ओ३म् “हमारी यह सृष्टि सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान ईश्वर से बनी है”

Screenshot_20240918_075837_WhatsApp

=============
हम इस संसार के पृथिवी नाम के एक ग्रह पर जन्में हैं, यहीं पले व बढ़े हैं तथा इसी में हमारी जीवन लीला समाप्त होनी है। हमारी यह सृष्टि आदि काल में, जिसे काल गणना के आधार पर 1 अरब 96 करोड़ 08 लाख 53 हजार 124 वर्ष पुराना माना जाता है, उत्पन्न हुई थी। सृष्टि के आरम्भ में तिब्बत में मनुष्यों की अमैथुनी सृष्टि हुई थी जिनमें चार उच्च कोटि के परम बुद्धिमान् ऋषि अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा उत्पन्न हुए थे। अनुमान है कि यह चार ऋषि पूर्व कल्पों की मुक्तात्मायें थी जिनका भोग काल पूरा हो चुका था। इन ऋषियों को सर्वान्तर्यामी व सर्वव्यापक परमात्मा ने चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान दिया था। सर्वान्तयामी परमात्मा को मनुष्य शरीर धारण कर मुंह से बोल कर ज्ञान देने की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि वह जीवात्मा के भीतर व्यापक होने के कारण आत्मा में प्रेरणा के द्वारा ज्ञान दे सकते व देते हैं। परमेश्वर ने ही इन चार ऋषियों को युवावस्था में उत्पन्न करके इनकी आत्माओं में एक-एक वेद का ज्ञान उनके अर्थों सहित स्थापित किया था। इसके बाद इन ऋषियों ने इस वेद ज्ञान को ब्रह्मा जी नाम के अन्य ऋषि को दिया और इन ब्रह्मा जी से ही सृष्टि में उत्पन्न सभी मनुष्यों को वेद ज्ञानी बनाने का कार्य आरम्भ हुआ था। यह चार ऋषि और ब्रह्मा जी ही इस सृष्टि के प्रथम आचार्य, उपदेशक व गुरु थे। इन्हीं से सृष्टि में ज्ञान का विस्तार हुआ है।

समय समय पर अनेक ऋषि व विद्वान होते रहे जो समय की आवश्यकता के अनुसार नये नये अनुसंधान कार्य करते रहे और मनुष्यों को वैदिक नियमों से युक्त जीवन को धारण कराते रहे। वेद मनुष्यों के जीवन को जीने का सम्पूर्ण आचारशास्त्र व धर्म ग्रन्थ है। वेद सब सत्यविद्याओं से युक्त हैं। वेदों में कथा, कहानी, किस्से व इतिहास नहीं है। वेद ज्ञान की पुस्तकें हैं जो ज्ञान सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने चार ऋषियों व उनके माध्यम से सृष्टि के समस्त मनुष्यों के लिये दिया था। वेदों की भाषा भी परमात्मा प्रदत्त है। यह विश्व की श्रेष्ठतम भाषा है। कोई भाषा इसकी तुलना नहीं कर सकती। बाद के ऋषियों ने वेद पढ़कर भाषा को जानने व समझने के नियम व व्याकरण आदि ग्रन्थों की रचना की जिसमें समय-समय पर अनेक ऋषियों ने आवश्यकतानुसार नये ग्रन्थों का प्रणयन किया। पाणिनी की अष्टाध्यायी तथा ऋषि पतंजलि का महाभाष्य ग्रन्थ वैदिक संस्कृत का अध्ययन करने के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं अधिकारिक ग्रन्थ है। व्यााकरण के अन्य अनेक ग्रन्थ हैं जिनका अध्ययन आर्ष व्याकरण पढ़ने वाले विद्यार्थियों को करना पड़ता है। ऋषि दयानन्द ने अष्टाध्यायी-महाभाष्य तथा महर्षि यास्क के निरुक्त ग्रन्थ सहित इतर व्याकरण ग्रन्थों का अध्ययन ही अपने विद्या गुरु दण्डी स्वामी प्रज्ञाचक्षु विरजानन्द सरस्वती जी से मथुरा में सन् 1860-1863 में किया था। इस अध्ययन से प्राप्त योग्यता से ही ऋषि दयानन्द ने वेदों को समझा था तथा वेदों के प्रचार के साथ उन्होंने सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि अनेक ग्रन्थों के प्रणयन सहित ऋग्वेद आंशिक तथा सम्पूर्ण यजुर्वेद का संस्कृत तथा हिन्दी भाषा में अपूर्व भाष्य वा वेदों का अनुवाद किया था। मानव जाति को ऋषि दयानन्द की मुख्य देनों में सबसे महत्वपूर्ण देन वेदों का भाष्य वा वेद मन्त्रों के सरल भाषा में अर्थ सहित उनके सत्यार्थप्रकाश आदि समस्त ग्रन्थ हैं। इनसे सभी देश व विश्व के वासियों को लाभ उठाना चाहिये। इनका अध्ययन कर वह ईश्वर के वेदज्ञान के अनुरूप विद्यावान वा सद्ज्ञानी मनुष्य बन सकेंगे और उनका इस संसार में जन्म लेना सफल होगा।

हमारी यह सृष्टि पौरुषेय न होकर अपौरुषेय रचना व कृति है। मनुष्य इसे बना नहीं सकते थे अतः इसे परमात्मा जो सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य और पवित्र है, उसी ईश्वर से यह सृष्टि बनी है। परमात्मा वा ईश्वर इस जगत् व सृष्टि का निमित्त कारण है। सृष्टि का उपादान कारण सत्व, रज व तम गुणों वाली त्रिगुणात्मक प्रकृति है जो जड़ सत्ता होने के अतिरिक्त अनादि, नित्य व अविनाशी है। इस अनादि प्रकृति में क्षोभ उत्पन्न कर परमात्मा ने अपने पूर्वकल्पों के नित्य ज्ञान से इस सृष्टि को रचा है। परमात्मा प्रत्येक कल्प में प्रलय अवधि की समाप्ति के बाद सृष्टि की रचना करते हैं। प्रकृति के आरम्भिक विकारों की चर्चा ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश के आठवें समुल्लास में की है। वहां सांख्य दर्शन के अनुसार उन्होंने बताया है कि सत्व वा शुद्ध, रजः अर्थात् मध्य तथा तमः अर्थात् जाड्य यह तीन वस्तु मिलकर जो एक संघात है उस का नाम प्रकृति है। उस प्रकृति से महतत्व बुद्धि, उस से अहंकार, उस से पांच तन्मात्रा सूक्ष्म भूत और दश इन्द्रियां तथा ग्यारहवां मन, पांच तन्मात्राओं से पृथिवी आदि पांच भूत ये (तेईस), चैबीस और पच्चीसवां पुरुष अर्थात् जीव और परमेश्वर हैं। इन में से प्रकृति अविकारिणी और महतत्व अहंकार पांच सूक्ष्म भूत प्रकृति का कार्य और इन्द्रियां मन तथा स्थूलभूतों का कारण हैं। पुरुष न किसी की प्रकृति, न उपादान कारण और न किसी का कार्य है।

हमारा यह संसार प्रकृति नामी जड़ पदार्थ से बना है। बनाने वाला परमात्मा है तथा जिसके लिये बनाया गया है वह अनन्त संख्या वाले ‘‘जीव” हैं। सृष्टि की रचना लगभग दो अरब वर्ष पूर्व हुई और इस समय मनुष्योत्पत्ति का काल 1,96,08,53,124 वर्ष व्यतीत हुआ है। यह सृष्टि प्रवाह से अनादि है अर्थात् अनादि काल से यह सृष्टि प्रकृति नामी उपादान कारण से बनती आ रही है और सर्ग काल की समाप्ति पर परमात्मा इसको इसके कारण मूल प्रकृति में विलीन कर देते हैं जिसे प्रकृति की प्रलय होना कहा जाता है। प्रलय की अवधि 4.32 अरब वर्ष पूर्ण होने पर पुनः सृष्टि की रचना होती है। इस प्रकार सृष्टि उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय का यह कार्य अनादि काल से चल रहा है तथा अनन्त काल तक चलता रहेगा। जीव अपने-अपने कर्मों के अनुसार अनेक प्राणी योनियों में जन्म लेकर सुख व दुःख पाते रहेंगे और वेदानुसार जीवन व्यतीत करने सहित ईश्वर का साक्षात्कार कर मोक्ष व मोक्ष के बाद पुनः जन्म प्राप्त करते रहेंगे। सभी मनुष्यों को इन रहस्यों को जानना चाहिये तभी मनुष्य जीवन की सार्थकता है।

सृष्टि उत्पत्ति विषयक ऋग्वेद के दसवें मण्डल के तीन मन्त्रों का ऋषि दयानन्द जी ने सन्ध्या-उपासना में अघमर्षण मन्त्रों के नाम से उल्लेख किया है। ये तीन मन्त्र हैं:

ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत।
ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रोऽअर्णवः।।1।।

समुद्रादर्णवादधि संवत्सरोऽअजायत।
अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी।।2।।

सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।
दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः।।3।।

इन मन्त्रों का अर्थ है कि सब जगत् का धारण और पोषण करने वाला और सबको वश में करनेवाला परमेश्वर, जैसा कि उसके सर्वज्ञ विज्ञान में जगत् के रचने का ज्ञान था, और जिस प्रकार पूर्वकल्प की सृष्टि में उसने जगत् की रचना थी और जैसे जीवों के पुण्य-पाप थे, उनके अनुसार ईश्वर ने मनुष्यादि प्राणियों के देह बनाये हैं। जैसे पूर्व कल्प में सूर्य-चन्द्र लोक रचे थे, वैसे ही इस कल्प में भी रचे हैं। जैसा पूर्व सृष्टि में सूर्यादि लोकों का प्रकाश रचा था, वैसा ही इस कल्प में रचा है तथा जैसी भूमि प्रत्यक्ष दीखती है, जैसा पृथिवी और सूर्यलोक के बीच में पोलापन है, जितने आकाश के बीच में लोक हैं, उन सबको ईश्वर ने रचा है। जैसे अनादिकाल से लोक-लोकान्तर को जगदीश्वर बनाया करता है, वैसे ही अब भी बनाये हैं और आगे भी बनावेगा, क्योंकि ईश्वर का ज्ञान विपरीत कभी नहीं होता, किन्तु पूर्ण और अनन्त होने से सर्वदा एकरस ही रहता है, उसमें वृद्धि, क्षय और उलटापन कभी नहीं होता। इसी कारण से वेदमन्त्र में ‘यथापूर्वम-कल्पयत्’ इस पद का ग्रहण किया है।

उपर्युक्त ईश्वर ने सहजस्वभाव से जगत् के रात्रि, दिवस, घटिका, पल और क्षण आदि को जैसे पूर्व कल्प में थे वैसे ही रचे हैं। इसमें कोई ऐसी शंका करे कि ईश्वर ने किस वस्तु से जगत् को रचा है? उसका उत्तर यह है कि ईश्वर ने अपने अनन्तसामथ्र्य से सब जगत् को रचा है। ईश्वर के प्रकाश से जगत् का कारण (अनादि कारण सत्व, रज व तम गुणों वाली प्रकृति) प्रकाशित होता और सब जगत् के बनाने की सामग्री ईश्वर के अधीन है। उसी अनन्त ज्ञानमय सामथ्र्य से सब-विद्या के खजाने वेदशास्त्र को प्रकाशित किया, जैसा कि पूर्व सृष्टि में प्रकाशित था और आगे के कल्पों में भी इसी प्रकार से वेदों का प्रकाश करेगा। जो त्रिगुणात्मक अर्थात् सत्व, रज और तमोगुण से युक्त प्रकृति है, जिसके नाम अव्यक्त, अव्याकृत, सत्, प्रधान और प्रकृति हैं, जो स्थूल और सूक्ष्म जगत् का कारण है, सो भी कार्यरूप होके पूर्वकल्प के समान उत्पन्न हुआ है। उसी ईश्वर के सामथ्र्य से जो प्रलय के पीछे हजार चतुर्युगी के प्रमाण से रात्रि कहाती है, सो भी पूर्व प्रलय के तुल्य ही होती है। इसमें ऋग्वेद का प्रमाण है कि- ‘‘जब जब विद्यमान सृष्टि होती है, उसके पूर्व सब आकाश अन्धकाररूप रहता है और उसी अन्धकार में सब जगत् के पदार्थ और सब जीव ढके हुए रहते हैं। उसी का नाम महारात्रि है।” तदनन्तर उसी सामथ्र्य से पृथिवी और मेघ मण्डल अन्तरिक्ष में जो महासमुद्र है, सो पूर्व सृष्टि के सदृश ही उत्पन्न हुआ है।

उस (समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत) समुद्र की उत्पत्ति के पश्चात् संवत्सर, अर्थात् क्षण, मुहूत्र्त, प्रहर आदि काल भी पूर्व सृष्टि के समान उत्पन्न हुआ है। वेद से लेके पृथिवीपर्यन्त जो यह जगत् है, सो सब ईश्वर के नित्य सामथ्र्य से ही प्रकाशित हुआ है और ईश्वर सबको उत्पन्न करके, सबमें व्यापक होके अन्तर्यामिरूप से सबके पाप-पुण्यों को देखता हुआ, पक्षपात छोड़ के सत्य-न्याय से सबको यथावत् फल दे रहा है।। उपर्युक्त तीन मन्त्रों के अर्थ करने के बाद ऋषि कहते हैं कि ऐसा निश्चित जान के ईश्वर से भय करके सब मनुष्यों को उचित है कि मन, वचन और कर्म से पापकर्मों को कभी न करें। इसी का नाम अघमर्षण है, अर्थात् ईश्वर सबके अन्तःकरण के कर्मों को देख रहा है, इससे पापकर्मों का आचरण मनुष्य लोग सर्वथा छोड़ देवें।

उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारी यह सृष्टि अपौरुषेय है और ईश्वर नामी सत्ता से ही बनी है। ईश्वर के सत्यस्वरूप का वर्णन भी ऋषि दयानन्द के शब्दों में ही लेख के आरम्भ में कर दिया गया है। सृष्टि की रचना ईश्वर ने किस पदार्थ से की, उस प्रकृति का वर्णन भी लेख में आ गया है। हम समझते हैं कि सृष्टि रचना का यही वर्णन संसार में सबसे अधिक प्रमाणित व सृष्टि रचना का अधिकारिक वर्णन है और पूर्णतः वैज्ञानिक भी है। कोई माने या न माने, न मानने वालों की अविद्या तथा मानने वालों की विद्या का दर्शन इससे विदित होता है। ऋषि दयानन्द का कोटि-कोटि उपकार है, जिन्होंने हमारे लिये सृष्टि उत्पत्ति विषयक इन रहस्यों को हमारे लिए प्र्रस्तुत किया है। सृष्टि रचना विषयक इस रहस्य को जानकर हमें पापमुक्त होकर ईश्वर की सत्यगुणों से उपासना करते हुए ऋषि, मुनियों व योगियों के समान जीवन व्यतीत करना चाहिये। सांसारिक पदार्थों के भोग की प्रवृत्ति हमें बन्धन में डालकर जन्म व मरण में फंसाती है जिसका परिणाम दुःख व सुख दोनों होता है। श्रेष्ठ मार्ग वेद धर्म का हमें अनुसरण करना है जिसको करने से ही हमें अभ्युदय एवं निःश्रेयस दोनों की प्राप्ति का होना होता है। अतः ईश्वर की बनाई इस सृष्टि और उसके द्वारा बनाये गये सभी प्राणियों के प्रति हमें सम्यक् दृष्टि रखते हुए अपना जीवन व्यतीत करना चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betnano
betyap giriş
hititbet giriş
betnano
betnano
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betnano
betnano
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş
betpark giriş
betpark giriş
casibom giriş
casibom giriş
casibom giriş
jojobet
jojobet
hititbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet