आप किस प्रकार के सुपुत्रों और सुपौत्रों की आशा करते हो? श्रेष्ठ पुत्र और सुपौत्र किस प्रकार प्राप्त करें?

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आप किस प्रकार के सुपुत्रों और सुपौत्रों की आशा करते हो?
श्रेष्ठ पुत्र और सुपौत्र किस प्रकार प्राप्त करें?

चर्कृृत्यं मरुतः पृृत्सु दुष्टरं द्युमन्तं शुष्मं मघवत्सु धत्तन।
धनस्पृृतमुक्थ्यं विश्वचर्षणिं तोकं पुष्येम तनयं शतं हिमाः ।।
ऋग्वेद मन्त्र 1.64.14 (कुल मन्त्र 746)

(चर्कृृत्यम्) वीरता और साहस धारण करते हुए कार्यों को बनाये रखता है (मरुतः) प्राणों का नियंत्रक, प्राणों का मालिक (पृृत्सु दुष्टरम्) बुराईयों के विरुद्ध युद्धों में जिसे कोई रोक नहीं सकता और पराजित नहीं कर सकता (द्युमन्तम्) ज्ञान में प्रकाशित (शुष्मम्) शत्रुओं का शोषक (मघवत्सु) यज्ञ के लिए सम्पदा का निवेश करने वाला (धत्तन) धारण करता है (धनस्पृृतम्) सम्पदा को धारण करता है (उक्थ्यम्) वाणियों में उत्तम और प्रशंसनीय (विश्वचर्षणिम्) सबका ध्यान रखने वाला (तोकम्) पुत्र (पुष्येम) देखभाल, पोषण, संरक्षण और वृद्धि करने वाला (तनयम्) पुत्र, पोते आदि (शतम्) सैकड़ों (हिमाः) शरद ऋतु।

व्याख्या:-
आप किस प्रकार के सुपुत्रों और सुपौत्रों की आशा करते हो?

श्वास का नियंत्रक निम्न प्रकार के पुत्रों और सुपौत्रों को धारण करता है:-
1. चर्कृृत्यम् – वीरता और साहस धारण करते हुए कार्यों को बनाये रखता है।
2. पृृत्सु दुष्टरम् – बुराईयों के विरुद्ध युद्धों में जिसे कोई रोक नहीं सकता और पराजित नहीं कर सकता।
3. द्युमन्तम् – ज्ञान में प्रकाशित।
4. शुष्मम् – शत्रुओं का शोषक।
5. मघवत्सु – यज्ञ के लिए सम्पदा का निवेश करने वाला।
6. धनस्पृृतम् – सम्पदा को धारण करता है।
7. उक्थ्यम् – वाणियों में उत्तम और प्रशंसनीय।
8. विश्वचर्षणिम् – सबका ध्यान रखने वाला।
हम सौ शरद कालों तक ऐसे पुत्र और सुपौत्रों का पालन-पोषण, संरक्षण और उन्हें उत्साहित कर सकें।

जीवन में सार्थकता: –
श्रेष्ठ पुत्र और सुपौत्र किस प्रकार प्राप्त करें?

एक श्रेष्ठ पुत्र और सुपौत्रों को प्राप्त करने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण आधार है कि हम स्वयं श्वास के नियंत्रक अर्थात् मरुत बनें।
दूसरा सभी माता-पिता को सांकेतिक यज्ञ अर्थात् पवित्र अग्नि में आहुतियाँ देना और वास्तविक यज्ञ अर्थात् अपनी सम्पदा को गौरवशाली तरीके से समाज में सबके कल्याण के लिए खर्च करना चाहिए। वे इसी प्रकार की प्रार्थनाएँ और सक्रियताएँ बनाकर रखें।


अपने आध्यात्मिक दायित्व को समझें

आप वैदिक ज्ञान का नियमित स्वाध्याय कर रहे हैं, आपका यह आध्यात्मिक दायित्व बनता है कि इस ज्ञान को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचायें जिससे उन्हें भी नियमित रूप से वेद स्वाध्याय की प्रेरणा प्राप्त हो। वैदिक विवेक किसी एक विशेष मत, पंथ या समुदाय के लिए सीमित नहीं है। वेद में मानवता के उत्थान के लिए समस्त सत्य विज्ञान समाहित है।

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