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बिखरे मोती

बिखरे मोती-भाग 9

हिंसा बल है दुष्ट का, गुणवानों का खेद दर्शन हों सत्पुरूष के,शास्त्र सुनै चित लाय।उद्योग, सरलता, सौम्यता,हितकारी कहलाय।। 147।। रोगी, ऋणी और आलसी,और हो संयमहीन।लक्ष्मी वहां टिकती नही,जो उत्साह से हीन।। 148।। शक्तिहीन को चाहिए,क्षमा-भाव अपनाए।सामर्थ्यवान को चाहिए,धर्मवान बन जाए।। 149।। सरलता के व्यवहार को,कमजोरी मानै यातुधान।लज्जाशील मनुष्य का,इसलिए करै अपमान।। 150।। अतिदानी, अतिश्रेष्ठ हो,अति […]

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बिखरे मोती-भाग 8

कभी भूलकै मत करो, स्वजन का अपमान महादोषों से युक्त हो,दिल में राखै बैर।बेशक वह कुबेर हो,त्यागने में ही खैर।। 127।। ऐश्वर्य से युक्त को,लेकिन हो गुणहीन।सजन सनेही मत बना,लेवै मान को छीन।। 128।। जीत होवै धर्म की,पाप की होवै हार।आत्मचिंतन कर जरा,अपने कर्म निहार।। 129।। गुणों की जिसमें खान हो,विनय होय श्रंगार।भूसुर आया स्वर्ग […]

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बिखरे मोती-भाग 7

द्वेष करै साधु नही, ज्ञानी नही कहायबुद्घि में जो कुशाग्र हो,नीति में गंभीर।मनोभाव प्रकटै नही,राज्य के रक्षक धीर।। 106।। दण्ड-क्षमा का भान हो,कोष का होवै ज्ञान।प्रजा को समझै पुत्रवत,राजा वही महान।। 107।। भृत्यों के जो संग मेंकरै ऐश्वर्य उपभोग।ऐसे राजा के राज में,खुशहाली के योग।। 108।। राजा का भेदी मंत्री,पति की भेदी नार।भ्राता पुत्र के […]

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बिखरे मोती-भाग 6

सत्पुरूषों के कारनै, कुल उत्तम कहलायसर्प सिंह और अग्नि का,जो करता तिरस्कार।छेड़कै इन्हें छोड़ो नहीतत्क्षण देना मार।। 89।। लता सहारा ढूंढती,वृक्ष बढै़ खुद आप।जिनका अपना वजूद हो,दूर रहै संताप ।। 90।। सत्य प्रेम करूणा यहां,जिनके हों आधार।धन यश में वृद्घि करें,रक्षा करे करतार।। 91।। अग्नि व्यापक काष्ठ में,जब तक नही जलाय।वायु के संसर्ग से,वन में […]

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बिखरे मोती-भाग 5

घर में खुशहाली रहे श्री न करै पयान आलस रहित सेवक मिलै,सदा रहै अनुरक्त।नियरे ताको राखिए,दुर्लभ स्वामी भक्त ।। 75।। जिसमें मद हो बुद्घि का,और होवै वाचाल।‘विजय’ ऐसे भृत्य को,देना तुरत निकाल ।। 76।। वाचाल अर्थात – अधिक बोलने वाला, उल्टा जवाब देने वाला। मूरख क्रूर कंजूस बैरी,इनसे जो हाथ फैलाए।मान घटावै आपुनो,जीवन भर पछताए […]

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बिखरे मोती-भाग 4

कान सुनें महिमा तेरी, जिह्वा से हो जाप माता-पिता जहां देवें दुआ,अतिथि का सम्मान।महिला बाल जहां खुश रहें,वो कुल होय महान ।। 57।। जिसके कोप से भय लगे,शक्ति हो व्यवहार।खरगोश की खाल में भेड़िया,जाने कब कर दे प्रहार।। 58।। वयोवृद्घ और ज्ञानवृद्घ का,जो करता नही संग।चंचल चित्त जाको रहे,वो करै रंग में भंग ।। 59।। […]

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बिखरे मोती-भाग 3

देखे नही पर दोष को… तीर, कांच तन में घुसें,तो देवें तुरत निकाल।बुरा बोल घट में चुभै,दरद करै विकराल ।। 38।। जाको दुख दें देवगण,बुद्घि को हर लेत।वाणी का संयम घटै,कष्टï मीत को देत।। 39।। अर्थ, काम में धर्म का,गर होवै समावेश।धाम मिलै फिर मोक्ष का,और कहलावै दरवेश ।। 40।। मृत्यु खाती प्राण को,रूप बुढ़ापा […]

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बिखरे मोती-भाग 2

राजा रक्षक राज का,पशु का रक्षक मेघ।पत्नी का रक्षक हो पति,ब्राह्मण रक्षक वेद ।। 19।। रूप की रक्षा मसाज से,सत्य से रक्षित धर्म।विद्या रक्षित धर्म।विद्या रक्षित अभ्यास से,कुल रक्षित सत्कर्म ।। 20।। देख पराए सुख को,जलता जो इंसान।सूखा जैसा रोग है,मिलता नही निदान ।। 21।। धन विद्या और मित्रजन,सबको दे भगवान।सत्पुरूषों की शक्ति ये,दुष्ट करे […]

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बिखरे मोती-भाग 1

ऐसे जनों की नाव की, हरि बनै पतवार (प्रस्तुत काव्यमाला साहित्य जगत के स्वनामधन्य हस्ताक्षर प्रो. विजेन्द्र सिंह आर्य के स्वरचित दोहों के रूप में है, जिन्हें हम यहां सुबुद्घ पाठकों की सेवा में सादर प्रस्तुत कर रहे हैं।श्री आर्य जी की काव्य रूप में इससे पूर्व ‘मेरे हृदय के उदगार’ नामक पुस्तक प्रकाशित हो […]

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दु:खों की अत्यंत निवृत्ति का अर्थ प्रकृति बंधन से छूटना है

मोक्ष का सच्चा स्वरूप दो प्रकार का है, पहला स्वरूप है, दुखों से छूट जाना और दूसरा स्वरूप है आनंद प्राप्त करना। दुखों की अत्यंत निवृत्ति का अर्थ प्रकृति बंधन अर्थात मायावेष्टïन से छूट जाना है। स्थूल और सूक्ष्म शरीर से जब छुटकारा मिल जाता है तब दुखों का अत्यंत अभाव हो जाता है। न्याय […]

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