वासन्ती नवसस्येष्टि होली का पर्व और देवयज्ञ*

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– विकास आर्य

समय समय पर प्रसन्नता देने वाले पर्व मानव के जीवन में प्रतिवर्ष आते है जिनमें से एक पर्व होली का भी मनाया जाता है। वैसे ये पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है होली का प्राचीन नाम ‘‘वासन्ती नवसस्येष्टि’’ है। वैसे तो सभी पर्व मनमोहक होते है परन्तु ये पर्व बच्चों, बड़ों, महिलाओं और पुरुषों के रंग रूप अन्तर मन को रंग बिरंगा कर देने वाला है। इस पर्व पर सबसे ज्यादा बच्चों के चेहरों पर मुस्कान देखी जा सकती है। यह उत्सव-पर्व वसन्त ऋतु के आगमन पर मनाया जाता है। चैत्र कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को एक दूसरे के चेहरे पर रंग लगाकर या जल में घुले हुए रंग को एक दूसरे पर डाल कर तथा परस्पर मिष्ठान्न का आदान-प्रदान कर इस पर्व को मनाने की परम्परा चली आ रही है। यह भी कहा जाता है कि इस पर्व के दिन पुराने मतभेदो, वैमनस्य एवं शत्रुता आदि को भुला कर नये मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का आरम्भ किया जाता है। कुछ-कुछ कहीं आशानुरूप होता भी है परन्तु इसका पूर्णतः सफल हो ना संदिग्ध है।

सर्वत्र रंग-बिरंगे फूलों के खिले होने से वातारण भी रंग-तरंग-मय या रंगीन सा होता है। इस कारण वासन्ती नवसस्येष्टि होली को रंगो के पर्व की उपमा दी जा सकती है। वसन्त ऋतु भारत में होने वाली 6 ऋतुओं का राजा है। वसन्त ऋतु में शीत ऋतु का अवसान हो जाता है और वायुमण्डल शीतोषण जलवायु वाला होता है। वृक्षों में हरियाली सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है और नाना प्रकार के फूल व हरी पत्तियां सारी पृथिवी पर सर्वत्र दिखाई देतीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति ने किसी विशेष अवसर पर किसी महत्वपूर्ण उद्धेश्य से अपना श्रृंगार किया है। यह श्रृंगार वसन्त ऋतु व चैत्र के महीने से आरम्भ होने वाले नवसंवत्सर का स्वागत करने के लिए ही किया जा रहा प्रतीत होता है। टेसू के वृक्षों पर फूलों से लदी हुई डालियां शोभायमान होकर कहती है कि तुम भी हमारा अनुसरण कर अपने जीवन को विभिन्न सात्विक रंगो से रंग कर नवीन आभा से शोभायमान हो।

इस वातावरण में मन उमंगों से भरा होता है। प्रकृति के इस स्वरूप को देखकर सात्विक मन वाला व्यक्ति कह उठता है कि हे ईश्वर तुम महान हो। नाना प्रकार के फलों, पत्तियों व वनस्पतियों से अलंकृत सारी सृष्टि को देखकर भी यदि मनुष्य इन सबके रचनाकार को अनुभव वा प्रत्यक्ष नहीं करता तो एक प्रकार से उसका ऐसा होना जड़-बुद्धि होने का प्रमाण है। भिन्न-भिन्न रंगों के पुष्पो की छटा एवं सुगन्धि वातावरण में फैल कर सन्देश दे रही है कि तुम भी भिन्न-भिन्न रंगो एवं सुगन्धित अर्थात् विविध गुणों को जीवन मे धारण करो, जो कि आकर्षक हो तथा जिससे जीवन पुष्पो की भांति प्रसन्न, खिला-खिला तथा दूसरों को भी आकर्षित व प्रेरणा देने वाला हो। यह प्रकृति के विभिन्न रंग ईश्वर में से ही तो प्रस्फुटित हो रहे हैं जिससे अनुमान होता है कि सात्विक व्यक्ति को भी निरा एकान्त से वन वाला न होकर समाज के साथ मिलकर अपनी प्रसन्नता को सात्विक रंगो के द्वारा अभिव्यक्त करना चाहिये। ऐसे ही कुछ मनोभावो को होली के फाग वाले दिन लोग क्रियान्वित करते हुए दिखते हैं। होता यह है कि त्यौहार के दिन जिस व्यक्ति को आप नाराज होता है उस पर रंग डालकर स्वयं को प्रसन्न करते हो। आजकल होली के अवसर पर मदिरापान का कृत्य कुछ इसी प्रकार का लगता है। मदिरापान जीवन को विवेकहीन बनाकर पतन की ओर ले जाने वाला पेय है। इस प्रकार से होली मनाने का वैदिक संस्कृति से अनभिज्ञ लोगों का यह अप्रशस्त तरीका है।

हम देखते हैं कि होली पर पूर्णिमा वाले दिन देर रात्रि को होली का दहन करते हैं। बहुत सारी लकड़ियों को एक स्थान पर एकत्रित कर अवैदिक विधि से पूजा-अर्चना कर उसमें अग्नि प्रज्जवलित कर दी जाती है। कुछ समय तक वह लकड़ियां जलने के बाद बुझ जाती है। लोग यह समझते हैं कि उन्होंने कोई बहुत बड़ा धार्मिक कृत्य कर लिया है जबकि ऐसा नहीं है। होली को इस रूप में जलाना किसी प्राचीन लुप्त प्रथा की ओर संकेत करता है। सृष्टि के आरम्भ से ही वेदों की प्रेरणा के अनुसार अग्निहोत्र-यज्ञ करने की प्रथा हमारे देश में रही है। आज भी यह यज्ञ आर्य समाज मन्दिरों एवं आर्यों के घरों में नियमित रूप से किये जाते हैं। होली के दिन सभी अपने-अपने घरों में यज्ञ करते है और गाँव इत्यादि में सामूहिक रूप से भी यज्ञ करते है जिसमें समाज के सभी छोटे बड़े इत्यादि बढ़चढ़ कर भाग लेते है और किसान खेतों में उत्त्पन्न नये अन्न की आहुति यज्ञ में प्रदान करते है।

पूर्णिमा एवं अमावस्या के दिन पक्षेष्टि यज्ञ करने का प्राचीन शास्त्रों मे विधान है जिन्हें पौर्णमास नामों से जाना जाता है। जो कार्य परिवार की इकाई के रूप में किया जाता है वह स्वाभाविक रूप से छोटा होता है तथा जो सामूहिक स्तर पर किया जायेगा वह वृहत स्वरूप वाला होगा जिससे उसका प्रभाव परिमाण के अनुरूप होगा। होली का दिन पूर्णिमा का दिन होता है। फाल्गुन के महीने में इस दिन किसानो के खेतों में गेहूं की फसल लहलहा रही होती है। गेहूं की बालियों में गेहूं के दाने पूरी तरह बन चुके हैं, अब उनको सूर्य की धूप चाहिये जिससे वह पक सकें। इन गेहूं की बालियों वा इनके भुने हुए दानों को होला कहते हैं। कुछ दिनों बाद ही वह फसल पककर तैयार हो जायेगी और उसे काटकर किसान अपने घर के खलिहानों में संभालेगे। इस संग्रहित अन्न से पूरे वर्षभर तक उनका परिवार एवं देशवासी उपभोग करेगें जिससे सबको बल, शक्ति, ऊर्जा, आयु, सुख, प्रसन्नता एवं आनन्द आदि की उपलब्धि होगी। गेहूं की बालियों को पूर्णिमा के यज्ञ में डालने से वह अग्नि देवता द्वारा संसार के समस्त प्राणियों एवं देवताओं को पहुँच जाती हैं और देवताओं का भाग उन्हें देने के बाद कृषक एवं अन्य लोग उसका उपयोग व उपभोग करने के लिए पात्र बन जाते हैं।

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