आत्मा हमारे शरीर में कहां रहता है? भाग 20

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गतांक से आगे20वीं किस्त।
छांदोग्य उपनिषद के आधार पर

पृष्ठ संख्या 814.
प्रजापति और इंद्र की वार्ता। प्रजापति ने इंद्र से प्रश्न किया है।

“हे इंद्र !यह शरीर निश्चय मरण धर्मा है, और मृत्यु से ग्रसा अर्थात ग्रसित है। यह शरीर उस अमर, शरीर रहित जीवात्मा का अधिष्ठान अर्थात निवास स्थान है। निश्चय शरीर के साथ जीवात्मा सुख और दुख से गृहीत है। शरीर में लिप्त हुए जीव के सुख-दुख कभी नष्ट नहीं होते। शरीर से रहित होने पर सुख-दुख कभी स्पर्श नहीं होते”
आईये ! इस पर ध्यानपूर्वक एवं गंभीरता पूर्वक विचार करते हुए भावार्थ प्रस्तुत करते हैं।
शरीर के मरने पर या शरीर के छूट जाने पर सुख-दुख भी छूट जाते हैं।जब तक शरीर है शरीर में सुख और दुख ही भरे पड़े रहेंगे।
जैसे कि हम जानते हैं कि शरीर के साथ ही आध्यात्मिक आधिदैविक और आधिभौतिक दुख जुड़े रहते हैं ।
आत्मा संसार में शरीर धारण करता है, जन्म लेता है। आत्मा संसार में आकर सुखी- दुखी होता है। लेकिन ज्ञानी जन्म मरण से छूटकर मोक्ष में चला जाता है। मोक्ष उन आत्माओं का हुआ करता है जिनको तत्वज्ञान , यथार्थ ज्ञान, सत्य ज्ञान, वास्तविक ज्ञान,हो जाता है।
संसार में रहते हुए आत्मा 5 क्लेश क्रमश:अस्मिता, अविद्या, राग, द्वेष,अभिनिवेश से पूर्ण रहता है।
जब यह पांच क्लेश दूर हो जाते हैं तब जन्म मरण से छुटकारा पाता है और ईश्वर के आनंद की प्राप्ति करता है।
आत्मा का स्वरूप कैसा है? आत्मा सरकार है या निराकार है?
आत्मा स्थान घेरती है या नहीं? अर्थात आत्मा परिमाणी है या अपरिमाणी? सरल शब्दों में कहे तो आत्मा के अंदर क्या परमाणु है?
आत्मा परिणामी है अथवा अपरिणामी ? अथवा क्या आत्मा पर किसी प्रकार का प्रभाव पड़ता है?
आत्मा आपस में टकराती हैं या नहीं ?
आत्मा कर्म करने में स्वतंत्र है या परतंत्र ?
उक्त सब बातों का ज्ञान होना ही तत्व ज्ञान है।
रस्सी को रस्सी, सांप को सांप, जड़ को जड़ और चेतन को चेतन, मूर्ति को जड़ ,आत्मा और ईश्वर को चेतन समझ लेना ही यथार्थ ज्ञान है। इसलिए जो आज जड़ की पूजा में लगे हुए हैं ,मूर्ति की पूजा में लगे हुए हैं वो अपने आप तो नरक में जाते ही हैं दूसरे अनुयायियों अर्थात मान्यता वालों को भी नरक में ले जाते हैं।
परंतु इस प्रकृतिजन्य संसार की या प्रकृति की ओर रूप ,रस, गंध, शब्द और स्पर्श के चक्कर में पड़कर अथवा आकर्षित होकर आत्मा अपने रास्ते से भटक जाता है, अपने तत्व ज्ञान से विमुख हो जाता है।वही उसके पतन का कारण बनता है।
वास्तुत: यह संसार प्रवाह से अनादि है।जो अनादि काल से चल रहा है।परंतु यह संसार बड़ा अद्भुत एवं विचित्र है। इस जगत में आत्मा अनादि काल से काम कर रहा है और ईश्वर अनादि काल से ही उस आत्मा के कर्मों का फल दे रहा है । यह भी सत्य है कि यह प्रकृति ही या संसार ही आत्मा के कर्मों के फल का प्राप्त करने का माध्यम है। अथवा ऐसा कह लें कि ईश्वर इसी प्रकृति अथवा जगत के माध्यम से कर्मों का फल देता है। कर्मों का फल एक ही तरीके से रोका जा सकता है कि जीवन धारण न करें। जब तक जन्म के चक्कर में पड़ती रहेगी आत्मा तब तक मृत्यु से भी नहीं बचेगी और जब जन्म लिया है तो दुखों से भी नहीं बचेगी। इसलिए यदि दुखों से ,तापों से और क्लेशों से बचना चाहते हो तो जन्म लेना छोड़ दो। जब तक आत्मा जन्म लेती रहेगी तब तक चारों तापों परिणाम दुख, ताप दुख, गुणवृतिविरोध दुख आदि से अर्थात ऐसे दुखों या तापों से छुटकारा नहीं मिलेगा।
आत्मा क्या है, ?
शरीर शरीर क्या है?
इंद्रियां क्या है ?
अर्थ अर्थात रूप रस गंध आदि विषय क्या है,?
बुद्धि अर्थात ज्ञान क्या है? ज्ञान कैसे प्राप्त हो सकता है,?
मन क्या है,?
प्रवृति अर्थात कर्म क्या है, कैसे हैं,?
दोष राग द्वेष आदि क्या है कितने मेरे अंदर हैं,?
प्रेत्यभाव (पुनर्जन्म) कैसे और क्यों?
, कर्मों का फल ये दुख और मोक्ष कैसे प्राप्त किया जा सकता है?
महर्षि गौतम के न्याय दर्शन के अनुसार इन 12 प्रमेयों (प्रमाणों से जिस वस्तु को जाना जाए उसे प्रमेय कहते हैं)को समझना बहुत आवश्यक है, तभी मोक्ष प्राप्त हो सकेगा। इन 12 वस्तुओं को प्रमाणों से पहचानो कि ये क्या हैं?
इस प्रकार हम देखते हैं कि मोक्ष बहुत आसानी से प्राप्त नहीं होने वाला । लेकिन उसका यह भी मतलब नहीं है मैं किसी को निराश करना चाहता हूं कि मोक्ष प्राप्त ही नहीं होगा।
नहीं ,जब आप एमकॉम की डिग्री या एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहते हैं, जो बहुत मुश्किल होती है लेकिन फिर भी प्राप्त करते हैं। ऐसे ही प्रयास और परिश्रम करने वाले के लिए असंभव कुछ नहीं है।
मोक्ष के विषय में पूछते बहुत हैं समाधि के विषय में जैसे बहुत से लोग पूछते रहते हैं । ऐसे ही अक्सर मोक्ष के विषय में पूछते हैं लेकिन प्रयास नहीं करते हैं। अगर प्रयास करें तो सफलता अपवर्ग के रूप में ‌अवश्य मिलेगी।
क्रमश:
अग्रिम किस्त में।
देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट, ग्रेटर नोएडा।
चलभाष
9811 838317
7827 681439

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