पदार्थ लेना चाहिये, जिनके लेने में किसी भी प्राणी को कष्ट न हो। इस नियम का पालन केवल इसी एक सिद्धान्त के अवलम्बन से हो सकता है कि जहाँ तक बने इस संसार से बहुत ही सरल उपायों के द्वारा बहुत ही कम पदार्थ लिये जायें। क्योंकि संसार में जितने प्राणी हैं, सभी को अर्थ की आवश्यकता है। इसलिए जब तक बहुत ही कम लेने का नियम न होगा, तब तक सबके लिए अर्थ की सुविधा नहीं हो सकती ।
क्रमशः

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