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इतिहास के पन्नों से

भारत के 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भाग 407 [हिंदवी स्वराज के संस्थापक शिवाजी और उनके उत्तराधिकारी पुस्तक से ..] कौटिल्य का अर्थशास्त्र और शिवाजी [अध्याय – 5 ]

डॉ राकेश कुमार आर्य

हमारे देश में अंग्रेजी को इसलिए पढ़ाया जाना आवश्यक और उचित माना जाता है कि अंग्रेजी को पढ़ने से ईसाई लोग अपनी पुस्तक बाईबिल और उस की शिक्षाओं का सरलता से पढ़ सकते हैं और उन पर अमल कर सकते हैं। इसी प्रकार उर्दू, अरबी या फारसी को भी इसलिए पढ़ाया जाना उचित और आवश्यक माना जाता है कि इनके पढ़ने से मुस्लिम लोग अपनी धार्मिक पुस्तक कुरान की शिक्षाओं को सरलता से पढ़ व ग्रहण कर सकते हैं। यह सारा काम भारतवर्ष में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर किया जाता है अर्थात धर्मनिरपेक्षता इसी में है कि इन भाषाओं को और इन भाषाओं में लिखी धार्मिक पुस्तकों को देश में पढ़ाया जाए, परंतु संस्कृत को इस देश में पढ़ाया जाना पाप माना जाता है। एक ऐसा परिवेश इस देश के भीतर बनाया गया है कि संस्कृत और संस्कृत में लिखे ग्रंथों से घृणा करो। इसी का नाम इन लेखकों ने या ऐसा परिवेश सृजित करने वाले लोगों ने देश में धर्मनिरपेक्षता या सेकुलरिज्म दिया है। उनकी इस सोच का परिणाम यह हुआ कि हम अपने प्राचीन वैदिक सिद्धांतों, शिक्षा और संस्कारों, मान्यताओं और परंपराओं से काट दिए गए।

 शिवाजी महाराज अपने प्राचीन वैदिक शास्त्रों, ग्रंथों, वैदिक विद्वानों और चाणक्य जैसे राजनीति के मनीषियों से प्रेरणा लेकर यदि अपना राज्य शासन चला रहे थे तो इस बात का उल्लेख प्रसंगवश लोग कर तो दिया करते हैं, परंतु वह कौन-से ऐसे प्रेरक सूत्र थे जिन से प्रभावित और प्रेरित होकर शिवाजी उनका अनुकरण करना चाहते थे ? इस पर अधिक प्रकाश नहीं डाला जाता। हमने यहाँ पर अलग से इसीलिए एक अध्याय को लिखना उचित समझा है, जिससे कि अपने प्राचीन वैदिक राज्यशास्त्रियों के बारे में हमको कुछ जानकारी प्राप्त हो सके। इन विद्वानों में सबसे पहला स्थान चाणक्य का है, जिसके बारे में सुन व समझकर शिवाजी महाराज ने अपने राज्य की नींव रखी थी। शिवाजी या किसी अन्य शासक के द्वारा चाणक्य के कूटनीतिक सिद्धांतों या नीतियों का पालन करना एक ऐसी बात है, जिस पर हम सब सामान्यतः सहमत हो जाते हैं कि उन कूटनीतिक सूत्रों को शिवाजी महाराज ने अपने जीवन में उतारा और ग्रहण कर उनके अनुसार अपने शासन की नीतियों का सृजन किया। परंतु हम यह भूल जाते हैं कि जिस चाणक्य की कूटनीति का अनुकरण शिवाजी महाराज ने किया उसी की नीतियों का अनुकरण करते हुए उन्होंने एक नए राज्य की नींव भी रखी। जी हाँ, शिवाजी से पूर्व चाणक्य भी एक ऐसे ही नए राज्य के संस्थापक थे। उन्होंने तत्कालीन क्रूर, तानाशाही, स्वेच्छाचारी और निरंकुश शासक के विरुद्ध क्रांति का बिगुल फूंका था और उसे उखाड़ कर एक नए राज्य की स्थापना की थी। यदि यह माना जाए कि शिवाजी ने भी अपने प्रेरणास्त्रोत चाणक्य के इस क्रांतिकारी मार्ग का अनुकरण करते हुए एक नए राज्य की नींव रखी तो यह युक्तियुक्त ही होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि चाणक्य कूटनीति के क्षेत्र में तो हमारा मार्गदर्शन करें, परंतु नए राज्य की स्थापना के क्षेत्र में वह हमारे लिए गौण हो कर रह जाएँ। जब-जब चाणक्य हमें कहीं ना कहीं प्रभावित करेंगे तो समझ लीजिए कि वह दुष्ट व दमनकारी शासन के विरुद्ध क्रांति का बिगुल फूंकने के लिए सर्वप्रथम प्रेरित करेंगे। चाणक्य का शिष्य वही हो सकता है जो दमनकारी और अत्याचारी शासन के विरुद्ध क्रांति का बिगुल फूंकने की शक्ति और सामथ्य रखता हो और साथ ही नए राज्य की स्थापना करने का साहस रखता हो। शिवाजी महाराज चाणक्य के कट्टर अनुयायी थे। इसका पता हमें इस बात से चलता है कि उन्होंने तत्कालीन दमनकारी और अत्याचारी शासन से मुक्ति पाने के लिए एक नए राज्य की स्थापना की। कालांतर में शिवाजी ने चाहे चाणक्य की कूटनीति या राजनीति के सूत्रों का भरपूर प्रयोग किया हो लेकिन पहले तो उन्होंने तत्कालीन दमनकारी शासन के विरुद्ध क्रांति का बिगुल फूंकने का ऐतिहासिक और क्रांतिकारी निर्णय लिया।

   महापुरुषों के महान कार्यों की सेंक किसी भी देश, धर्म या जाति को दूर तक और देर तक प्रभावित करती है। यह हो ही नहीं सकता कि हम चाणक्य की कूटनीति का तो अनुकरण करें, परंतु उसके उस क्रांतिकारी और ऐतिहासिक कार्य का अनुकरण न करें जिसमें उन्होंने एक दमनकारी शासन का अंत किया था। इस प्रकार चाणक्य न केवल हमारी राजनीति के अपितु हमारे स्वाधीनता संग्राम के भी महान मार्गदर्शक इतिहास पुरुष हैं।

  चाणक्य ने 326 ई. पू. में सिकन्दर के आक्रमण से उत्पन्न आन्तरिक अराजकता तथा हिन्दू व्यवस्था के विघटन की स्थिति में मौर्यवंश के प्रथम सम्राट चन्द्रगुप्त के पथ प्रदर्शन के लिये एक प्रसिद्ध पुस्तक 'अर्थशास्त्र' की रचना की थी। इस पुस्तक की रचना में कौटिल्य का मूल उद्देश्य सशक्त राजतन्त्र के माध्यम से तत्कालीन संसार को भारत के महान राजनीतिक सिद्धांतों से अवगत कराना और एक ऐसी राजनीतिक प्रणाली संपूर्ण संसार में लागू करना था जिसके माध्यम से संपूर्ण भूमंडल पर शांति और सुव्यवस्था का शासन स्थापित किया जा सके। चाणक्य के इस मूल उद्देश्य को वर्तमान इतिहासकारों ने अपनी दृष्टि से ओझल करने का पापपूर्ण कृत्य किया है, परंतु यदि हम शिवाजी के महान कार्यों और राजनीतिक उद्देश्यों का निष्पक्ष होकर निरीक्षण, परीक्षण और समीक्षण करें तो पता चलता है कि उन्होंने भी चाणक्य के अनुसार संपूर्ण भूमंडल पर शांति और सुव्यवस्था स्थापित करने की दिशा में अपने जीवन को समर्पित किया।

चाणक्य द्वारा लिखित इस पुस्तक को हम 'कौटिल्य का अर्थशास्त्र' के नाम से जानते हैं। विद्वानों का मानना है कि ये अपने ढंग की एक ऐसी अनोखी पुस्तक है जिसे भारत की राजनीति शास्त्र की प्रथम पुस्तक कहा जा सकता है। इसमें राजनीति का विवेचन स्वतन्त्र विज्ञान के रूप में दिया गया है। राज्य-व्यवस्था के संचालन हेतु कौटिल्य द्वारा प्रस्तुत परामर्श के आधार पर ही मौर्य शासक एक विशाल साम्राज्य स्थापित करने में सफल हो सके थे। इसी की सहायता से चन्द्रगुप्त चक्रवर्ती सम्राट बना। राज्य शास्त्र के साहित्य में इस विशिष्ट, अद्वितीय तथा अपूर्व ग्रन्थ का महत्व चिरन्तन है। इसमें उच्च कोटि की शासन व्यवस्था, सरकार, राजा तथा नीतिशास्त्र जैसे महत्वपूर्ण विषयों के गूढ़ अध्ययन के साथ-साथ प्रथम खण्ड के सोलहवें अध्याय में राजनय व राजदूतों के कार्यों के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है। इसका सातवां खण्ड विदेश नीति, संधियों और राष्ट्रीय हितों की रक्षार्थ विषयों से सम्बन्धित है। अर्थशास्त्र के अध्ययन से दो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। प्रथम, किसी भी देश की नीति के गुणों का मूल्यांकन उनके द्वारा सम्पादित कार्यों के परिणामों के आधार पर किया जा सकता है। उत्तम इच्छाओं के गलत परिणाम, खराब नीति के द्योतक हैं। द्वितीय, राजनीति की प्रेरणा तथा उनके परिणाम दोनों ही चूंकि मानव द्वारा निर्मित हैं, अतः परिकलनीय हैं।

    ऐसा नहीं कहा जा सकता कि कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र या राजनीतिशास्त्र में जो सिद्धांत प्रतिपादित किये हैं, वे उससे पूर्व के भारत या आर्यावर्त के पास थे ही नहीं। वास्तविकता यह है कि भारत में जितने भर भी ग्रंथ या राजनीति और समाज को दिशा देने वाले शास्त्र लिखे गए हैं, वह सभी भारत में पुरातनकाल से चली आ रही परंपराओं का संहिताकरण करने का एक प्रयास मात्र हैं। अतः चाणक्य से पूर्व भी भारत के पास एक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था अपने उत्कृष्ट स्वरूप में विद्यमान थी। उसी के सिद्धांतों को चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में स्थान दिया।

    भारत की परंपराओं में जितनी पुरातनता है, उतनी ही नवीनता भी है। इसी पुरातनता और नवीनता के संगम का नाम सनातन है। जिसका अभिप्राय है कि जो पुराना होकर भी नवीन रहता है, ऐसा भारत का धर्म है ऐसी ही भारत की परंपराएं हैं। चाणक्य ने इसी सनातन को अपने अर्थशास्त्र में स्थान दिया और अब उसी सनातन को शिवाजी अपने ढंग से, अपने काल में और अपने शासन में स्थापित कर देना चाहते थे।

   कौटिल्य का उद्देश्य सुदृढ़ और शक्तिशाली राज्य की स्थापना करना था। वह यह भी चाहता था कि केंद्रीय सत्ता जितनी अधिक सुदृढ़ और शक्तिशाली होगी उतना ही राष्ट्र मजबूत होगा और उसकी एकता और अखंडता को हम उतना ही अक्षुण्ण बनाए रखने में सफल होंगे। शिवाजी भी अपने इस राजनीतिक गुरु के इसी संकल्प को लेकर आगे बढ़े थे। वह भी जिस केंद्रीय सत्ता का संचालन कर रहे थे, उसे पूर्णरूपेण सुरक्षित, सुदृढ़ और शक्तिशाली बना देना चाहते थे। चाणक्य ने राजा को परामर्श दिया है कि वह अपनी भौतिक शक्ति की वृद्धि करे, और इस ओर निरन्तर यत्नशील रहे। चन्द्रगुप्त मौर्य तथा समुद्रगुप्त की नीतियों में चाणक्य की इसी प्रेरक शक्ति को हम देख सकते हैं। इसके पश्चात भी जिन-जिन शासकों ने भारत में सुदृढ़ और शक्तिशाली केंद्र की स्थापना के लिए संघर्ष किया या कालांतर में भारत में केंद्रीय सत्ता के सुदृढ़ीकरण की योजना पर कार्य किया, वह सब के सब चाणक्य के इसी सूत्र से प्रेरित हुए माने जा सकते हैं। अपनी यथार्थवादी नीतियों के परिणामस्वरूप चन्द्रगुप्त साम्राज्य स्थापित करने तथा उस समय की राजनीति को स्थायित्व प्रदान करने में सफल रहा। अपनी यथार्थवादी नीतियों के आधार पर ही कौटिल्य मार्गेनथो के यथार्थवादी स्कूल की स्थापना करने वालों का पितामह तथा बिस्मार्क इसका योग्य शिष्य माना जा सकता है।

कौटिल्य शासन की सम्पूर्ण शक्ति राजा में निहित मानता था। शिवाजी ने चाणक्य के इस विचार से सहमत होकर अपने आप को सरदेशमुख घोषित किया। सरदेशमुख का अभिप्राय था कि वह अपने आप को चक्रवर्ती सम्राट की स्थिति में लाना चाहते थे। चक्रवर्ती सम्राट का अभिप्राय है-राजाओं का राजा हो जाना ।यह सोच भारत के प्राचीन राजनीतिक चिंतन को शिवाजी के माध्यम से प्रकट करती है। जिसके अंतर्गत चक्रवर्ती सम्राट संपूर्ण भूमंडल पर शासन करता था और संपूर्ण भूमंडल के प्राणियों के कल्याण में रत रहता था।

कौटिल्य राजा से कछुए की भांति अपनी धन-सम्पदा और स्रोतों को शत्रु से छिपाकर रखने की अपेक्षा करता था, जिससे कि शत्रु पक्ष उसकी शक्ति का सही अनुमान नहीं लगा सके। उसने राजा को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया है। उसकी यह मान्यता थी कि राजा के गुण और दोषों पर ही राज्य की उन्नति और पतन निर्भर है। यही कारण था कि गुणों को लेकर शिवाजी अपने ऊपर अधिक ध्यान देते थे, अर्थात वह राजा होकर अपनी प्रजा के सामने एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत होना चाहते थे। यही कारण रहा कि नैतिक नियमों, आस्थाओं, परंपराओं या मर्यादाओं के पालन करने में शिवाजी ने सबसे पहले अपने आप को प्रस्तुत किया।

  कौटिल्य या चाणक्य की भांति शिवाजी का यह भी विचार था कि सशक्त भारत का निर्माण किया जाए। छत्रपति शिवाजी महाराज का विश्वास था कि ऐसा चतुर उपायों-साम, दाम, भेद और दण्ड द्वारा ही सम्भव है। अतः जहाँ कौटिल्य ने राजा को साम, दाम, दंड और भेद के माध्यम से शासन करने के लिए प्रेरित किया है, वहीं शिवाजी ने राजा होकर इन नीतियों का स्वयं पालन किया। कौटिल्य के राजनय का उद्देश्य विजिगीषु राज्य को विजय प्राप्त कराने, राजनयिक व्यवहार का विकास तथा उसे स्थायी बनाने में सहायता देना भी था। शिवाजी के राजनीतिक जीवन में एक क्षण भी ऐसा नहीं आया, जब वह अपने आप को विजिगीषु राज के रूप में स्थापित करने में या प्रस्तुत करने में असफल रहे हों। कौटिल्य द्वारा राजनय के उपयोग के सात तत्व थे-स्वामी, आमात्य, जनपद्, दुर्ग, कोष, दण् और मित्र। कौटिल्य ने इन सभी का विस्तृत वर्णन किया है। स्वामी अर्थात् रा इन सबका केन्द्र था। इसके पद के अपने अधिकार और उत्तरदायित्व थे। कौटिल्य राजा तथा राज्य को शक्तिशाली एवं सुरक्षित बनाये रखने के लिये राजा के जीवन की सुरक्षा को महत्व देता है। राजा का दुर्ग चहारदीवारी और चारों ओर खाई से पूर्ण रक्षित होना चाहिये। घोषाल के शब्दों में 'राजा को व्यक्तिगत सुरक्षा राज्य की सुरक्षा की कुंजी है।' अर्थशास्त्र भी राजा को अपने राज्य की सुरक्षा तथा प्रभुसत्ता को बनाये रखने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहने का परामर्श देता है। शिवाजी ने अपने राज्य में इसी प्रकार की व्यवस्था की थी अर्थात वह भी कौटिल्य के राजनय के सात तत्वों की इस व्यवस्था से सहमत थे।

     भारतीय राजनय के इतिहास में कौटिल्य की माण्डलिक व्यवस्था यथार्थवाद की द्योतक है। शिवाजी ने अपने शासन प्रबंध और शासकीय व्यवस्था में इस सिद्धांत को भी अपनाया था। चाणक्य का मानना है कि वैदेशिक नीति का संचालन षाड्गुण्य सिद्धान्त के अनुसार चलना चाहिए। कौटिल्य के अनुसार शिवाजी ने विदेश नीति का मूल उद्देश्य राजा द्वारा सर्वोच्च शक्ति प्राप्त कर अपने शत्रु को उससे वंचित करना माना। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार शिवाजी ने ऐसा प्रयास किया कि राजा को ऐसी नीति अपनानी चाहिये जिससे उसके स्वयं के हित का संवर्धन तथा शत्रु की हानि हो। कौटिल्य का मानना था कि यदि पड़ोसी राज्य दुर्बल हो अथवा उसकी सैनिक शक्ति क्षीण हो तो राजा को आवश्यकतानुसार उसकी सहायता कर, उसकी प्रशंसा कर, उसके साथ स्थायी अथवा अस्थायी सन्धि कर अपने उद्देश्य की प्राप्ति करनी चाहिए। उसके अनुसार शक्तिशाली राजा की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। अपनी सीमा पर एक कमजोर शत्रु भी हानिकारक होता है। कौटिल्य ने शत्रु की विशेष परिभाषा दी है-शत्रु वह देश है जो अपने देश की सीमा पर हो और मित्र वह है जो तुम्हारे देश की सीमा पर स्थित राज्य की सीमा पर हो। कौटिल्य की इस परिभाषा के अनुसार पाकिस्तान हमारा शत्रु है और पाकिस्तान से लगता हुआ अफगानिस्तान हमारा मित्र है। बात स्पष्ट है कि जो आपके देश के पड़ोस में अर्थात आप की सीमाओं से लगता हुआ देश है, वह आपकी उन्नति, समृद्धि व प्रगति से कभी भी संतुष्ट सहमत या प्रसन्न नहीं हो सकता। प्रकट रूप से चाहे वह आपके प्रति सदाशयता का व्यवहार करे तो भी उसके हृदय में जलन रहती है, और यह जलन ही उसको आपका शत्रु बनाती है। एक सुयोग्य शासक को सावधान होकर अपने शत्रु देश की इस प्रवृत्ति पर दृष्टि गड़ाए रखनी चाहिए। शिवाजी ने भी कभी अपने किसी पड़ोसी देश पर अर्थात राज्य पर अपेक्षा से अधिक विश्वास नहीं किया। कौटिल्य का मत था कि सीमा पर स्थित शक्तिशाली देश भविष्य का सम्भावित शत्रु है। यह राजनय का कर्तव्य है कि वह इसकी शत्रुता को समाप्त करे, क्योंकि सीमा पर स्थायी शत्रु की उपस्थिति देश के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है। इस प्रकार राजनय एक ऐसा अभिनय है जिसमें बड़ी सावधानी से राजनयिक लोग अपने देश के हितों की गोटियाँ चलते हैं, और दूसरे देश को उनमें फँसा कर अपने देश के हितों को साधने का प्रयास करते रहते हैं। उनका हरसंभव प्रयास होता है कि सीमा पर शांति बनी रहे, परंतु हमारे हितों को किसी भी प्रकार की क्षति कभी भी ना पहुँच सके। शिवाजी ने औरंगजेब के लिए या अपने पड़ोसी किसी भी शक्तिशाली राजा के के लिए जब-जब भी पत्र लिखा तब-तब उन्होंने राजनय का ऐसा प्रदर्शन किया, जिसमें उनका शत्रु उलझ कर रह जाए। कई लोगों को उनकी विनम्रता में याचना दिखाई देती है परंतु वह याचना न होकर शत्रु को अपने वाकजाल में फँसाए रखने का राजनीतिक चातुर्य मात्र है। स्वातन्त्रयवीर सावरकर ने भी अपने जीवन काल में अंग्रेजों के प्रति ऐसी ही नीति का अनुसरण किया था। उन्होंने शिवाजी के पद चिन्हों पर चलकर अंग्रेजों को अपने तथाकथित क्षमा पत्र में फंसाने का प्रयास किया था।

 शक्तिशाली राज्य के सम्बन्ध में कौटिल्य का परामर्श था कि उसके प्रति अस्थायी काल के लिये 'उपेक्षा' की नीति का प्रयोग करना चाहिये। मध्यान्तर के इस काल में राजा को शत्रु पक्ष को दुर्बल करने के लिए गुप्तचरों के सहयोग से उनमें मतभेद उत्पन्न करना चाहिये। इस बीच शक्तिशाली राज्यों के निजी संघर्षों, संधियों अथवा गुटों के प्रति तटस्थता की नीति अपनानी चाहिये अथवा शक्तिशाली राज्य का समर्थन करना चाहिये। कौटिल्य का मत था कि यदि सम्भव हो तो दुर्बल अथवा आश्रयहीन शत्रु को आत्मसात कर, अपनी शक्ति का निरन्तर विकास करना चाहिये। इस प्रकार कौटिल्य राजा को शक्ति संतुलन की नीति को अपनाकर अपनी सुरक्षा, अपना मान तथा धन बढ़ाने का परामर्श देता है। उल्लेखनीय है कि कौटिल्य द्वारा वर्णित राजनय आदर्शों से प्रेरित न होकर केवल ठोस और वास्तविक परिणामों को दृष्टि में रखता था। यही कारण है कि कौटिल्य राजा को शत्रु पक्ष के प्रति 'उपेक्षा' के साथ-साथ 'माया' व 'इन्द्रजाल' अर्थात् जासूसी के उपयोग का भी परामर्श देता है। इसके अतिरिक्त, कौटिल्य राजा को राजनीति के सम्बन्ध में दो और महत्वपूर्ण परामर्श देता है। प्रथम, देश की नीति पूर्ण रूप से सुव्यवस्थित एवं जनकल्याणकारी होनी चाहिये। द्वितीय, उस नीति में समयानुकूल परिवर्तन करते रहना चाहिये, जिससे शत्रु पक्ष को लाभ न पहुँचे।

  शासन की इस कसौटी पर भी यदि शिवाजी को कसकर देखा जाए तो उनकी संपूर्ण शासकीय नीतियाँ इसी आधार पर चलती रहीं। मुगलों के प्रति शिवाजी इसी प्रकार की नीति का निर्वाह करते रहे। जहाँ मुगलों से शिवाजी ने प्रत्यक्ष संघर्ष किया, वहीं वह उनके साम्राज्य को भीतर से खोखला करने की नीति पर भी काम करते रहे। हमारे इतिहासकारों ने हमें कुछ इस प्रकार बताने का प्रयास किया है कि जैसे मुगौं से उनकी सारी प्रजा बहुत ही संतुष्ट थी, परंतु ऐसा नहीं था। वास्तव में भारत की जनता मुगलों के अत्याचारों से त्रस्त थी। भारत की यह त्रस्त जनता जब कहीं देश के किसी भी भाग में किसी 'शिवाजी' या 'महाराणा प्रताप' या किसी 'छत्रसाल' आदि को देखती थी तो उसकी स्वाभाविक सहानुभूति अपने उस महानायक के साथ जुड़ जाती थी जो उसके लिए स्वतंत्रता का कार्य कर रहा होता था। अतः मुगलों की शक्ति को क्षीण करने में मुगलों के अत्याचारों से त्रस्त ये हिन्दू जनता अपने शिवाजी की सहायता न करती रही हो, ऐसा नहीं हो सकता। यदि इस पर निष्पक्ष होकर अनुसंधान किया जाए तो पता चलेगा कि मुगलों के शासनकाल में ऐसे लोग भी बहुत रहे होंगे, जिन्होंने शिवाजी को मुगलों के राज्यक्षेत्र में रहते हुए भी सहयोग दिया होगा। साथ ही शिवाजी भी ऐसे लोगों को अपनी ओर से सहयोग व सहायता देते रहे होंगे, जो मुगलों के राज्यक्षेत्र में होकर भी उनके लिए कार्य कर रहे थे अर्थात मुगलों की सत्ता को उखाड़ने में उनकी सहायता कर रहे थे।

     शिवाजी अंधी वीरता के प्रदर्शन के विरुद्ध थे। वह ऐसी वीरता के प्रदर्शन के ही पक्षधर थे जिससे देश को कोई लाभ मिलता हो, अर्थात केवल मरने के लिए युद्ध करना वह उचित नहीं मानते थे। वह युद्ध और शांति में समन्वय बनाकर चलते थे। जब उन्हें उचित लगता था कि युद्ध की अपेक्षा शांति में ही लाभ है, तब वह शांति के पक्षधर होते थे और जब शांति की स्थापना के लिए युद्ध आवश्यक मानते थे अर्थात जब शिवाजी युद्ध में लाभ देखते थे तब वह युद्ध के लिए आतुर होते थे। उन्होंने साम्राज्य विस्तार की योजना भी बनाई, परंतु उसमें भी उन्होंने कहीं नरसंहार नहीं किया। साथ ही यह भी ध्यान रखा कि जनता के लोगों पर किसी प्रकार का भी अत्याचार ना हो। इस विषय में कौटिल्य का मत है कि "जब शान्ति और युद्ध से समान लाभ की आशा हो तो शान्ति की नीति अधिक लाभप्रद होगी, क्योंकि युद्ध में सदैव ही शक्ति व धन का अपव्यय होता है। इसी प्रकार जब तटस्थता और युद्ध से समान लाभ हो, तटस्थ नीति ही अधिक लाभप्रद व सन्तोषप्रद होगी।"

    कौटिल्य का यह विचार था कि शान्तिपूर्ण उपायों की असफलता की स्थिति में प्रत्येक राज्य युद्ध को एक विकल्प के रूप में अपने समक्ष रखता है। पणिक्कर के शब्दों में वास्तव में जब सभी प्रयत्न असफल हो गये हों, तथा सभी परिस्थितियाँ शस्त्रों के प्रयोग के लिए अनुकूल हों, तभी युद्ध की नीति के रूप में जारी रखना विचारणीय है। प्राचीन भारत में युद्ध को यथासम्भव टालने की नीति का अनुकरण किया जाता था।

उदाहरणार्थ चन्द्रगुप्त जैसे शक्तिशाली राजा ने सेल्युकस जैसे दुर्बल पड़ोसी राजा के साथ भी आक्रामक नीति का पालन नहीं किया था। कौटिल्य ने युद्ध तीन प्रकार के बताये हैं- प्रकाश युद्ध, कूट युद्ध और तृष्णी युद्ध। बल अथवा सेना सप्तांग राज्य का प्रधान शस्त्र था।

कौटिल्य के धोखे, छल कपट, हिंसा और युद्ध के पीछे उसका यथार्थ, तीव्र बुद्धि और राष्ट्र-प्रेम झलकता था। इस सबके उपरांत भी कौटिल्य राजा को धर्म- विरोधी व अत्याचारी नहीं होने देता है। यही शिवाजी की विशेषता है।

   कौटिल्य असंतुष्ट तत्वों, देशद्रोहियों तथा विदेशी शत्रुओं के साथ व्यवहार में नैतिकता के त्याग का परामर्श देता है। कौटिल्य शासन कला तथा राजा व राज्य के हित में अनैतिक कार्य तथा शत्रु व अपराधियों को धोखे से मरवा डालने को भी न्यायोचित ठहराता है। एक यथार्थवादी होने के नाते कौटिल्य ने राज्य के हित के आगे नैतिक मूल्यों को महत्व नहीं दिया था। वह यह भली-भांति समझता था कि नैतिकता के आधार पर राज्य नहीं टिक सकते हैं। उसकी दृष्टि में शत्रु पर विजय प्राप्ति के लिये नैतिकता और धर्म वांछनीय था। वह नैतिकता को, सैद्धान्तिक दृष्टि से मूल्यवान मानते हुये भी, व्यावहारिक दृष्टि से उसके अनुपयोगी होने के कारण, त्याज्य मानता है। कहने का अभिप्राय है कि राष्ट्रहित को साधने के लिए यदि कहीं नैतिकता को त्यागना पड़े तो वह भी राष्ट्र धर्म के अंतर्गत लिया गया एक तर्कसंगत और समयोचित निर्णय ही माना जाना चाहिए। शिवाजी इसी प्रकार की नीति के समर्थक और अनुयायी रहे।

  कौटिल्य ने दूतों को तीन श्रेणी में विभाजित किया है- निसृष्टार्थ, परिमितार्थ और शासनाहार। आमात्य पद किसी भी दूत की श्रेणी में निर्धारण का मापदण्ड होता था। आमात्य पद की योग्यता वाला दूत निसृष्टार्थ, उसकी तीन चौथाई योग्यता रखने वाला परिमितार्थ और आधी योग्यता वाला शासनहार कहलाता था। निस्ष्टार्थ श्रेणी के दूत का कार्य अपने राजा का सन्देश दूसरे राजा के समक्ष प्रस्तुत करना होता था। समस्त विवादपूर्ण समस्याओं के सम्बन्ध में ऐसे राजदूत के पास पूर्णाधिकार सुरक्षित थे। उदाहरणार्थ श्रीकृष्ण कौरवों के पास निसृष्टार्थ दूत के रूप में भेजे गये थे। श्रीकृष्ण का यह कथन इस तथ्य की पुष्टि करता है-मैं शान्तिदूत बनकर हस्तिनापुर जाऊँगा और शान्ति प्रयास असफल होने पर युद्ध की घोषणा कर दूँगा। इस प्रकार निसृष्टार्थ दूत को वार्ता के पूर्णाधिकार प्राप्त थे। इस प्रकार के दूत को हम वर्तमान काल के राजदूत के समान मान सकते हैं। परिमितार्थ दूत के अधिकार निसृष्टार्थ दूत से कम होते थे। यह दूत राजा द्वारा दिये गये निर्देश की सीमा के अन्तर्गत ही वार्ता करने का अधिकार रखता था। वह अपने निर्देशों से बाहर नहीं जा सकता था। शासनाहार जो तृतीय श्रेणी का दूत होता था वह केवल सन्देशवाहक होता था। इसका प्रमुख कार्य राजाओं के मध्य सन्देशों का आदान- प्रदान करना होता था। इसे किसी भी प्रकार के कोई अधिकार नहीं थे; अपने कार्य की समाप्ति पर दूत अपने देश लौट जाते थे। 'प्राचीन भारत में अन्तर्राष्ट्रीय कानून' के एक लेख में विश्वनाथ ने मत प्रकट किया है कि इस काल में स्थायी दूतों की नियुक्ति की प्रथा का प्रारम्भ नहीं हुआ था। दूतों को अस्थायी तौर पर थोड़े समय के लिये ही नियुक्त किया जाता था। कौटिल्य एक अन्य प्रकार के 'अनधिकृत दूत' का भी वर्णन करता है जो राजनयिक व्यवहार का विकास है। यह दूत अपने राजा तथा पर-राजा से वेतन लेकर दोनों ओर से ही कार्य करता था। इसे कामन्दक ने 'उभयवेतन भोगी दूत' की संज्ञा दी है।

 वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में कौटिल्य के इसी प्रकार के दौत्य धर्म का निर्वाह किया जा रहा है अर्थात सारा संसार कौटिल्य का अनुकरण कर रहा है। शिवाजी भी अपने शासनकाल में ऐसे ही दौत्य धर्म का पालन करते रहे थे।

   कौटिल्य का मत है कि दूत को पर-राज्य में मिले आतिथ्य की प्रतिक्रिया स्वरूप प्रसन्नता व्यक्त करने, अपने बल का प्रदर्शन करने, अनिष्ट बोलने, पर- स्त्रीगमन करने और मद्यपान करने से बचना चाहिये। इसके अतिरिक्त उसे न तो अकेले सोना चाहिये और न ही गुप्तभेद के सम्बन्ध में बातें करनी चाहिये। इन सतर्कताओं के पश्चात भी यदि पर-राजा दूत से अप्रसन्न हो जाये तथा उसके फलस्वरूप उसके वध की थोड़ी-बहुत भी सम्भावना हो तो उसे सूचना मिलते ही तुरन्त भाग जाना चाहिये। राजदूत का मूल कार्य दो राज्यों के मध्य शान्तिपूर्ण सम्बन्धों को बनाये रखना था।

दूत के शान्तिकालीन कार्य

कौटिल्य के मतानुसार दूत का कर्तव्य है कि वह अपने राजा के सन्देश को मूल रूप से पर-राजा के समक्ष रखे। कौटिल्य के अनुसार अप्रिय सन्देश को सुनकर दूत के वध हेतु शस्त्र उठा लेने पर भी दूत को अपने राजा का सन्देश यथोक्त ही कहना चाहिये। दूत का प्रथम कर्तव्य अपने राजा के सन्देश को पर-राज्य के राजाओं के समीप ले जाना और उनको उनके समक्ष यथोक्त प्रस्तुत करना है। कौटिल्य के अनुसार दूत को समय और परिस्थिति के अनुसार कार्य करना चाहिये, जैसे अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अन्य दूतों व जनपदों से मित्रता, शत्रु पक्ष में विभेद,चापलूसी अथवा घूस आदि सभी साधनों का प्रयोग करना चाहिये। पर-राज्य में अपने राजा के सम्मान में कुल का गौरव, उसके ऐश्वर्य, त्याग, सम्पन्नता, सौष्ठव, अक्षुद्रता, सज्जनता, शत्रु को सन्तापित करने को क्षमता आदि का प्रभाव वहाँ की जनता पर डालते रहना चाहिये। साथ ही वहाँ के कोष, शक्ति आदि को भी सामथ्य तथा शत्रु की दुर्बलताओं, उनके सैनिक ठिकानों, सैनिक योग्यताओं, दुर्गों, सुरक्षा व्यवस्था, सड़कों, नदी-नालों आदि का विस्तार से वर्णन कर, अपने देश की व्यवस्था से तुलना कर अपने स्वामी को योग्य परामर्श देते रहना चाहिये। उसका कार्य संधि करना, मित्रता बढ़ाना, विदेशी गुप्तचरों को गतिविधियों का पता लगाना और इस सब की सूचना अपने राज्य तक पहुँचाना भी था।

दूत के संकटकालीन कार्य

  शिवाजी ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार अपनी राजनीति को चलाने का हर संभव प्रयास किया। उन्होंने न केवल अन्य क्षेत्रों में कौटिल्य के दिए गए निर्देशों का पालन किया, अपितु दूतों के चयन में भी कौटिल्य के दिशा-निर्देशों का ही पालन किया। कौटिल्य संकटकालीन स्थिति में दूत से अपेक्षा करता है कि उसे पर-राज्य के असन्तुष्ट वर्ग को अपनी ओर मिलाने का निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिये। यदि उसके शान्तिकालीन सभी प्रयास असफल रहें और शत्रु राजा आक्रमण की तैयारी में लग जाये तो अन्तिम शस्त्र के रूप में जनता को राजा के विरुद्ध भड़का कर राज्य में फूट, मतभेद और क्रान्ति करवाने का प्रयत्न करना चाहिये। शत्रु के मध्य वैमनस्य और झगड़ों के बीज बोने के लिये गुप्तचरों का खुला प्रयोग करना चाहिये। कौटिल्य के अनुसार दूतों का कार्य उच्चाधिकारियों को प्रलोभन देकर एक-एक करके राज्य को छोड़ देने के लिए उकसाना भी है। इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु अपने गुप्तचरों को वैद्य, व्यापारी, ज्योतिषी, तीर्थयात्री, शिकारी, राजा के सेवक, रसोइयों तथा साधु आदि के रूप में भेजना, उसका प्रमुख कार्य है। वेश्याओं और नर्तकियों से भी बहुधा गुप्तचरों का काम लिया जाता था। कभी-कभी राजमहल में स्त्रियाँ, तांबूल या छत्र-वाहिकाओं का पद भी प्राप्त कर लेती थी जिससे कि उन्हें राजा के समीप रहकर राज्य की अंतरंग गतिविधियों का भेद निरन्तर मिलता रहे। दूत को पर-राज्य के जेल तथा थल मार्गों एवं दुर्गों आदि की शक्ति से भी अवगत रहना चाहिये। सेनाओं के ठहरने योग्य भूमि, रास्तों का ज्ञान, दुर्ग और शस्त्रों आदि की सूचना अपने राजा के पास निरन्तर भेजते रहना चाहिये, जिससे कि इस सूचना का संकट काल में उपयोग किया जा सके। इन

सब कार्यों के करने के लिये कौटिल्य गुप्तचरों के उपयोग का परामर्श देता है। आलतेकर के शब्दों में दूत का कार्य विदेशों में राज पुरुषों से जान-पहचान करके उस देश की वास्तविक राजनीति की जानकारी प्राप्त करना था। राज्य की सामान्य स्थिति का ज्ञान प्राप्त करना, उसके जन, बल और अन्य साधनों का ठीक-ठीक अनुमान कर अपने गुप्तचरों के माध्यम से गूढ़ लेख द्वारा अपनी सरकार को भेजना था। कौटिल्य ने दूत की अबध्यता का पूर्ण समर्थन किया है। उसका मत था कि दूत चाहे कैसी ही अप्रिय बात कहे अथवा किसी भी जाति का हो, वह प्रत्येक अवस्था में अवध्य है। कौटिल्य, ब्राह्मण दूत का तो किसी भी परिस्थिति में वध स्वीकार नहीं करता है। शत्रु राजा के नाराज होने पर दूत को राजा को याद दिला देना चाहिये के वे जो कुछ अप्रिय सन्देश दे रहे हैं वह उनके राजा का है। दूत राजा का प्रतिनिधि होता है, अतः अप्रिय सन्देश को देते तथा अपने कर्तव्य की पूर्ति करते हुए राजदूत को सजा नहीं मिलनी चाहिये। इस प्रकार इस काल में राजदूत की स्थिति पवित्र एवं निर्दोष संदेशवाहक की थी। मौर्य राजनीतिक व्यवस्था में गुप्तचरों का खुला उपयोग होता था। कौटिल्य ने इस व्यवस्था को और भी अधिक निपुण बनाकर उसे राज्य व्यवस्था का एक अभिन्न अंग बना दिया था। उसने आन्तरिक तथा बाह्य दोनों ही क्षेत्रों में गुप्तचरों का उपयोग प्रस्तावित किया था। इस तथ्य के अनेक प्रमाण हैं कि इनका जाल सम्पूर्ण साम्राज्य तथा पड़ोसी देशों में बिछा हुआ था। कौटिल्य ने बताया है कि गुप्तचरों को कापालिक, भिक्षु, व्यापारी आदि के रूप में विदेशों में रहकर सूचनायें प्राप्त करनी चाहिये। ये फूट डालने और विद्रोह को भड़काने का भी कार्य करते थे।

संधियों का आधार मण्डल सिद्धान्त को, अर्थात् अपने पड़ोसी के साथ शत्रुता तथा पड़ोसी के पड़ोसी के साथ मित्रता का व्यवहार अपेक्षित था। कौटिल्य ने राज्यशिल्प के अन्तर्गत छः प्रकार की नीतियों का उल्लेख किया है, संधि (शांति), विग्रह (युद्ध), यान (शत्रु के विरुद्ध अभियान), संश्रय (मैत्री) और द्वैधीभाव (छल-कपट, एक के साथ युद्ध व दूसरे के साथ सन्धि)। कौटिल्य ने इन नीतियों में संधि का सर्वप्रथम उल्लेख करके उसके महत्व को दर्शाया है। वह प्रत्येक मान्य संधि को महत्वपूर्ण तथा अनुल्लंघनीय मानता था। वह संधि की पवित्रता हेतु शपथ की प्रक्रिया को आवश्यक समझता था। कौटिल्य ने पन्द्रह प्रकार की संधियों का वर्णन किया है। संधि की व्याख्या करते हुए उसने लिखा है कि संधि वह है जो राजाओं को पारस्परिक विश्वास में बाँधती है। अथवा संधि राजाओं के पारस्परिक विश्वास की प्रेरक है। सरल भाषा में, दो राज्यों के मध्य मैत्री समबन्ध स्थापित होने का नाम संधि है। कौटिल्य की कूटनीति के प्रमुख अंग के रूप में संधि का उपयोग किया जाता था। कौटिल्य, संधि द्वारा शांति सम्बन्ध बनाये रखने का समर्थक था। इस दृष्टि से वह संधि की ऐसी लचीली शर्तों के पक्ष में था जो शांति स्थापना के उद्देश्य प्राप्ति के साथ-साथ शत्रु राजा को निर्बल और स्वयं को शक्तिशाली बनाने में सहायक हों। कौटिल्य का मत था कि एक राजनीतिज्ञ को यथार्थवादी होना चाहिये न कि स्वप्नलोक में विचरने वाला। वह संधि को सुविधाजनक मानता है। उसके अनुसार उन्हें तभी तक मानना चाहिये जब तक वे अपने राज्य के हित में हों, तत्पश्चात राजनयिक व्यवहार का विकास उनका उल्लंघन माननीय है। कौटिल्य हारे हुए राजा का अपनी शक्ति को पुनः प्राप्त करने के लिए सन्धि उल्लंघन की छूट देता है। इस प्रकार कौटिल्य संधि के क्षेत्र में दो प्रकार के व्यवहार को बताता है- सुरक्षा सन्धियां अपरिवर्तनीय होती हैं और अन्य संधियां उल्लंघनीय। कौटिल्य का नैतिकता का मापदण्ड असाधारण है।

कौटिल्य नैतिकता और धर्म को उद्देश्य प्राप्ति में सहायक मानता था। उसका अन्तिम उद्देश्य राष्ट्रीय हित था। उन अराजक परिस्थितियों में, जिनमें उसने अर्थशास्त्र के माध्यम से राजा को परामर्श दिया है शान्ति, सुरक्षा, स्वतन्त्रता और सार्वभौमिकता की रक्षा केवल शक्ति और युक्ति से ही सम्भव थी। उल्लेखनीय है कि अपने को नष्ट होने से बचाना ही सर्वोच्च धर्म है।

        शिवाजी ने कौटिल्य के इस राजनय को अपने जीवन में कदम कदम पर अपनाने का प्रमाण किया है। उन्होंने हर स्थिति परिस्थिति में अपने आप को बचा कर शत्रु को अचंभित कर दिया था। उन्होंने अपने आप को अफजल खान के हाथों ही से ही नहीं बचाया, अपितु औरंगजेब जैसे क्रूर बादशाह की जेल से सुरक्षित निकल भागकर वहाँ से भी अपने आप को बचाने में सफलता प्राप्त की।

कौटिल्य राजनयिक नियमों के निर्माण में एकमात्र उद्देश्य राष्ट्रीय हित तथा राजतन्त्र को सशक्त बनाना मानता था। इसी में कौटिल्य की महानता थी। शिवाजी ने इस नीति का अनुसरण किया तो वह भी महानता की ऊँचाई पर पहुँच गए। कारण कि उनकी नीतियों में भी कौटिल्य की नीतियों की भांति किसी भी वर्ग विशेष के प्रति विद्वेष भाव नहीं था।

अन्त में कहा जा सकता है कि कौटिल्य वह प्रथम विचारक था जिसने राजनय का सांगोपांग विवेचन व विश्लेषण किया और जिस का अनुकरण करते हुए शिवाजी जैसे महान शासक ने भारतवर्ष में 1674 में ही भारत की स्वाधीनता की घोषणा कर भारत को हिंदू राष्ट्र के राजपथ पर डाल दिया था। शिवाजी की घोषणा मानो संपूर्ण भूमंडल पर प्रत्येक व्यक्ति की आत्मिक, बौद्धिक, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक प्रत्येक प्रकार की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने की घोषणा थी। भारत को शिवाजी का राज्यारोहण दिवस इसी रूप में मनाना चाहिए। कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित राजनय सम्बन्धी विचारों के आधार पर अपने साम्राज्य की नींव रखने वाले शिवाजी के बारे में यह कहा जा सकता है कि वह भारत को फिर से विश्वगुरु के पद पर आसीन करने के लिए कृतसंकल्प होकर राज्यसिंहासन पर बैठे थे।

कामन्दकीय तथा शुक्रनीतिसार

राज्य और शासन के सम्बन्ध में लिये गये कौटिल्य के अर्थशास्त्र के पश्चात कामन्दकीय तथा शुक्रनीतिसार का महत्वपूर्ण स्थान है। कामन्दक के नीतिसार में विष्णुदत्त (चाणक्य) की प्रशंसा प्रमाणित करती है कि लेखक के विचार चाणक्य से प्रभावित थे। कामन्दक का नीतिसार कौटिल्य की भांति ही राजाओं को शिक्षा हेतु लिखा गया है। इसमें राजा की शिक्षा, राज्य के विभिन्न अंगों, युद्ध कला, राज्य की सुरक्षा और अन्तर्राज्यीय सम्बन्धों आदि का विवरण है। कामन्दक राजा को सर्वोच्च महत्वपूर्ण स्थान देता है। उसने राजा के गुणों और दुर्गणों का वर्णन किया है। कामन्दक ने षाड्गुण्य सिद्धान्त और साम, दान, भेद और दण्ड आदि उपायों के प्रयोग का परामर्श दिया है। उसके अनुसार उसी व्यक्ति का दूत नियुक्त किया जाना चाहिये जो चतुर, बुद्धिमान, परिश्रमी और तर्क के आधार पर कार्य करने वाला हो। दूत का मूल कार्य परदेश का ज्ञान प्राप्त कर राजा को सूचित करना है। वह दूत को राजा की आँखें मानता है। इसीलिये कामन्दक दूतों से रहित राजा को अंधे मनुष्य के समान मानता है। वह गुप्तचरों को भी दूत कहता है।

        शुक्राचार्य द्वारा शुक्र नीतिसार में राजा को सफल और समर्थ बनाने के परामर्शों का उल्लेख है। इसके चौथे अध्याय में राजा, शत्रु, शासन-कला आदि का वर्णन है। शुक्र ने मंत्री को राजा की आँख, मित्र को कान, कोष को मुख, सेना को मन, दुर्ग को हाथ और राष्ट्र को पैर माना है। शुक्र के अनुसार सम्पूर्ण राज्य- व्यवस्था में राजा का महत्व राज्य के सभी अंगों से बढ़कर है। कौटिल्य की भांति शुक्र ने भी राजा की दिनचर्या का विस्तृत वर्णन किया है तथा शत्रु, मित्र, मध्यम और उदासीन राजाओं का उल्लेख किया है। राज्य की रक्षा के लिये दुर्ग व्यवस्था पर बल दिया गया है। शुक्र के अनुसार दूत भी राजाओं के मंत्रियों में से एक होता है। वही व्यक्ति दूत बनने योग्य है जो अच्छी स्मृति वाला, देशकाल का ज्ञाता, योग्य, कुशल और निर्भीक हो।

 यजुर्वेद 10/26 में बहुत सुंदर ढंग से देश के राष्ट्रपति की प्रतिज्ञा के विषय में चिंतन किया गया है। वेद का ऋषि कह रहा है की हे राजन! यह आसंदी या राजगद्दी आपके लिए स्योना अर्थात सोहना है। जिसका अभिप्राय है कि यह आपके लिए सुखदायक है। इस पर आप बैठो। आगे ऋषि कहता है कि राज्य सिंहासन आपके लिए सुषदा है। प्रजा के सुखार्थ बैठने योग्य है, अर्थात आपको प्रजा के सुख के साधन बनाने के लिए इस पर बैठना है। इस पर बैठकर आप को प्रजा के आत्मिक, मानसिक, शारीरिक सभी प्रकार के विकास की सभी योजनाओं पर काम करना है।

  वेद के इस संदेश से पता चलता है कि जनहित हमारे राजा का सबसे बड़ा उद्देश्य होता था। यही चाणक्य नीति का सार है और इसी पर शिवाजी ने कार्य किया।

क्रमशः

डॉ राकेश कुमार आर्य

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