वैदिक सम्पत्ति भाग- 349 जाति,आयु और भोग

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(यह लेख माला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की पुस्तक वैदिक सम्पत्ति नामक से अपने सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।)
प्रस्तुति -देवेंद्र सिंह आर्य
चैयरमेन- ‘उगता भारत’

गतांक से आगे ….

हम देखते हैं कि संसार में जो कुछ सत् शिक्षा है, जो अध्ययन अध्यापन है और जो कुछ उपदेश है, वह तीन ही भागों में बाँटा जा सकता है और उन तीनों विभागों का सारांश इतना ही हो सकता है कि ‘जानी और मन लगाकर करो’ । इस वाक्य में ‘जानो’ ज्ञानकाण्ड है, ‘मन लगाना’ उपासनाकाण्ड है और ‘करो’ कर्मकाण्ड है। विना इन तीनों के लोक अथवा परलोक का कोई भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। यही वेदों के ज्ञान, कर्म और उपासना का रहस्य है। परन्तु जो लोग केवल हवन को ही कर्म कहते हैं, अपने आपको परमात्मा कहने का ही नाम ज्ञान रखते हैं और रात-दिन राम राम कहने ही को उपासना समझते हैं, वे वेदों के वास्तविक ज्ञान, कर्म और उपासना के मर्म को नहीं समझते । क्योंकि वेदों में ज्ञान, कर्म और उपासना का मतलब ही कुछ और है। हम यहाँ कई प्रकार के ज्ञान, कई प्रकार के कर्म और कई प्रकार की उपासना से सम्बन्ध रखनेवाले कुछ वेद मन्त्रों को उद्धृत करके दिखलाते हैं कि उनमें उस प्रकार के ज्ञान, कर्म और उपासना का वर्णन नहीं है, जिस प्रकार के ज्ञान, कर्म और उपासना की बात कही जाती है। वेद कर्म करने की प्रेरणा करते हुए आज्ञा देते हैं कि-

व्रजं कृणुध्य स हि को नृपाणो वर्मा सीव्यध्य बहुला पृथूनि।
अंगच्छध्व संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन् मा स्वसारमुत स्वसा ।
अथः पश्यस्य मोपरि सन्तरां पादको हर ।
मा ते कशप्क्षली द्दशन् स्त्री हि ब्रह्मा बयविथ ।

अर्थात् गौवों के बड़े बड़े गोष्ठ बनाओ और खूब मोटे मोटे वर्म सिलाओं। साथ साथ चलो, साथ साथ बातें करो और साथ साथ विचार करो। भाई से भाई और बहन से बहन द्वेष न करे। हे स्त्री! तू अब समझदार हो गई है, इसलिए नीची निगाह रख, सीधी चाल से चल और अपने अङ्गों को सदैव ढ़के रख। इन मन्त्रों में कर्मों का-कुछ न कुछ करने का उपदेश है। परन्तु ये कर्म यश अर्थात् हवन से कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखते। इसलिए मानना पड़ेगा, कि वेदों में कर्म के नाम से केवल यज्ञों का ही वर्णन नहीं है, प्रत्युत सभी किये जानेवाले कामों को कर्म कहा गया है। इसी तरह ज्ञान के भी कुछ नमूने देखने योग्य हैं। वेद कहते हैं कि-

वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षण पतताम्। वेद नावः समुद्रियः ।
बहह्मचर्येण कन्या युवानं बिन्दते पतिम् ।।
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्णमकल्पयत् ।
एकं याच दशभिः स्वभूते ।।

अर्थात् जो पक्षियों के स्थान और गति को जानता है, यह विमान और नाव का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। ब्रह्मचर्य के द्वारा ही कन्या युवा पति को प्राप्त होती है। परमात्माने सूर्यचन्द्रादि को उसी तरह बनाया है, जैसे इसके पूर्व कल्पों में बनाया था। एक का अंक ही दश का अकं हो जाता है। इन मन्त्रों में अनेक प्रकार के ज्ञान का उपदेश है, पर ब्रह्मज्ञान की एक भी बात नहीं है। इससे कह सकते हैं कि जिस प्रकार वेद के कर्मकाण्ड का मतलब केवल होम, यज्ञ नहीं है, उसी तरह ज्ञानका मतलब भी केवल ब्रह्मज्ञान नहीं है। जो हाल कर्म और ज्ञान का है, वही हाल उपासना का भी है। वेद में लिखा है कि-

आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायत। म् ।
तया मामद्य मेषयाग्ने मेषाविनं कुरु ।
पश्तेम शरदः शतम् जीवेम शरदः शतम् ।
प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु नस्कृधि ।

अर्थात् समस्त ब्राह्मण ब्रह्मवर्चस्वी उत्पन्न हों। मुझे उस मेघा से शीघ्र ही मेवावी बनाइये। मैं सौ वर्ष तक देखूं और सौ वर्ष तक जीता रहें। मुझको ब्राह्मणों और क्षत्रियों में प्रिय कीजिये। इन प्रार्थनाओं में मोक्षप्राप्ति के लिए कुछ भी नहीं कहा गया। इससे मालूम होता है कि वेद के उपासनाकांड में भी भिन्न-भिन्न पदार्थों के लिए याचना की गई है, केवल मोक्ष ही के लिए नहीं। इसलिए उपासना से भी वह मतलब नहीं निकलता, जो साम्प्रद्वायिक लोग निकालते हैं। कहने का मतलब यह कि वेदों में ज्ञान, कर्म और उपासना की योजना केवल मोक्ष ही के लिए नहीं है, प्रत्युत ‘जानो और मन लगाकर करो’ के सिद्धान्तानुसार प्रत्येक सिद्धि के लिए है।

जिस प्रकार ज्ञान, कर्म और उपासना की योजना प्रत्येक सिद्धि के लिए है, उसी तरह इन तीनों की योजना मोक्ष के लिए भी है। मोक्ष के लिए भी ज्ञान की आवश्यकता है, कर्म की आवश्यकता है और उपासना की आवश्यकता है। परन्तु जो लोग कहते हैं कि केवल ज्ञान या केवल कर्म या केवल उपासना से ही मोक्ष हो जायगा वे गलती पर हैं। वे अपनी साम्प्रदायिक धुन के कारण भूल जाते हैं कि दुःखों का अत्यन्ताभाव और आनन्द की प्राप्ति ही का नाम मोक्ष है और यह प्राकृतिक बन्धन से मुक्त होकर तथा ईश्वर की प्राप्ति से ही मिल सकता है। यदि लोग इतना याद रखे तो यह बात उनके सामने आप ही आप आ जाय कि इस समस्त सिद्धि के प्राप्त करने के लिए संसार से बिरक्त होना पड़ेगा, प्रकृतिबन्धन से छुटकारा लेना पड़ेगा और आनन्दस्वरूप परमात्मा का सम्मेलन प्राप्त करना पड़ेगा। क्योंकि विना संसार से विराग उत्पन्न हुए शरीर का मोह नहीं जाता और न बिना शरीर मोह का त्याग किये दुःखों से छुटकारा मिल सकता है। इसी तरह बिना दुःखों को हटाए और बिना परमात्मा को प्राप्त किये आनन्द भी नहीं मिल सकता ।
क्रमशः

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