महर्षि दयानंद जी का स्वलिखित जीवन चरित्र, भाग 10 रावल जी से अन्तिम भेंट-

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मुझे देखकर रावज जी और उनके साथी, जो सब घबराये हुए थे, आश्चर्य चकित रह गये और उन्होंने मुझसे पूछा कि आज सारे दिन तुम कहां रहे ? तब मैंने जो कुछ हुआ था अक्षरशः सुना दिया। उस रात्रि को थोड़ा सा खाना खाकर, जिससे कि मेरी शक्ति नये सिरे से लौटती हुई प्रतीत हुई- मैं सो गया परन्तु दूसरे दिन प्रात:काल शीघ्र ही उठा और उठकर रावल जी से आगे जाने की आज्ञा मांगी और अपनी यात्रा पर चल पड़ा और रामपुर को प्रस्थान किया । उस शाम को चलता-चलता मैं एक योगी के घर जा पहुंचा जो एक बड़ा भारी उपासक था और उसके घर पर रात काटी। वह योगी जीवित ऋषियों और साधुओं में अत्यन्त उच्च कोटि का प्रसिद्ध ऋषि था और धार्मिक विषयों पर उसके साथ बहुत समय तक मेरी बातचीत हुई ।
अपने निश्चय को पहले से अधिक दृढ़ करके मैं अगले दिन प्रातःकाल उठते ही आगे को चल दिया और कई वनों और पर्वतों में से होकर और चिल्काघाटी (या चिल्किया घाट पर से उतर कर मैं अन्त में ‘रामपुर’ पहुंच गया और वहां पहुंच कर मैंने प्रसिद्ध रामगिरी के गृह पर निवास किया। यह व्यक्ति अपने जीवन की बहुत बड़ी पवित्रता और आत्मिक जीवन की शुद्धता के कारण बहुत विख्यात था। मैंने भी उसको विचित्र स्वभाव का देखा अर्थात् वह सोता नहीं था प्रत्युत सारी रातें बड़े ऊंचे शब्द से बातें करने में व्यतीत कर देता था और वह बातें वह प्रकटतया अपने साथ ही करता प्रतीत होता था । प्राय: बड़े ऊंचे शब्द से हमने उसको चीख मारते सुना और फिर कई बार हमने उसको रोते हुए और चीख मारते अथवा ध्वनि करते हुए पाया परन्तु जब उठकर देखा तो वहां उसके कमरे में उसके अतिरिक्त और कोई मनुष्य दिखाई न दिया । मैं इस बात से अत्यन्त चकित तथा आश्चर्यान्वित हुआ और मैंने उसके शिष्यों आदि से पूछा तो उन बेचारों ने केवल यही उत्तर दिया कि इसका ऐसा ही स्वभाव है परन्तु कोई मुझको यह न बतला सका कि इसका क्या अर्थ है? अन्त में जब मैंने कई बार उस साधु से निजीरूप से एकान्त में भेंट की तो मुझको विदित हो ही गया कि वह क्या बात थी और इस प्रकार से मैं इस बात का निश्चय करने के योग्य हो गया कि अभी वह जो कुछ करता है वह पूरी-पूरी योगविद्या का परिणाम नहीं प्रत्युत उसमें अभी कमी है और यह वह चीज नहीं है जिसकी मुझको खोज है और न यह पूरा योगी है, प्रत्युत योग में कुछ निपुणता रखता है ।

काशीपुर आदि की ओर 

उससे विदा होकर मैं ‘काशीपुर’ गया और वहां से ‘द्रोणसागर’ पहुंचा जहां मैंने शीत ऋतु व्यतीत की। हिमालय पर्वत पर पहुंच कर देह त्याग देना चाहिये ऐसी इच्छा हुई परन्तु यह विचार मन में आ गया कि ज्ञानप्राप्ति के पश्चात् देह छोड़नी चाहिये। वहां से आगे ‘मुरादाबाद’ होता हुआ मैं ‘सम्भल’ जा पहुंचा और वहां से ‘गढ़मुक्तेश्वर’ को पार करता हुआ फिर गंगा नदी के तट पर पहुंचा। उस समय और धार्मिक पुस्तकों के अतिरिक्त मेरे पास निम्नलिखित पुस्तकें भी थीं— शिवसंध्या “, हठप्रदीपिका, योगबीज, केसराना संगीत १५ – इन पुस्तकों को मैं अपनी यात्रा में प्राय: पढ़ा करता था । इनमें से कुछ के विषय हठ योग और नाड़ीचक्र अर्थात् मनुष्य की नाड़ियों को बताने वाली विद्या से सम्बद्ध थे । इनमें ऐसी बातों का ऐसा लम्बा चौड़ा वर्णन किया हुआ था कि मनुष्य पढ़ता-पढ़ता थक जाता था और उनको मैं कभी भी पूर्णरूप से अपनी बुद्धि के वश में न ला सका और न पूर्णरूप से कभी मैं उनको स्मरण कर सका और न पूर्णरूप से समझ सका ।

शव को चीरकर नाड़ी ग्रन्थ की जांच, ऋषि की मौलिकता : असत्य से तीव्र घृणा-

इनसे यह विचार उत्पन्न हुआ कि पता नहीं यह ठीक भी है या नहीं। इनके ठीक होने में मुझको सन्देह पड़ गया। मैं प्रायः अपने सन्देह निवृत करने का प्रयत्न करता रहा, परन्तु आज तक मेरे यह सन्देह दूर नहीं हो सके और मुझे इनको दूर करने का कोई अवसर भी प्राप्त न हुआ। एक दिन की बात है कि मुझको अकस्मात् एक शव नदी के ऊपर बहता हुआ मिला। उस समय ठीक अवसर मिला था कि मैं उनकी परीक्षा करता और अपने मन की उन बातों के विषय में जो उन पुस्तकों में लिखी थीं, अपने सन्देह की निवृत्ति करता। अतः उन पुस्तकों को जो मेरे पास थीं एक ओर अपने समीप रखकर वस्त्रों को ऊपर उठा कर मैं दृढ़तापूर्वक नदी में घुसा और शीघ्रता से भीतर जाकर शव को पकड़ कर तट पर लाया। मैंने उसको एक तेज चाकू से अच्छी प्रकार जैसे मुझ से हो सकता था, काटना प्रारम्भ किया। मैंने हृदय को उसमें से निकाल लिया और ध्यानपूर्वक उसकी परीक्षा की और देखा और हृदय को नाभि से पसली तक काटकर मैंने अपने सामने रखकर देखने का यत्न किया और जो वर्णन पुस्तक में दिया था, उससे समता करने लगा और इसी प्रकार सिर और गर्दन के एक भाग को भी काटकर सामने रख लिया। यह जानकर कि इन पुस्तकों और शव में आपस में कोई समानता नहीं, मैंने पुस्तकों को फाड़कर उनके टुकड़े-टुकड़े कर डाले और शव को फेंक कर साथ ही उन पुस्तकों के टुकड़ों को भी नदी में फेंक दिया। धीरे-धीरे उसी समय से मैं यह परिणाम निकालता गया कि वेदों, उपनिषदों, पातञ्जल योग और सांख्यदर्शन के अतिरिक्त समस्त पुस्तकें, जो विज्ञान और योगविद्या पर लिखी गई है, निरर्थक और अशुद्ध हैं।

गंगातटवर्ती स्थानों का भ्रमण

गंगा नदी के तट पर कुछ दिन और इसी प्रकार फिर कर मैं फिर फर्रूखाबाद पहुंचा और जब कि सरन जी राम से होकर मैं छावनी के पूर्व जाने वाली सड़क से कानपुर को जाने वाला था तो संवत् १९९२ विक्रमी (तदनुसार ५ अप्रैल १८५६) समाप्त हुआ (उस समय आपकी आयु ३२ वर्ष की थी)। कानपुर, इलाहाबाद व बनारस में (संवत् १९१३) –अगले पांच महीनों में मैंने कई बड़े-बड़े स्थान जो कानपुर और इलाहाबाद के मध्य में थे, देखे। भाद्रपद तदनुसार अगस्त मास सन् १८५६ के आरम्भ में रविवार को मैं मिर्जापुर के समीप बनारस में जा पहुंचा, जहां एक मास से अधिक काल तक मैं विन्ध्याचल अशोल जी के मन्दिर में ठहरा असौज (१५ सितम्बर १८५६ सोमवार) के प्रारम्भ में बनारस पहुंचा और उस स्थान पर जाकर उस गुफा में ठहरा जो बरना और गंगा के संगम पर स्थित है और जो उस समय भवानन्द सरस्वती” के कब्जे में थी। वहां पर कई शास्त्रियों अर्थात् काकाराम राजाराम आदि से मेरी भेंट हुई। वहां में केवल १२ दिन ही रहा तत्पश्चात् जिस वस्तु की खोज में था , उसके लिये आगे को चल दिया।

अपने दुर्व्यसन की स्वीकारोक्ति तथा उसका परित्याग-

१ अक्तूबर सन् १८५६ बुधवार तदनुसार आसौज सुदी २ संवत् १९९३ को दुर्गाकुण्ड के मन्दिर पर जो चांडालगढ़ में स्थित है, पहुंचा। वहां मैंने दस दिन व्यतीत किये। • वहां मैंने चावल खाने बिल्कुल छोड़ दिये और केवल दूध पर अपना निर्वाह करके दिन रात योगविद्या के पढ़ने और उसके अभ्यास में संलग्न रहा। दुर्भाग्य से इस स्थान पर मुझे एक बड़ा व्यसन लग गया अर्थात् मुझको भंग सेवन करने का अभ्यास पड़ गया और प्रायः उसके प्रभाव से मैं मूर्छित हो जाया करता था। एक दिन की बात है जब मैं मन्दिर में से निकलकर एक ग्राम की ओर , जो चांडालगढ़ के समीप है, जा रहा था, वहां मुझको पिछले दिनों का परिचित मेरा एक साथी मिला। गांव के दूसरी ओर कुछ दूरी पर एक शिवालय था जहां मैंने जाकर रात व्यतीत की। वहां जब मैं भंग की मादकता की दशा में मूर्च्छित पड़ा सोता था तो मैंने एक स्वप्न देखा और वह यह था अर्थात् मुझे ध्यान आया कि मैंने महादेव और उसकी स्त्री पार्वती को देखा। पार्वती महादेव जी से कह रही थी और उनकी बातों का विषय मैं ही था अर्थात् वह मेरे विषय में बातें कर रहे थे। पार्वती महादेव जी से कह रही थी कि अच्छा हो यदि दयानन्द सरस्वती का विवाह हो जावे परन्तु देवता इस बात से विरोध प्रकट कर रहा था। उसने मेरी भंग की ओर संकेत किया अर्थात् भंग का प्रसंग छेड़ा। जब मैं जागा और इस स्वप्न का विचार किया तो मुझे बड़ा दुःख और क्लेश हुआ। उस समय अत्यन्त वर्षा हो रही थी और मैंने उस बरामदे में जो कि मन्दिर के बढ़े द्वार के सम्मुख था- विश्राम किया। उस स्थान पर सांड अर्थात् नन्दी देवता की मूर्ति खड़ी हुई थी। अपने वस्त्रों और पुस्तक को उसकी पीठ पर रखकर मैं बैठ गया और अपनी बात को सोचने लगा। ज्यों ही अकस्मात् मैंने उस मूर्ति के भीतर की ओर दृष्टि डाली तो मुझको एक मनुष्य उसमें छुपा हुआ दिखाई पड़ा। मैंने अपना हाथ उसकी ओर फैलाया जिससे वह बहुत डर गया, क्योंकि मैंने देखा कि उसने झटपट छलांग मारी और छलांग मारते ही गांव की ओर सरपट दौड़ गया। तब मैं उसके चले जाने पर उस मूर्ति के भीतर घुस गया और शेष रात वहीं सोता रहा । प्रातःकाल एक वृद्धा स्त्री वहां पर आई और उसने उस सांड देवता की पूजा की जिस अवस्था में कि मैं भी उसके भीतर ही बैठा हुआ था। उसके थोड़े समय पश्चात् वह गुड़ और दही लेकर लौटी और मेरी पूजा करके और मुझको भूल से देवता समझ कर उसने कहा कि आप इसको स्वीकार कीजिये और कुछ इसमें से सेवन कीजिए। मैंने भूख होने के कारण उसको खा लिया। दही चूंकि बहुत खट्टा था, इसलिये भंग का मद उतारने में अच्छी औषधि बन गया। उससे मद जाता रहा जिससे मुझको बड़ा विश्राम मिला (आगे को भंग का सेवन बिल्कुल त्याग दिया)।
क्रमशः

डॉ राकेश कुमार आर्य

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