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यह बहुत ही चिंता का विषय है कि देश की 18 वीं लोकसभा के कुल 543 सदस्यों में से 46% सांसद दागी प्रवृत्ति अर्थात आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। पिछली लोकसभा में ऐसे सांसदों की संख्या 43% थी। जब राजनीति में शुचिता और अपराधियों के राजनीतिकरण की प्रक्रिया पर रह – रहकर चर्चाएं की जा रही हों और प्रत्येक राजनीतिक दल इस बात के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त कर रहा हो कि वह राजनीति में शुचिता का पक्षधर है, तब आपराधिक पृष्ठभूमि के जनप्रतिनिधियों के रहते उनके ये दावे कैसे साकार रूप लेंगे ? राजनीति में अपराधियों का होना या अपराधियों में राजनीति का होना, अब यह दोनों बातें चिंतन मंथन का विषय हो चुकी हैं । यदि राजनीतिक दलों के लोगों की गहराई से पड़ताल की जाए तो पता चलता है कि कई लोगों में राजनीति पहले होती है। अपराध बाद में होता है। वे अपराध को इसलिए स्वीकार करते हैं कि इससे मतदाताओं में डर पैदा कर वे जनप्रतिनिधि बनने में सफल हो जाएंगे। कई बार इसलिए भी वह राजनीति में रहकर अपराध को अपनाते हैं कि ऐसा करने से नौकरशाही उनके दबाव में आकर काम करेगी। जिससे वह लोगों की समस्याओं का समाधान करने में सफल होंगे । जिसका लाभ उन्हें चुनाव में मिलेगा। इस प्रकार की प्रवृत्ति लगभग प्रत्येक दल के कार्यकर्ताओं में देखने को मिलती है। जो लोग अपराध के संसार से अपने आप को दूर रखते हैं, छल कपट या इसी प्रकार के घटिया हथकंडों को अपनाने से अपने आप को बचाते हैं, उन भद्र पुरुषों को कभी भी सत्ता के गलियारे उपलब्ध नहीं होते। यदि हो भी जाते हैं तो वह उन गलियारों में अधिक देर टिक नहीं पाते । उन्हें राजनीति धक्का मारकर बाहर भगा देती है। इससे भी दुख की बात यह है कि जब वह सत्ता के गलियारों से बाहर धकियाये जाते हैं तो बाहर खड़ी जनता भी उनका उपहास करती है। कितनी विडंबना है कि जिनकी देश को आवश्यकता है, उन्हें धकियाया जाता है और जो स्वयं जनता जनार्दन को धकियाकर या लतियाकर आगे बढ़ते हैं, उनको फूलमालाएं डाली जाती हैं। क्या बाबा छाप संविधान में ऐसा कहीं लिखा है ?
जिन आपराधिक मानसिकता के लोगों से समाज के लोगों को बचाने के लिए राजनीति का आविष्कार किया गया, यदि वही राजनीति इतनी पापिन हो जाए कि जनसामान्य के अधिकारों का अतिक्रमण करने वाले आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों का संरक्षण करने लगे तो सामान्य लोगों के अधिकारों का इस पर क्या प्रभाव पड़ता होगा ? यह बात हम बहुत गंभीरता के साथ कह रहे हैं कि आज की राजनीति समाज की हत्यारिन बन चुकी है। जब किसी एक राजनीतिक दल का बाहुबली या धनबली चुनाव मैदान में उतरता है तो दूसरा राजनीतिक दल उससे भी बड़े बाहुबली को मैदान में उतारता है। इसमें जनता का दोष कम और राजनीति का दोष अधिक है। क्योंकि जनता के लोग तो केवल वोट डालने के लिए आते हैं। उन्हें यह विकल्प नहीं दिया जाता कि इन बदमाशों के सामने कोई भद्रपुरुष भी मैदान में है। विकल्पहीनता की स्थिति में मतदाता कई बार इन बाहुबलियों में से सबसे बड़े बाहुबली को अपने लिए जनप्रतिनिधि बनाकर विधानमंडलों में भेज देते हैं।
इनमें से अधिकांश बाहुबली ऐसे होते हैं जिन्हें संवैधानिक कानून की बारीकियों का कोई ज्ञान नहीं होता। ऐसे लोगों से आप जनप्रतिनिधि के रूप में देश चलाने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं ?
अब जबकि देश के लोगों से 46% जनप्रतिनिधि आपराधिक पृष्ठभूमि के चुनाव में जितवा लिये गए हों तो समझा जा सकता है कि ये जनप्रतिनिधि संसद को किस प्रकार की मानसिकता से समझेंगे और उसमें कैसा आचरण करेंगे ? चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी समस्याओं का विश्लेषण करने वाली सचेतक संस्था एसोसिएसन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की एक रिपोर्ट हमें बताती है कि वर्ष 2019 में चुने गए सांसदों में जहां 233 अर्थात 43% ने अपने विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज होने की बात स्वीकार की थी, वहीं 18 वीं लोकसभा के लिए 251 सांसदों ने आपराधिक मामले दर्ज होने की बात स्वीकार की है। जब देश आजादी के अमृत महोत्सव को मना रहा हो, तब इतनी बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों का आपराधिक पृष्ठभूमि वाला होना बहुत ही चिंताजनक स्थिति पैदा करता है।
लोगों ने आम आदमी पार्टी के केजरीवाल को इस दृष्टि से देखना आरंभ किया था कि वह राजनीति में शुचिता उत्पन्न करेंगे। परन्तु उन्होंने भ्रष्टाचार के सभी कीर्तिमानों को ध्वस्त करने का कीर्तिमान बनाया है । अब उन्हें भी जेल से बेल मिल गई है। बाहर आकर अब वह कौन से गुल खिलाएंगे, यह तो भविष्य ही बताएगा, परन्तु इतना अवश्य है कि वह भोलीभाली जनता की नजरों में धूल झोंकने का प्रयास अवश करेंगे। जिसे सारी राजनीति बेशर्मी से देखती रहेगी । यदि केजरीवाल की नौटंकी को रोकने का प्रयास भी किया गया तो सारी राजनीतिक पार्टियां जनता की नजरों में धूल झोंक रहे केजरीवाल से भी आगे जाकर धूल झोंकने का काम करके उन्हें रोकने का प्रयास करेंगी । कहने का अभिप्राय है कि संवैधानिक और नैतिक नियमों या परंपराओं या लोकतांत्रिक मूल्यों का सहारा न लेकर अलोकतांत्रिक व सर्वथा त्याज्य और निंदनीय उपायों का सहारा लेकर राजनीति जनता की नजरों में धूल झोंकने के केजरीवाल के काले कृत्यों का सामना करेगी।
बात स्पष्ट है कि जो स्वयं कुशासन का प्रतीक बन चुके हों या कुशासन की क्रूर नीतियों में आकंठ डूब चुके हों, उनसे सुशासन की अपेक्षा कैसे की जा सकती है ? भारत में राजनीति एक सामाजिक तपस्या का नाम है। यह धर्म की सहधर्मिणी के रूप में काम करती है अर्थात सिक्के के एक पहलू का नाम यदि धर्म है तो दूसरे पहलू का नाम राष्ट्रनीति है। राष्ट्रनीति धर्म की अपेक्षा स्थूल है, परंतु 24 घंटे धर्म के अनुकूल आचरण करने से अत्यंत पवित्र हो जाती है। राजनीति की इस पवित्रम अवस्था की खोज भारत के बीते 75 वर्षों से हम करते चले आ रहे हैं। जितना ही हम आगे बढ़ते जा रहे हैं, उतना ही राजनीति के आदर्श और राष्ट्र नीति का धर्म हमसे पीछे छूटता जा रहा है। आज सारी राजनीति के लिए यह बात बहुत विचारणीय है कि हम कहां के लिए चले थे और कहां आकर खड़े हो गए हैं ?

डॉ राकेश कुमार आर्य

(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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