ओ३म् “स्वस्थ मन सभी भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नतियों का आधार है”

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सामान्य मनुष्य आज तक अपनी आत्मा के अन्तःकरण में विद्यमान एवं कार्यरत मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार उपकरणों को यथावत् रूप में नहीं जान पाया है। मनुष्य को मनुष्य उसमें मन नाम का एक करण होने के कारण कहते हैं जो संकल्प विकल्प व चिन्तन-मनन करता है। मनुष्य का मन आत्मा का करण है तथा आत्मा मन के स्वामी के आसन पर विद्यमान है। मनुष्य के भौतिक शरीर में अनेक अवयव व उपकरण हैं जो उचित रीति से अपना अपना कार्य करते हैं तभी शरीर स्वस्थ रहता है। मन आत्मा के सन्देशों को हमारी ज्ञान व कर्म इन्द्रियों के माध्यम से क्रियान्वित करता है तथा हमारी ज्ञान इन्द्रियों द्वारा ग्रहित सांसारिक ज्ञान को आत्मा को पहुंचाता है। हमारी आत्मा बिना आंखों के देख नहीं सकती परन्तु आत्मा आंखों के द्वारा मन का उपयोग कर देखने में समर्थ होती है। इसी प्रकार से सभी ज्ञानेन्द्रियां मन की सहायता से आत्मा को अपने अपने विषयों का ज्ञान कराती हैं। आत्मा के पास ही सत्य व असत्य का निर्णय करने के लिये बुद्धि नामक एक करण होता है। यह बुद्धि व मन का आपस में एक बहुत ही सन्तुलित संबंध होता है। आत्मा, मन व बुद्धि का परस्पर व्यवहार बहुत तीव्रता से होता है। बुद्धि से किसी विषय का निश्चय कर आत्मा मन के माध्यम से उसे शरीर द्वारा क्रियान्वित करता है। इस प्रकार से आत्मा के अपने अन्तःकरण चतुष्टय के चार करणों मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, पांच ज्ञानेन्द्रियों, पाचं कर्मेन्द्रियों एवं अन्य अनेक अंगों एवं प्रत्यंगों से हमारा शरीर कार्य करता है। हमारा कर्तव्य है कि हम सभी इन्द्रियों, अन्तःकरण एवं पूर्ण भोतिक अवयवों को जानें और इनका सुदपयोग कर अपने जीवन को शारीरिक, आत्मिक एवं सामाजिक दृष्टि से स्वस्थ रखें व इन्हें सफल करें। प्राचीन काल में हमारे योगी व ऋषि योग साधना एवं स्वाध्याय-यज्ञ सहित चिन्तन, मनन व ध्यान से इन अंगों, उपांगों व करणों को जानकर इनको स्वस्थ रखते थे और इनसे जीवन के उद्देश्य की पूर्ति में सहयोग लेते थे जिससे उनका जीवन निरोग, स्वस्थ, बलवान, ज्ञानवान तथा देश व समाज के लिए अधिकतम उपयोगी व लाभप्रद होने सहित जीवन-लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त होता था। इसी युग में देश विश्व-गुरु था और धन धान्य व समृद्धि की दृष्टि से विश्व में इसे सोने की चिड़िया के नाम से जाना जाता था।

हमें अपने जीवन को सफल करने के लिये मन को शक्तिशाली एवं नियंत्रित करने की आवश्यकता है। मन को शक्तिशाली बना लेने तथा मन व बुद्धि का सदुपयोग कर हम अपने जीवन को सुखी व सफल बना सकते हैं। मन को शक्तिशाली बनाने के लिये हमें अनेक कार्यों को करना होता है। यह बता दें कि हमारे दर्शनकार बताते हैं कि मनुष्य का मन ही उसके जन्म-मरणरूपी बन्धन व मोक्ष का कारण हैं। बन्धन से आत्मा को सुख व दुःख दोनों प्राप्त होते हैं जबकि मोक्ष की प्राप्ति होने पर मनुष्य के सभी दुःख बहुत लम्बी अवधि 31 नील 10 खरब वर्षों के लिए दूर हो जाते हैं और आत्मा को अत्यधिक सुख व आनन्द की प्राप्ति निरन्तर रहती है। अतः दुःखों की सर्वथा निवृत्ति के लिये भी मन को नियंत्रित करना आवश्यक है। मन को शक्तिशाली बनाने के लिये हमें यह जानना होता है कि मन अन्नमय रचना है। इसका पोषण यदि शुद्ध अन्न यथा गेहूं, चावल, दालें, शाक, सब्जी, गोदुग्ध, दही, गोघृत, फल व वनस्पतियों से होगा तो मन शुद्ध, पवित्र, स्वस्थ एवं शक्तिशाली बनेगा। अतः सभी मनुष्यों को पहला कार्य अपने भोजन पर ध्यान देना है और सदैव शुद्ध शाकाहारी भोजन ही करना है। ऐसा होने पर मनुष्य सत्य संकल्प लेकर उसे पूरा करने में समर्थ हो सकता है।

मन चंचल होता है। यह अभी पृथिवी व अपने शरीर पर केन्द्रित है तो अगले क्षण में चन्द्रमा तथा वहां की परिस्थितियों पर विचार कर रहा होता। यह जागते व सोते हुए भी दूर दूर पूरी पृथिवी, सूर्य व चन्द्र तक पहुंच जाता है। इसे नियंत्रित करने की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार जल के प्रवाह को बांध बनाकर नियंत्रित किया जाता है उसी प्रकार मन को भी दुर्विचारों के त्याग तथा सद्विचारों के चिन्तन से नियंत्रित किया जाता है। मन को नियंत्रित करने के दो मुख्य उपाय बताये जाते हैं। पहला उपाय अभ्यास तथा दूसरा वैराग्य है। जो मनुष्य मन को नियंत्रित करने का अभ्यास नहीं करते उनका मन वश में होना संम्भव नहीं होता है। अभ्यास यही करना है कि जब भी मन में कोई बुरा विचार आये तो उसका त्याग कर दिया जाये। अच्छा विचार आये तो उसे पूरा करने के लिए शीघ्र प्रयत्नशील हो जाना चाहिये। इसी प्रकार मन को प्राणायाम के द्वारा भी नियंत्रित किया जाता है। प्राणायाम के प्रभाव से मन कुछ समय के लिए नियंत्रित हो जाता है। इसका लाभ उठा कर हम जिस विषय का ध्यान व चिन्तन करते हैं उसमें एकाग्रता होने से हमारा उस विषय को समझना व सही निर्णय लेने में आसानी होती है।

मन को नियंत्रित करने के लिए वैराग्य की भावनाओं से युक्त करना भी आवश्यक होता है। यदि मन में अनावश्यक व हानिकारक विषयों का चिन्तन चलता रहेगा तो उससे मन चंचल होकर अधर्म करने में प्रवृत्त हो सकता है। इससे अनेक प्रकार की हानियां होती है। वैराग्य का अर्थ होता है कि हम किसी भी सांसारिक वस्तु से राग न करें। राग का अर्थ होता किसी वस्तु या व्यक्ति विशेष से लगाव रखना। इस लगाव व राग के कारण मनुष्य आध्यात्म पथ से दूर होता है जिससे उसे सांसारिक जीवन में कुछ लाभ हो जाता है परन्तु आध्यात्मिक जीवन में अनेक प्रकार की हानियां भी होती है और वह मोक्ष, मुक्ति व दुःखों की निवृति के लक्ष्यों से दूर हो जाता है। अतः राग व इच्छाओं को नियंत्रित करने के लिये स्वाध्याय एवं सत्संगति का सहारा लेना चाहिये। ऐसा करने से मनुष्य को उचित अनुचित, हित व अहित तथा भौतिक सुखों की प्राप्ति व भोग से होने वाले परिणाम दुःख का ज्ञान होने से वह उनसे बचेगा जो परिणामतः उसे सुख को प्राप्त कराते हैं। वैराग्य का कुछ व्यक्ति अर्थ करते हैं कि वह संसार को छोड़कर ईश्वर की खोज में लग जाता है, गृहस्थ जीवन का त्याग कर देता है तथा संन्यासी बन कर वनों व साधुओं की संगति करता है। यह बातें पूर्ण सत्य नहीं है। सत्संगति, ज्ञान की खोज व आचरण के लिये मनुष्य को गृहस्थ का त्याग करने की आवश्यकता नहीं होती। घर में रहकर स्वाध्याय, सन्ध्या, परोपकार, अग्निहोत्र यज्ञ, दान, साधना आदि अनेक शुभ कार्य सम्पन्न होते हैं। इनको कार्यों को करने से मनुष्य बिना संन्यासी बने भी अपने जीवन को उपयोगी एवं पारमार्थिक कार्यों में लगा सकता है। अतः हमें गृहस्थ जीवन में भी विरक्त होकर त्याग भाव सहित मितभाषी, मितव्ययी, मिताहारी तथा इन्द्रिय संयमी बनना चाहिये। ऐसा करके हम अपने स्वास्थ्य सहित सामाजिक एवं आध्यात्मिक जीवन में उन्नति कर सकते हैं।

मनुष्य को सदैव शुभ संकल्प ही धारण करने चाहिये एवं उनकी पूर्ति के लिये सजगता से प्रयत्नरत रहना चाहिये। इसका परिणाम भी जीवन की उन्नति के रूप में सामने आता है। एक शुभ संकल्प यह भी हो सकता है कि हम वैदिक साहित्य के ग्रन्थों का नियमित स्वाध्याय करेंगे और जो हमारी आत्मा को सत्य प्रतीत होगा उसका आचरण तथा उसके विपरीत का त्याग करेंगे। ऐसा करके भी हम अपने जीवन व मन को उन्नत व बलशाली बना सकते हैं। हमारे विचार शुभ व सात्विक होने चाहिये। वेदाध्ययन करने से हमें यह पता चल जाता है कि हमारे कौन से विचार वेदानुकूल एवं सात्विक हैं और कौन से नहीं। अतः इससे हमें सत्य का ग्रहण एवं असत्य का त्याग करने में सहायता मिलती है। वेद, उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति के अतिरिक्त सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय एवं ऋषि दयानन्द का जीवन चरित भी हम सबको पढ़ना चाहिये। इससे हमारा ज्ञान बढ़कर और तदनुरूप आचरण होकर एक विद्वान संन्यासी के समान हमारा जीवन हो सकता है। ऋषि दयानन्द के विचारों का अध्ययन करके हमें ऐसी ही प्रेरणा मिलती है जिसके परिणाम से हमें स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज, लाला लाजपत राय, पं. चमूपति, स्वामी स्वतन्त्रानन्द सरस्वती आदि अनेक विद्वान व देशभक्त मिले थे।

मन को दुर्विचारों से दूर रखने तथा आत्मा की उन्नति के लिये हमें सन्ध्या व अग्निहोत्र का भी नियमित अनुष्ठान करना चाहिये। वेदों के आधार पर ऋषियों ने इनका विधान किया है और यह मनुष्य के आवश्यक कर्तव्य भी हैं। मनुस्मृति ने विधान है कि जो मनुष्य व द्विज नित्य सन्ध्या व देवयज्ञ नहीं करता उसका द्विजत्व समाप्त हो जाता है। यह बात सर्वथा उचित है। सन्ध्या, स्वाध्याय तथा यज्ञ न करने वाला मनुष्य कब नस्तिक बन चाहे कहा नहीं जा सकता। सन्ध्या व यज्ञ करने से मनुष्य आस्तिक बनता व बना रहता है तथा वेद प्रचार कर पुण्य का भागी व सुखी होता है। मनुष्य के वेदमय जीवन जिसे योगमय जीवन भी कह सकते हैं, व्यतीत करने से मनुष्य की शारीरिक, आत्मिक तथा सामाजिक उन्नति होती है। मनुष्य को अपने मन को नियंत्रित करने के लिये ईश्वर के नाम ‘ओ३म्’ तथा ‘गायत्री-मन्त्र’ का अर्थ सहित जप भी करना चाहिये इससे भी हमारा मन व शरीर स्वस्थ व पवित्र रहते हैं। हम अवसाद, रोगों, दुःखों तथा अकाल मृत्यु से बचते हैं। असत्य कर्म न होने से हमारा अपयश नहीं होता तथा हम निश्चिन्त व रोगरहित होकर अपना दीर्घ जीवन सुख व सन्तोषपूर्वक जीते हैं।

अपने मन को जानने का हमें प्रयत्न करना चाहिये। उसे शुद्ध व पवित्र रखने की क्रियायें करते हुए अभ्यास एवं वैराग्य से पोषित कर अवसादों से बचने तथा सन्तुष्ट जीवन जीनें के लिए मन को नियंत्रित रखने की आवश्कता है, ऐसा हम समझते हैं। मन को नियंत्रित कर मनुष्य स्वस्थ, सुखी व समृद्ध हो सकता है तथा ईश्वर को प्राप्त करने सहित मोक्ष तक को प्राप्त हो सकता है। इसी के साथ इस चर्चा को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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