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*आर्य समाज क्या है ?*

आर्य समाज एक क्रन्तिकारी आन्दोलन है, जिसका मुख्य उद्देश्य समाज में फैले विभिन्न-प्रकार के पाखंड, मत-मतान्तर, जाति-पाति, सम्प्रदाय, मूर्ति-पूजा आदि अन्धविश्वास को दूर करने वाला एक विश्वव्यापी आन्दोलन है और इसके प्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती हैं ।
लोगों के मध्य आर्यसमाज के विषय में भ्रान्तियां और समाधान :–

आर्यसमाजी ईश्वर को नहीं मानते ?

उत्तर:- आर्य समाजी (आर्य) ही ईश्वरवादी होतें हैं । आर्य सिर्फ एक ईश्वर की उपासना करते हैं ।
अन्य तो किसी गुरु, पाषाण, वृक्ष, प्रतिमा या मज़ार (कब्र) की पूजा करते हैं, ईश्वर की नहीं ।

आर्यसमाज एक अलग पंथ या सम्प्रदाय है ?

उत्तर:- आर्यसमाज हिन्दू धर्म का शुद्धतम व वैदिक रूप है । अंधविश्वासों के विरुद्ध चलने वाला आंदोलन है, कोई अलग पंथ या सम्प्रदाय नहीं ।

आर्यसमाजियों का धार्मिक ग्रन्थ “सत्यार्थ प्रकाश ” है ?

उत्तर:- आर्य समाजियों (आर्यों) का धार्मिक ग्रन्थ सिर्फ वेद है | वेद सर्वोच्च है । महर्षि दयानंद जी द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश मूलतः वेदों की और लौटने में सहायक एक ग्रन्थ है, इस से हम मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं और यह धार्मिक ग्रन्थ नहीं है ।

आर्यसमाज राम और कृष्ण को नहीं मानता ?

उत्तर:- आर्यसमाज मर्यादा पुरुषोत्तम राम और योगेश्वर कृृष्ण को महापुरुष की श्रेणी में ही रखता है । अपना आदर्श, अपना पूर्वज मानता है । उनके बताये रास्ते पर चलने का आग्रह करता है । परन्तु इनकी मूर्ति बना कर पूजने को इन महापुरुषों का अपमान मानता है । और ये महापुरुष भी परमपिता परमात्मा की ही उपासना करते थे ।

आर्यसमाज ऋषि दयानंद के अतिरिक्त किसी अन्य महर्षि को महत्त्व नहीं देता ?

उत्तर:- महर्षि ने स्वंय कहा कि ऋषि कणाद या ऋषि जैमिनी के समक्ष मैं अपने आप को कुछ भी नहीं मानता हूँ । अर्थात ऋषि के हृदय में अपने सभी वैदिक ऋषियों के प्रति असीम सम्मान था |आर्यसमाज भी समस्त वैदिक ऋषियों के प्रति सम्मान रखता है । इसमें आदि गुरु शंकराचार्य
जी भी हैं, जिन्होंने वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना की और समाज को अवैदिक (पाखण्ड) मार्ग पे जाने से बचाया ।

आर्यसमाज अन्य विचारधारों का सम्मान नहीं करता है ?

उत्तर:- आर्यसमाज अन्य विचारधाराओं का सम्मान करता है एवं उनकी उपयोगिता से परिचत है । आर्यसमाज समझता है कि मनुष्य का एक ही धर्म वैदिक है ।
परन्तु समाज में एक सी बुद्धि न होने के कारण विचारधारा भिन्न हो सकती है ।
आर्यसमाज वेदों का विरोध करने वाले बुद्ध को भी “महात्मा” बुद्ध कहता है । अनीश्वरवादी जैन धर्म के प्रवर्तक को भी “भगवान” महावीर कहता है । परन्तु क्या असत्य को असत्य न कहा जाये ? समाज को न बताया जाये कि सत्य मार्ग (वैदिक) क्या है ?

आर्यसमाज ऋषि दयानंद को गुरु मानता है ।

उत्तर:- हमारे गुरु मात्र वेद है । हम अपना दिशा निर्देशन वेदों से प्राप्त करते हैं । वैदिक मतों को ग्रहण करते हैं और अवैदिक का त्याग करते हैं । ऋषि दयानंद जी के प्रति अपने हृदय में सम्मान रखतें हैं, परन्तु कभी भी कहीं भी ऋषि की पूजा नहीं करते हम उनके द्वारा दिखाए गए सत्य मार्गों का अनुसरण करते हैं ।
हमारा संकल्प है ।
कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ।।
विश्व को आर्य बनावें ।
…… संकलित ।
……. राजेश बरनवाल ।

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