अंशु जोशी सोवियत रूस के विघटन के बाद जब दुनिया शीत युद्ध से निकलकर आर्थिक उदारीकरण, भूमंडलीकरण और तकनीकी उत्कृष्टता के दौर में आ रही थी, तब शक्ति के मायने भी बदल रहे थे। नब्बे के दशक में ताकत उन देशों की मानी गई, जिनके पास संस्कृति, ज्ञान, साहित्य, भोजन, योग, सिनेमा और प्रवासियों की […]