‘ विशेष ‘ कहाँ छिपे हैं, दैवी -सम्पदा के अक्षय भण्डार ? वाह्य-सम्पदा के लिए, श्रम करता दिन-रात । दैवी-सम्पदा चित्त में, ईश्वर को सौगात॥2725॥ भावार्थ:- है मनुष्य! तू सांसारिक सम्पत्ति अर्जित करने के लिए दिन-रात पसीना बहाता है, भागीरथ तप करता है। अन्ततोगत्त्वा एक दिन इसे छोड़ कर चला जाता है। इसके अतिरिक्त तझे […]
दैवी-सम्पदा चित्त में, ईश्वर को सौगात॥