ओ३म् “वेद मानवता व नैतिक मूल्यों के प्रसारक विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं”

images (56)

============
सृष्टि का आरम्भ सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान ईश्वर से सभी प्राणियों की अमैथुनी सृष्टि के द्वारा हुआ था। सृष्टि के आरम्भ में मनुष्य को भाषा व ज्ञान भी परमात्मा से ही मिला। वैदिक संस्कृत भाषा सृष्टि की परमात्मा प्रदत्त आदि भाषा है तथा वेद ज्ञान मनुष्यों को परमात्मा से प्राप्त हुआ प्राचीनतम ज्ञान है। संसार में आज जो व जितनी भाषायें और ज्ञान विद्यमान है, उसका मूल कारण व आधार वेद एवं वेद की भाषा ही हैं। सृष्टि के आरम्भ से ही संसार के पूर्वजों ने वेदों की रक्षा के अनेक उपाय किये। इन उपायों की विदेशी विद्वान प्रो. मैक्समूलर आदि ने भी प्रशंसा की है। आज तक वेदों में किसी प्रकार की विकृति वा परिवर्तन नहीं हुआ। वेद अपने सत्य व वास्तविक स्वरूप में उपलब्ध हैं। महाभारत युद्ध के बाद आलस्य व प्रमाद के कारण वेदों की रक्षा न हो सकी। वेद लुप्त हो गये थे। वेदों के सत्य वेदार्थ भी सहस्रों वर्षों तक लोगों को सुलभ नहीं थे। ऋषि दयानन्द (1825-1883) ने आकर वेदों का पुनरुद्धार किया। उन्होंने लुप्त वेदों को प्राप्त कर उनके सत्य वेदार्थों का प्रकाश करने सहित उनकी शिक्षाओं को तर्क एवं युक्ति की कसौटी पर कसकर देश भर में प्रचार किया। उनका किया हुआ वेदार्थ आज भी विश्व के सभी लोगों के लिये परम हितकारी एवं मनुष्यों के जीवन से अविद्या को दूर कर सृष्टि के सत्य रहस्यों को उद्घाटित करने वाला है। वेदों के अध्ययन से ही ईश्वर व जीवात्मा सहित सृष्टि के सभी पदार्थों एवं मनुष्य के कर्तव्यों का प्रकाश होता है जिसमें न तो इतर प्राणियों के प्रति किसी प्रकार की हिंसा होती है और न ही वेदों की मान्यताओं व सिद्धान्तों में किसी प्रकार का अन्धविश्वास, पाखण्ड व भेदभाव ही है। ईश्वर प्रदत्त सर्वहितकारी ज्ञान होने से वेद संसार के सभी मनुष्य के लिये हितकर एवं उपादेय हैं। वेदों का अध्ययन किये बिना तथा उनकी शिक्षाओं का आचरण किये बिना मनुष्य का कल्याण व आत्मा की उन्नति नहीं होती। आत्मा की उन्नति विद्या और तप से होती है। विद्या वेदों व वैदिक साहित्य से ही प्राप्त होती है। मत-मतान्तरों के ग्रन्थों में ईश्वर, आत्मा तथा सृष्टि विषयक वह ज्ञान नहीं है जो वेदों से प्राप्त होता है। हमें आश्चर्य होता है कि वेदों का प्रत्यक्ष विरोध कोई नहीं करता, कोई कर भी नहीं सकता परन्तु वेदों की शिक्षाओं का पालन करते हुए हम किसी मत-मतान्तर के अनुयायियों को नहीं देखते। यह एक आश्चर्य ही है। सत्य को जानना व उसे ग्रहण न करना मनुष्य जाति की उन्नति नहीं अपितु अवनति का कारण है। ऋषि दयानन्द का जीवन सत्य को सर्वांश में ग्रहण एवं असत्य का सर्वांश में त्याग करने का अत्युत्तम आदर्श उदाहरण है।

वेदों के आधार पर तथा जन-जन के कल्याण के लिए ही हमारे प्राचीन ऋषियों ने उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों की रचना की है। लगभग 150 वर्ष पूर्व ऋषि दयानन्द ने वैदिक ज्ञान व सिद्धान्तों पर आधारित विश्व के एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ ‘‘सत्यार्थप्रकाश” की रचना की जिसे पढ़कर वेद, उपनिषद एवं दर्शनों के मूल सिद्धान्तों का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। सत्यार्थप्रकाश से मनुष्य जीवन जीने की पूरी पद्धति व विधि का ज्ञान होता है। वेद मनुष्य जीवन में यम व नियमों के पोषक एवं प्रसारक हैं। वेदों से ईश्वर का सत्यस्वरूप प्राप्त होता है। ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानकर उसके गुणों को जानना व उनका कीर्तन करना ही ईश्वर की स्तुति कहलाती है। ईश्वर की स्तुति से मनुष्य को अनेक लाभ होते हैं। जिस प्रकार हमारे वैज्ञानिक पदार्थों के गुणों का जानकर उससे उपयोग कर मनुष्य जाति को लाभान्वित व सुख प्राप्त कराते हैं उसी प्रकार से ईश्वर के सत्य गुणों को जानकर भी मनुष्य व समस्त मानवता को लाभ होता है। स्तुति करने से मनुष्य को अपने गुणों को ईश्वर के अनुरूप गुणों वाला बनाने की प्रेरणा मिलती है। ईश्वर के अनुरूप सत्य व हितकारी गुणों से युक्त होना ही ईश्वर की स्तुति का उद्देश्य होता है। ईश्वर के सत्य व प्राणीमात्र के हितकारी व सबको सुख व कल्याण प्रदान करने वाले गुणों का आचरण ही मनुष्य जीवन का आदर्श व करणीय आचरण होते हैं। मनुष्य जीवन का आदर्श ईश्वर के गुणों के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता।

ईश्वर सत्य, ज्ञान व प्रकाश से युक्त है। हमें भी सत्य, ज्ञान व प्रकाश से युक्त होना है। ईश्वर अविद्या से पूर्णतया मुक्त एवं विद्या से युक्त है, वह सर्वव्यापक एवं सर्वज्ञ है, वह प्राणी मात्र को सुख देने के लिये ही इस सृष्टि का निर्माण व समस्त चराचर जगत का पालन करता व सब प्राणियों को सुख देता है, ईश्वर के इन गुणों से प्रेरणा लेकर हमें भी अपने जीवन में इन सभी गुणों को धारण करना चाहिये। इसी से हमारा जीवन सुख, कल्याण व आनन्द से युक्त हो सकता है। ईश्वर की उपासना भी ईश्वर के आदर्श गुणों की स्तुति करने सहित उससे सत्य गुणों व परमार्थ के लिए पदार्थों की इच्छा व कामना से की जाती है। ईश्वर का ध्यान व समाधि को प्राप्त सभी ऋषि व योगी पूर्ण रूप से सुखी, सन्तुष्ट एवं परोपकार के कार्यों में युक्त देखे जाते हैं। उनको जो सुख व आनन्द प्राप्त होता है वह सांसारिक लोगों को सांसारिक पदार्थों का भोग करने से नहीं होता। ईश्वर भक्ति का आनन्द परिणाम में भी आनन्द प्रदान करता है जबकि सांसारिक पदार्थों से जो कुछ सुख मिलता है उसका परिणाम अधिकांशतः दुःख के रूप में सामने आता है। अतः ईश्वर का ज्ञान, उसकी भक्ति व उपासना तथा वैदिक शिक्षाओं को धारण कर परोपकारमय जीवन जीना ही श्रेष्ठ जीवन के पर्याय हैं। इसी मार्ग का अनुसरण संसार के सभी मनुष्यों को करना चाहिये। यही शिक्षा वेद तथा वैदिक साहित्य सहित ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों से मिलती है।

वेदाविर्भाव से ही विश्व में नैतिक मूल्यों का प्रचलन हुआ था। नैतिक सामाजिक मूल्यों का सेवन ही मनुष्यों का धर्म व कर्तव्य होता है। वेद नैतिक मूल्यों के प्रसारक हैं। ऋषि दयानन्द ने सिद्ध किया है कि वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक हैं। इस कारण वेद का अध्ययन, चिन्तन, मनन, आचरण व वेदों का प्रचार ही संसार में सब मनुष्यों का परम धर्म हैं। जो मनुष्य इस तथ्य को जानते व इसके अनुरूप आचरण करते हैं उनका जीवन धन्य है। ऋषि दयानन्द ने अपने बाद अपने अनुयायियों की एक श्रृंखला उत्पन्न की थी जिसने देश व समाज का अनन्य उपकार किया है। वेदों के अध्ययन से मनुष्य को ईश्वर व जीवात्मा के सत्य स्वरूप का ज्ञान होता है। इससे मनुष्य उपासना में प्रवृत्त होकर अपनी आत्मा की उन्नति करता है तथा स्वयं सुखी होकर संसार के सब प्राणियों को सुख प्रदान करता है। वेदों का अध्ययन व आचरण करने से मनुष्य के जीवन में सत्याचरण की वृद्धि होती है। वह असत्य व दोषों से दूर होता व बचता है। वेदाचरण करने वाले मनुष्य के जीवन में पाप कर्म नहीं होते अपितु वह प्राणी मात्र को सुखी करने की भावना से ही संसार में जीवनयापन करता है। वैदिक जीवन पद्धति का पूर्णता से पालन करने वाले मनुष्य ही सच्चे साधु व सज्जन पुरुष होते हैं। वेद व सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के अध्ययन से मनुष्य की अविद्या दूर हो जाती है। पशु व पक्षी भी ऐसे वेदपारायण मनुष्य से प्रेम करते व उनके प्रति अपनी हिंसा का त्याग करते हैं। अहिंसा की सिद्धि भी यही है कि अहिंसक मनुष्य के प्रति हिंसक पशु अपनी हिंसा का त्याग कर देते हैं। वेद मनुष्य को लोभ, काम व क्रोध से रहित बनाते हैं। मनुष्य के जीवन से अहंकार का नाश करते हैं। सबकी उन्नति व सुख वैदिक धर्म के अनुयायी का प्रमुख कर्तव्य होता है।

वेदों को मानने वालों के लिये ऋषि दयानन्द ने दस स्वर्णिम नियम बनायें हैं। उन्होंने लिखा है कि सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उनका आदिमूल परमेश्वर है। वेदों के अनुसार ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। सभी मनुष्यों को इसी ईश्वर की उपासना करनी चाहिये। इस ईश्वर के विपरीत अन्य गुणों वाला कोई ईश्वर संसार में नहीं है। ईश्वर एक ही है और वह वेद के इन गुणों से ही अलंकृत व सम्पन्न है। वेद ईश्वर प्रदत्त सत्य ज्ञान है और सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। अतः वेदों का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब मनुष्यों व श्रेष्ठ गुणों से युक्त आर्यों का परम धर्म है। वेद के अनुयायियों व अन्य सभी को सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये। सब मनुष्यों को अपने सब काम धर्मानुसार, अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहियें। संसार का उपकार करना भी सभी मनुष्यों, समाजों व संस्थाओं का उद्देश्य होना चाहिये। आर्यसमाज ने इसे भी अपना उद्देश्य बनाया है। इसका अर्थ है कि सब मनुष्यों की शारीरिक, आत्मिक एवं सामाजिक उन्नति करनी चाहिये। सब मनुष्यों को सब मनुष्यों के साथ प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार तथा यथायोग्य वर्तना वा व्यवहार करना चाहिये। सबको अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये। ऐसे प्रयत्न करने से संसार की सभी समस्याओें का हल किया जा सकता है। प्रत्येक मनुष्य को अपनी ही उन्नति में सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिये किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये। एक वैदिक नियम यह भी है कि सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिए ओर प्रत्येक मनुष्य सभी हितकारी नियमों के पालन में स्वतन्त्र रहें। ऐसे नियमों का आचरण वेदों का अध्ययन करने व वेदों को अपना परमधर्म मानने वाला मनुष्य करता है जिससे जगत का कल्याण होता है। सभी को वेद को अपनाना चाहिये। इसी से विश्व व मानवता का कल्याण होगा। इस चर्चा को यहीं पर विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
nesinecasino giriş
bahislion giriş
betebet giriş
rekorbet giriş
romabet giriş
betlike giriş
ikimisli giriş
betpas giriş
betpas giriş
betnano giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
betgaranti yeni adres
betgaranti giriş güncel
betgaranti giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
pumabet giriş
romabet giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
pumabet giriş
pumabet giriş
romabet giriş
romabet giriş
milanobet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
betpas giriş
betpas giriş
milanobet giriş
betpas giriş
betpas giriş
ikimisli giriş
nesinecasino giriş
nesinecasino giriş
vegabet giriş
vegabet giriş
pumabet giriş
betnano giriş
pumabet giriş
betpas giriş
betpas giriş
betpipo giriş
matbet giriş
matbet giriş
rekorbet giriş