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वैदिक संपत्ति

वैदिक सम्पत्ति भाग- 348 जाति,आयु और भोग

(यह लेख माला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की पुस्तक वैदिक सम्पत्ति नामक से अपने सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।)
प्रस्तुति -देवेंद्र सिंह आर्य
चैयरमेन- ‘उगता भारत’

गतांक से आगे ….

कि न्तु वैदिकों के मत से ये दोनों दलीलें जिज्ञासु को उलझन में डालकर मोक्ष के अनुदान ही से उपेक्षा दिलानेवाली हैं, इसलिए इनका आदर करना उचित नहीं है। क्योंकि वैदिकों के मन्तव्यानुसार पहिले मत की दलील में यह दोष है कि जब जीव में ब्रह्म व्यापक है. तो वह उस से पृथक् कैसे हो सकता है और दूसरे दल की दलील में यह दोष हैं कि प्रागभाव का सिद्धान्त सदैव कारण-कार्य ही में लगता है। भिन्न पदार्थों में नहीं। मिट्टी घड़े का कारण है। इसलिए घड़ा यद्यपि अनादि काल से प्रत्यक्ष नहीं था, पर अपने कारण में अवश्य था, इसलिए कारण से निकल भी आया। पर जीव का ब्रह्म कारण नहीं है वह ब्रह्म से नहीं बना और अनादि काल से अपना अस्तित्व पृथक् रखता है, इसलिए आगे भी ब्रह्म में समा नहीं सकता। क्योंकि कार्य ही अपने कारण में समा सकता है, अन्य पदार्थ नहीं। इसी तरह से ये दोनों दलीलें निर्जीव साबित होती हैं। यही नहीं किन्तु मोक्ष अवस्था की जितनी दलीलें है, सभी भद्दी हैं और एक भी विश्वास के योग्य नहीं है। इसका कारण यही है कि मोक्ष की स्थिति दलील का विषय नहीं है, किन्तु स्वयं प्राप्त करके अनुभव करने का विषय है।

दलील तो इतने ही काम के लिए है कि वह जिज्ञासु के मन पर परमात्मा के अस्तित्व को बैठा दे और उसके प्राप्त करने की अभिलाषा को उत्पन्न कर दे। इसके सिवा दलील का कुछ भी प्रयोजन नहीं है। क्योंकि यदि परम- साध्य मोक्ष जैसा महान् विषय भी दलील ही से सिद्ध हो जाय और मोक्ष की स्थिति का अनुभव भी होने लगे, तो फिर मोक्ष के वे साधन, जिन पर मोक्ष की प्राप्ति निर्भर है कौन करेगा और कौन सदाचार, तप और योगसमाधि के लिए कष्ट उठावेगा ? क्योंकि मोक्ष की स्थिति का अनुभव तो केवल दलीलबाजी से ही होने लगेगा और फल यह होगा कि आर्यों की तो तप, ब्रह्मचर्य, सदाचार, सादगी ओर योग तथा समाधि आदि की व्यवस्था ही भंग हो जायगी । परन्तु परमात्मा ने मोक्ष की वास्तविक स्थिति का हल करना दलीलों के मान का नहीं रक्खा, इसलिए वैदिकों के मत से मोक्षदशा की स्थिति पर विवाद करना एक प्रकार से समय ही खोना है। उपनिषद् में लिखा है कि-
वेदान्त्वज्ञानसुनिश्चितार्था संन्यासयोगात् यतयः शुद्धसत्त्वाः ।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ।।
समाधिनिधू तमलस्य चेतसो निवेशितस्यात्मति यत् सुखं भवेत् ।
न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते ।।
भिद्यते हृवयग्र भिशिक्ष्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ।।

अर्थात् वेदान्तविज्ञान से परमात्मा का निश्चय करके संन्यास और योग से त्यागी विद्वान् ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं। अन्तःकरण के मलों को धोकर विद्वान् जब समाधि में घुसता है और उस समय आत्मा में जो सुख अनुभव करता है, वह वाणी से कहने योग्य नहीं है, प्रत्युत वह स्वयं अपने अन्तःकरण ही में ग्रहण करने योग्य है। परमात्मा के दर्शन से हृदय की गाँठ खुल जाती है, सब शंकाएँ निवृत्त हो जाती हैं और कर्मफल मुलतबी हो जाते हैं। इन श्रुतियों में वेदान्त की दलीलों से केवल परमात्मा को सिद्ध कर देने का ही इशारा है, मोक्ष की अवस्था का नहीं। मोक्षानन्द का नमूना तो स्वयं समाधिदशा को प्राप्त करके तभी देखा जा सकता है, जब हृदय की गाँठ खुलकर सब शंकाओं की निवृत्ति होती है। इसलिए मोक्ष की स्थिति की बहस में व्यर्थ माथामारी करना वैदिकों को उचित नहीं है और न कभी द्वैत -अद्वैत के झगड़े में पड़ने की आवश्यकता है। अवश्यकता तो केवल यह है कि मोक्ष प्राप्ति का उपाय किया जाय । पर दुःख से कहना पड़ता है कि मोक्ष के उपायों में भी मतभेद है। कोई कहता है कि केवल ज्ञान से मोक्ष होता है, कोई कहता है कि कर्म ही से मोक्ष हो जाता है और कोई कहता है कि मोक्ष के दिलानेवाली केवल उपासना ही है- भक्ति ही है। ऐसी दशा में जिज्ञासु भ्रम में पड़ जाता है और सीधा मार्ग छोड़कर बहक जाता है, इसलिए हम यहाँ ज्ञान, कर्म और उपासना के विषय में प्रकाश डालने की कोशिश करते हैं।

हम मोक्ष के स्वरूप और उस के स्थान का वर्णन करके बतला आये है कि दुःखों के अत्यन्ताभाव और ब्रह्मानन्द की प्राप्ति का ही नाम मोक्ष है और वह प्रकृतिबन्धनों से मुक्त होकर परमात्मा की प्राप्ति से ही मिल सकता है। इसलिए देखना चाहिये कि वह ज्ञान से, या कर्म से, या उपासना के पृथक्-पृथक् प्रयोगों से प्राप्त हो सकता है या सब प्रयोगों को एक ही साथ उपयुक्त करने से प्राप्त हो सकता है। पूर्व इसके कि हम इस मार्गत्रय का विवेचन करें यह उचित ज्ञात होता है कि पहिले यह जान लें कि यह ज्ञान, कर्म और उपासना की प्रक्रिया आाई कहाँ से ? हमें इस विषय में अधिक माथापच्ची न करना पड़ेगा, क्योंकि यह सभी जानते हैं कि ज्ञान, कर्म और उपासना का ही नाम त्रयीविद्या है और समष्टिरूप से त्रयीविद्या का ही नाम वेद है। इसलिए अब देखना चाहिये कि इस वैदिक ज्ञान, कर्म और उपासना का क्या रहस्य है ?
क्रमशः

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