भारत के राष्ट्रपतियों के बारे में विशेष जानकारी, भाग – 1

रायसीना हिल्स पर बना राष्ट्रपति भवन गणतांत्रिक भारत के हर ऐतिहासिक क्षण का गवाह बना है। आजादी से पूर्व इसे वायसरीगल हाउस के नाम से जाना जाता था। लेकिन 26 जनवरी 1950 को सुबह 10.15 बजे जब डा. राजेन्द्र प्रसाद ने भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेकर गणतांत्रिक भारत के राजपथ पर कदम रखे तो उनके वायसरीगल हाउस में उस दिन रखे गये पहले कदम के साथ ही यह भवन वायसरीगल हाउस से राष्ट्रपति भवन बन गया। रायसीना हिल्स पर बना यह भवन सचमुच ब्रिटिश और भारतीय स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। यहां पर आजाद भारत के अब तक के तेरह राष्ट्रपतियों ने अपनी शानदार उपस्थिति, भाव भंगिमा और नेतृत्व से देश का और विश्व का ध्यान अपनी ओर समय-समय पर खींचा है। हम यहां पर अपने अब तक के तेरह राष्ट्रपतियों के बारे में हल्की सी जानकारी देने का प्रयास कर रहे हैं। यह जानकारी भारत के अगले राष्ट्रपति के चुनाव के दृष्टिगत तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही तेरह मई को भारतीय संसद के 60 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में और भी महत्वपूर्ण हैं।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद (Dr. Rajendra Prasad)

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को 26 जनवरी 1950 को पहली बार राष्ट्रपति बनने पर 31 तोपों की सलामी दी गयी। 1952 में डा. राजेन्द्र प्रसाद को पहली चुनी हुई संसद ने विधिवत पहला राष्ट्रपति बनाया। 13 मई 1952 को उन्होंने इस पद की व गोपनीयता की शपथ ली। दूसरी बार 13 मई 1957 को उन्होंने इस पद को सुशोभित करने का इतिहास रचा। इस प्रकार लगभग 12 वर्ष तक राष्ट्रपति पद पर रहने का अभी तक का रिकार्ड उन्हीं का है। 1962 में भी डा. राजेन्द्र प्रसाद ने अन्य लोगों को आगे आने के लिए रास्ता छोडकर एक प्रकार से पद त्याग ही किया था। उनकी तडक़ भडक़ और शानो शौकत की जिंदगी जीने वाले पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से अधिक नहीं निभी, लेकिन डॉ राजेन्द्र प्रसाद की छवि और व्यक्तित्व के सामने नेहरू जी भी चुप रह जाते थे।डा. राजेन्द्र प्रसाद ने राष्ट्रपति रहते हुए हिंदू कोड बिल का विरोध मौखिक रूप से किया था। इससे नेहरू के एकच्छत्र राज को झटका लगा था। यद्यपि संवैधानिक गरिमा का ध्यान रखते हुए डा. राजेन्द्र प्रसाद ने इस बिल पर हस्ताक्षर कर दिये थे, लेकिन अपना विरोध जताकर ही किये थे। काल ने सिद्ध कर दिया कि नेहरू की अपेक्षा कहीं डा राजेन्द्र प्रसाद ही सही थे। वह राष्ट्रपति भवन में सत्यनारायण कथा का आयोजन कराया करते थे। नेहरू को यह बात पसंद नहीं थी लेकिन फिर भी वह राष्ट्रपति के निजी मामलों में हस्तक्षेप करने की हिम्मत नहीं कर पाये थे। आज यह परंपरा विशुद्ध धर्म सापेक्षता का प्रतीक बना दी जाएगी लेकिन भारत के धर्मनिरेपक्ष स्वरूप को सही प्रकार संचालित करते हुए भी हमारे राष्ट्रपति ने अपनी धार्मिक छवि का कोई दुष्प्रभाव भारतीय राजनीति पर नहीं पडऩे दिया। यही उनकी महानता थी।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (Dr. Sarvepalli Radhakrishnan)

भारत के पहले राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद विशुद्ध राजनीतिज्ञ थे, तो दूसरे राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन विशुद्ध शिक्षा प्रेमी थे। उनके नाम पर कई लोगों को इसीलिए आपत्ति रही थी कि एक राजनीतिज्ञ की वजाय शिक्षाविद को राष्ट्रपति क्यों बनाया जा रहा है? लेकिन नेहरू की इच्छा के आगे किसी की नहीं चली और 13 मई 1962 को भारत के दूसरे राष्ट्रपति के रूप में डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने पद और गोपनीयता की शपथ ली। इन्होंने राष्ट्रपति के रूप में अपने वेतन को घटाया और उसे 2000 तक ला दिया।

इनके पास डा. राजेन्द्र प्रसाद जैसा लंबा राजनैतिक अनुभव तो नहीं था, लेकिन इनकी ख्याति उस समय एक लब्ध प्रतिष्ठित दार्शनिक की अवश्य थी? दूसरे डा. राजेन्द्र प्रसाद के कार्यकाल में ये भारत के उपराष्ट्रपति भी रह चुके थे। 40 वर्ष तक अध्यापन कार्य करने के कारण इनके जन्मदिवस 5 सितंबर को भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की परंपरा का श्रीगणेश हुआ। 1967 में इनका कार्यकाल समाप्त हुआ तो कांग्रेस ने इन्हें पुन: राष्ट्रपति का दायित्व संभालने का अनुरोध किया। लेकिन इन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया। 1967 में ये अपने गृह नगर मद्रास (चेन्नई) लौट गये।

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