कोलकाता में बैठी ममता की उत्तर प्रदेश पर नजर

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               प्रभुनाथ शुक्ल 

देश का आम चुनाव जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए जनविश्वास की चुनौती का बड़ा सवाल है। वहीं दूसरी तरफ विखरे विपक्ष की सियासी एकता की अग्निपरीक्षा भी है। आम चुनाव को लेकर देश में शोर की राजनीति है। जनपक्ष से जुड़े जमीनी मुद्दे गायब हैं सिर्फ जुबानी जंग की लड़ाई है। आधुनिक भारत में विज्ञान और विकास के बढ़ते कदम में हम चाँद और सूरज को नाप रहे हैं जबकि राजनीति में हमारी सोच आरक्षण, दलित, सम्प्रदाय, जाति, अगड़ा -पिछड़ा, हिन्दू -मुस्लिम से आगे नहीं निकल पा रही। यह आधुनिक भारत और युवापीढ़ी के लिए शर्म की बात है।

फिलहाल राजनीति भी प्रयोगवाद का विज्ञान है लिहाजा प्रयोग लाजमी है। चलिए हम उसी सियासी प्रयोगवाद के अध्ययन की तरफ ले चलते हैं। उत्तर प्रदेश राजनीतिक लिहाज से बड़ा प्रयोग क्षेत्र है। ‘भाजपा का नारा अबकी बार 400 पार’ की असली जमीन उत्तर प्रदेश ही है। इस बार पश्चिम बंगाल की कुशल राजनीतिज्ञ खिलाडी ममता बनर्जी इण्डिया गठबंधन के रास्ते नया प्रयोग करना चाहती हैं। वह भदोही लोकसभा सीट के जरिए उत्तर प्रदेश की राजनीति में घुसपैठ करना चाहती हैं। उनकी इस सोच को जमीन देने का काम किया है समाजवादी पार्टी के मुखिया एवं यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने। उन्होंने अपनी सियासी दोस्ती में भदोही जैसी अहम सीट तृणमूल की झोली में डाल दिया है। ममता दीदी इस प्रयोग में कितनी सफल होंगी यह वक्त बताएगा।

ममता बनर्जी इस प्रयोगवाद के जरिए भाषाई राजनीति से अलग हटकर उत्तर भारत के सबसे बड़े हिंदी भाषी क्षेत्र में अपनी उपस्थित दर्ज करना चाहती हैं। अगर इण्डिया गठबंधन के जरिए यह प्रयोग सफल रहा तो वह इसी रास्ते हिंदी भूभाग पर राजनैतिक विस्तारवाद की फसल उगाएंगी। उनके इस सफऱ के सबसे अहम साथी यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव होंगे। मोदी बनाम विपक्ष की इस सियासी दोस्ती में दीदी को अखलेश यादव जैसा एक मजबूत सियासी दोस्त मिला है। दीदी के लिए उन्होंने बड़ा दिल दिखाया है। सपा यूपी में 63 जबकि कांग्रेस 17 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

ममता और अखिलेश यादव के बीच हुए इस समझौते में मीडिया में यह बात भी आयी थीं कि अखिलेश यादव पश्चिम बंगाल में समाजवादी पार्टी के उपाध्याय किरणमय नंदा के लिए दक्षिण कोलकाता की सीट चाहते थे। क्योंकि यहाँ पूर्वांचल के आजमगढ़, गाजीपुर और चंदौली जिले के मतदाता काफी संख्या में रहते हैं। जिससे सपा वहां अपनी पैठ जमा सकती है। अब यह समझौता हुआ या नहीं कहना मुश्किल है। किरणमय नंदा 35 साल तक विधायक रहे। वह वाममोर्चा सरकार में 30 साल तक मंत्री रहे। वे समाजवादी विचारधारा के पोषक रहे जिसकी वजह से वे मुलायम सिंह यादव के करीब आए और परिवार में सियासी उठापटक के दौरान वे अखिलेश यादव के साथ मजबूती से खड़े रहे। जिसकी वजह से वह अखिलेश यादव के करीबी बन गए। नंदा की वजह से ही समजवादी पार्टी का अधिवेशन कोलकाता में हुआ था। बंगाल में वह समाजवादी पार्टी को खड़ा करना चाहते हैं।

फिरहाल अखिलेश यादव ने ममता दीदी के लिए बड़ा दिल दिखाया और उन्हें भदोही सीट मिल गई है। हालांकि अखलेश यादव के इस फैसले से पार्टी के बड़े नेता आंतरिक तौर पर खुश नहीं होंगे। लेकिन भदोही के समाजवादी पार्टी के विधायक जाहिद जमाल बेग बातचीत के दौरान इस बात से इनकार किया था। फिलहाल बीमारी की वजह से वे अस्पताल में हैं। यहाँ से ममता ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रहे पंडित कमलापति के प्रपौत्र ललितेश पति त्रिपाठी को चुनावी मैदान में उतारा है।

ललितेशपति का परिवार खानदानी तौर पर कांग्रेस कल्चर से रहा है। ललितेश भी कभी गाँधी परिवार के बेहद करीबी माने जाते रहे। वे कांग्रेस से मिर्जापुर की मडिहान विधानसभा से 2012 में विधायक चुने गए। मिर्जापुर उनके परिवार की सियासी कर्मस्थली रही है। उनके दादा लोकपति त्रिपाठी का यह कर्म क्षेत्र रहा है। ललितेश कभी प्रियंका गाँधी के बेहद खास रहे। लेकिन राजनीति में सबकुछ चलता है। किसी बात से नाराज होकर 2021 में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल की शरण में चले गए। अब ममता ने उन्हें भदोही से उम्मीदवार बनाया है।

पश्चिम बंगाल में इण्डिया गठबंधन का कोई मतलब नहीं है वहां कांग्रेस और ममता एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। ममता दीदी भदोही में ललितेश को चुनावी मैदान में उतार कर सोची समझी रणनीति का परिचय दिया है। उन्होंने कांग्रेस को जहाँ जमीन दिखाई है वहीं एक ब्राह्मण चेहरा उतार कर एक नई सियासत का आगाज किया है। ललितेश कभी कांग्रेस के वफादार सिपाही थे। उनका पूरा खानदान कांग्रेस कल्चर का है लेकिन कांग्रेस से जब ठुकराए गए तो दीदी ने गले लगाया। ममता का दांव कांग्रेस के लिए एक सबक भी है।

दूसरी बात ललितेश एक ब्राह्मण चेहरा हैं। ममता भी ब्राह्मण हैं। भदोही में ब्राह्मण वोटर सबसे अधिक हैं। 2014 के बाद ब्राह्मण भाजपा की झोली में चला गया है। जबकि पश्चिम बंगाल में भाजपा यानी मोदी और ममता की सियासी दुश्मनी जगजाहिर है। इसलिए उन्होंने पूर्वांचल के सियासी दिग्गज परिवार के युवा उमीदवार को उतार कर भजपा के वोट में सेंधमार अपना सियासी दाँव को सफल करना चाहती हैं। क्योंकि भदोही प्रधानमंत्री मोदी की वाराणसी संसदीय सीट की पड़ोसी सीट है। ममता का चुनावी दाँव अगर सफल हो जाता है तो यह मोदी के लिए भी चुनौती होगी।

दूसरी तरफ भदोही समाजवादी और भजपा की टककर वाली सीट है। यहाँ ब्राह्मण, बिंद के बाद मुस्लिम और यादव अच्छी तादात में हैं। भाजपा बंगाल में ममता पर हिन्दु विरोधी होने का आरोप लगाती है। उन्हें बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों और मुस्लिमों का सबसे बड़ा हितचिंतक बताती है। जिसका लाभ ममता को भदोही में मिलेगा। क्योंकि एमवाई यानी मुस्लिम और यादव अखिलेश यादव का बेहद करीबी है। ममता और अखिलेश यादव के राजनीतिक विचारधारा में समानता है जिसका लाभ तृणमूल को मिलेगा।

भदोही का ब्राह्मण अगर हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को किनारे कर ब्रह्मणवाद के लिए शंख बजा दिया तो यहाँ ममता और अखलेश यादव की सियासी दोस्ती गुल खिला सकती है। ममता दीदी को भदोही के रास्ते उत्तर प्रदेश की राजनीति में पाँव फैलाने का अच्छा खासा मार्ग मिल जाएगा। फिलहाल मोदी बनाम विपक्ष की इस लड़ाई में ममता की सियासी गुगली कितनी सफल होती है या समय बताएगा। लेकिन दीदी और अखिलेश की दोस्ती एवं सियासी समझौते को हल्के में लेना भाजपा की बड़ी भूल होगी।

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