वैदिक सम्पत्ति-304 चतुर्थ खण्ड) जीविका, उद्योग और ज्ञानविज्ञान

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(ये लेखमाला हम पं. रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक संपत्ति” नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहें हैं।

प्रस्तुतिः देवेन्द्र सिंह आर्य (चेयरमैन ‘उगता भारत’)

गतांक से आगे……

प्रजा के द्वारा ऐसे राजा को चुनने के लिए वेद उपदेश करते हैं कि-

आ त्वाहार्षमन्तरेधि ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलिः ।
विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधि भ्ररात् ।। १ ।।
इहैवैधि माप च्योष्ठाः पर्वत इवाविचाचलिः ।
इन्द्र इवेह ध्रुवस्तिष्ठेह राष्ट्रमु धारय ।। २ ।।

(ऋग्वेद १०/१७३)

अर्थात् हे महापुरुष ! हम तुझको लाये हैं, इसलिए अन्दर आ और चञ्चल न होकर स्थिर रह, जिससे तुझे समस्त प्रजा चाहती रहे और तुझसे राष्ट्र का कभी पतन न हो। यहाँ आकर पर्वत के समान स्थिर होकर ठहर जा और इन्द्र के समान स्थिर होकर राष्ट्र को धारण कर, जिससे कभी राष्ट्र का पतन न हो। इन मन्त्रों में प्रजा के द्वारा राजा के मनोनीत करने की आज्ञा है। आगे वेद उपदेश करते हैं कि किस प्रकार के पुरुष को राजा बनाना चाहिये । अथर्ववेद में लिखा है कि-

भतो भूतेषु पय आ दधाति स भूतानामधिपतिर्वभूव ।
तस्य मृत्युश्चरति राजसूयं स राजा राज्यमनु मन्यतामित्रम् ।। (अथर्व० ४।८।१)

अर्थात् वही सब प्राणियों का अधिपति होने योग्य है, जो समस्त संसार का दुग्धादि अन्नों से अच्छी तरह पोषण करता है। उसकी मृत्यु राजसूय को प्राप्त होती है, इसलिए वही राजा होकर इस राज्य को अङ्गीकार करे। इस मन्त्र में बतलाया गया है कि जो महापुरुष प्रजापालन के लिए अपने जीवन का उत्सर्ग करने को तत्पर हो, वही राजा होने योग्य है, ऐसे राजा को पाकर प्रजा को चाहिये कि वह उसे खूब बलवान् बनावे। इस विषय में वेद उपदेश करते हैं कि-

इममिन्द्र वर्धय क्षत्रिय’ म इमं विशामेकवृषं कृणु त्वम् । निरमित्रानष्णुह्यस्य सर्वांस्तान् रन्धयास्मा अहनुत्तरेषु ।। (अथर्व० ४।२२:१)

अर्थात् हे इन्द्र ! तू हमारे इस क्षत्रिय को बलवान् बना, इसी एक को सब प्रजायों का नेता कर, इसके शत्रुओं को दूर कर और उनका सदैव नाश किया कर। इस मन्त्र के द्वारा वेदों ने प्रजा की ओर से राजा को बलवान् बनाने की आज्ञा दी है। अब अगले मन्त्र में प्रजा को आश्वासन देने के लिए राजा को आज्ञा दी गई है। राजा कहता है कि-

प्रति क्षत्रे प्रति तिष्ठामि राष्ट्रे प्रत्यश्वेषु प्रति तिष्ठामि गोषु ।
प्रत्यङगेषु प्रति तिष्ठाम्यात्मन् प्रति प्राणेषु प्रति तिष्ठामि
पुष्टे प्रति द्यावापृथिव्योः प्रति तिष्ठामि यज्ञे ।। (यजुर्वेद २०/१०)

अर्थात् मैं क्षत्र में, राष्ट्र में, घोड़ों में, गौवों में, अङ्गों में, चित्तों में, प्राणों में, पुष्टि में, द्यौ में, पृथिवी में और यज्ञ में प्रतिष्ठावाला होऊँ। इस मन्त्र में राजा ने बतला दिया है कि मैं ऐसे काम करूगा, जिससे मेरी सर्वत्र प्रतिष्ठा हो । अब अगले मन्त्रों में बतलाया जाता है कि राज्य का उत्तम काम चलाने के लिए राजपुरुषों और प्रजापुरुषों की सभाओं की आयोजना होनी चाहिये। अथर्ववेद में लिखा है कि-

सभा च मा समितिश्चावतां प्रजापतेर्दु हितरौ संविदाने ।
येना सङ्गच्छा उप मा स शिक्षाच्चारू वदानि पितरः सङ्गतेषु ।। (अथर्व० ७।१२।१)

बिह्म ते सभे नाम नरिष्टा नाम वा असि ।
ये ते के च सभासदस्ते में सन्तु सवाचसः ।। (अथर्वे० ७।१२।२)

यह राजानो विभजन्त इष्टापूर्तस्य षोडशं यमस्यामी सभासदः । अविस्तस्मास्त्र मुञ्चति दत्तः शितिपात् स्वधा ।। १॥

सर्वान् कामान् पूरयत्याभवन् प्रभवन् भवन् ।

आकृतिप्रोऽविर्वत्तः शितिपान्नोप दस्यति ।। २ ।। (अथर्व० ३।२६ १-२)

अर्थात् राजा की सभा और समितिरूपी दो लड़कियाँ मेरी रक्षा करें। वे दोनों आपस में मेल रखनेवाली हों, जिससे मैं जिस सभासद के साथ मिलू, बह मुझे ज्ञान देवे, अतः हे सभासदो ! आप लोग सङ्गतों और सभाओं में ठीक ठीक बोलिए। हे सभा! हम तेरा नाम जानते हैं, अतः जो तेरे सभासद हैं, वे मेरे साथ सत्य वचन बोलनेवाले हों। राष्ट्रपति के जो बड़े बड़े राजे (प्रान्तिक सरकार) सभासद् हैं वे इष्टापूर्त का सोलहवाँ भाग केन्द्रिय सरकार को बोट देते हैं। वह बांटा हुधा धन उनका रक्षक होता है, उन्हें हानि से बचाता है और आत्मनिर्णय के लिए बल देता है। यह दिया हुआा कर रक्षक बनकर हानियों से बचाता है और सङ्कल्पों को पूर्ण करता हुआ सब कामनाओं को विजयी, प्रभावशाली और वृद्धियुक्त करके पूर्ण करता है।

क्रमशः

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