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भारतीय संस्कृति

🚩‼️ओ३म्‼️🚩 🔥” मृतकों का श्राद्ध अशास्त्रीय एवं वेद विरुद्ध होने से त्याज्य कर्म ”

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आश्विन मास का कृष्ण पक्ष मृत पितरों का श्राद्ध कर्म करने के लिए प्रसिद्ध सा हो गया है। इन दिनों पौराणिक नाना प्रकार के नियमों का पालन करते हैं। अनेक पुरुष दाढ़ी नहीं काटते, बाल नहीं कटाते, नये कपड़े नहीं खरीदते व सिलाते, यहां तक की विवाह आदि का कोई भी शुभ कार्य नहीं करते हैं। कहा जाता है कि इन दिनों मृतक माता-पिता, दादी-दादा और परदादी-परदादा अपने अपने परिवारों में भोजन के लिए आते हैं और भोजन करके सन्तुष्ट होते हैं।

आज के वैज्ञानिक युग में यह देखकर आश्चर्य होता है कि लोग मध्यकालीन इस मिथ्या परम्परा को बिना सोचे विचारे मानते व पालन करते आ रहे हैं। ऋषि दयानन्द ने मृतक श्राद्ध का युक्ति व तर्क सहित शास्त्र प्रमाणों से खण्डन किया था। यह बता दें महर्षि दयानन्द ने मृतक श्राद्ध के विरुद्ध अनेक शास्त्रीय विधान भी दिये थे जिससे यह सिद्ध होता था कि श्राद्ध मृत पितरों का नहीं अपितु जीवित माता-पिता, दादी-दादा व अन्य वृद्धों का किया जाना चाहिये। मृतक का तो दाह संस्कार कर देने से उसका शरीर नष्ट हो जाता है। उस मृतक का उसके कुछ समय बाद ही पुनर्जन्म हो जाता है। वह अपने कर्मानुसार मनुष्य या पशु-पक्षी आदि अनेक योनियों में से किसी एक में जन्म ले लेता है व यही क्रम चलता रहता है। आरम्भ में वह बच्चा होता है और समय के साथ उसमें किशोरावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था आती है और उसके बाद उसकी पुनः मृत्यु होकर पुनर्जन्म होता है। अतः हो सकता है कि वर्तमान में वह किसी अन्य प्राणी योनि में वह जीवन निर्वाह कर रहा होगा। जिस प्रकार हम अपने पूर्व जन्मों के परिवारों में श्राद्ध पक्ष में नहीं जा सकते, उसी प्रकार हमारे मृत पितर भी हमारे यहां भोजन करने नहीं आ सकते। यह भी असम्भव है, धार्मिक व वैज्ञानिक दोनों दृष्टियों से, की जन्मना ब्राह्मण का खाया हुआ हमारे पितरों को प्राप्त हो जाये। अतः किसी के भी द्वारा अपने मृत पितरों का श्राद्ध करना अनुचित व अवैदिक कार्य होने से अधार्मिक कृत्य ही है जिसका कोई तर्क, युक्ति व वैज्ञानिक आधार नहीं है। यह असत्य व अविवेकपूर्ण है एवं अन्धविश्वास से युक्त कृत्य है।

वेद एवं ऋषियों के ग्रन्थ पढ़ने पर यह तथ्य सामने आता है कि शास्त्रों में जहां जहां श्राद्ध का वर्णन हुआ है वह जीवित पितरों का श्राद्ध करने के लिए ही हुआ है। भोजन कौन खा सकता है?, वस्त्र कौन धारण कर सकता है? आशीर्वाद कौन दे सकता है? यह सब कार्य जीवित पितर ही कर सकते हैं। यदि यह सब कार्य हम पण्डितों व पुजारियों को सामान देकर करेंगे तो इसका लाभ पितरों को न होकर उन पण्डित-पुजारियों को ही होगा। 

वेद व अन्य शास्त्रों के हिन्दी अनुवादों को स्वयं पढ़ना चाहिये और अपने विवेक से सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना चाहिये। क्रान्तिकारी धार्मिक सामाजिक ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश को पढ़कर भी सत्य व असत्य का विवेक कर सकते हैं। आप पायेंगे कि मृतक श्राद्ध एक शास्त्रीय कृत्य वा कर्तव्य नहीं अपितु मिथ्या विश्वास है जिसके करने से किसी लाभ की प्राप्ति होना सम्भव नहीं है अपितु प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष अनेक प्रकार की हानि हो सकती होती है।

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🚩‼️आज का वेद मंत्र ‼️🚩

🌷ओ३म् य ईशिरे भुवनस्य प्रचेतसो विश्वस्य स्थातुर्जगतश्च मन्तव:।ते न: कृतादकृतादेनसस्पर्यद्या देवास: पिपृता स्वस्तये। (ऋग्वेद १०|६३|८)

💐अर्थ :- जो विद्वान् मननशील मनुष्य संसार के सब स्थावर (घर,वृक्ष,पर्वतादि,जड़) के और जंगम ( मनुष्य, पशु, पक्षी आदि गतिशील ) पदार्थों के राजा हुए हैं, वे विद्वान् जन हमारे किये और न किये (शारीरिक और मानसिक)पाप से हटाकर आज हमारा उत्थान ।

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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇

🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏

(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮

ओ३म् तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीये प्रहरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- पञ्चर्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२५ ) सृष्ट्यब्दे】【 एकाशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८१) वैक्रमाब्दे 】 【 द्विशतीतमे ( २००) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे, रवि- दक्षिणायने , शरद -ऋतौ, आश्विन – मासे, कृष्ण पक्षे , दशम्यां
तिथौ, पुष्य
नक्षत्रे, शुक्रवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे…प्रदेशे…. जनपदे…नगरे… गोत्रोत्पन्न….श्रीमान .( पितामह)… (पिता)…पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)…अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे

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