लिंग भेद को मिटाने में डिजिटल विकास की भूमिका

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सैय्यदा तैयबा कौसर
पुंछ, जम्मू

“अभी का युग डिजिटल युग है. जिसमें हम अपनी आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा कर सकते हैं. अब हमारे लिए सभी बाधाएं छोटी पड़ गई हैं. मेरे लिए अब उच्च शिक्षा प्राप्त करना आसान हो गया है. जिस तरह से सलमा दीदी घर में ही रह कर अपनी शिक्षा प्राप्त करने का ख्वाब पूरा कर रही है, इसी प्रकार मैं भी अपनी आगे की पढ़ाई पूरी कर सकती हूँ. अब तो उच्च शिक्षा के लिए लड़की को बाहर भेजने की मेरी अम्मी-अब्बू की चिंता भी दूर हो गई है.” यह कहना है 16 वर्षीय आसिया का जो इस वक़्त जम्मू के सीमावर्ती जिला पुंछ के सुदूर गांव बांडी चेंचियां में 11वीं कक्षा की छात्रा है. आसिया की बड़ी बहन सलमा ने पिछले वर्ष ही इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) में दाखिला लिया और अपनी पढ़ाई के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल कर रही है. 12वीं के बाद आगे की पढ़ाई के लिए उसे पुंछ शहर जाना पड़ता, लेकिन उसके माता-पिता ने उसे इसकी इजाज़त नहीं दी. जिसके बाद उसने इग्नू में दाखिला लिया और अब ऑनलाइन पढ़ाई कर अपने सपने को पूरा कर रही है.

दरअसल, डिजिटल युग के आगमन ने समाज के सभी पहलुओं में परिवर्तनों की शुरुआत की है, जिसका एक उल्लेखनीय प्रभाव जेंडर पर भी पड़ा है. प्रौद्योगिकी के व्यापक उपयोग की विशेषता वाले डिजिटल प्रभुत्व ने सभी बाधाओं को तोड़ने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. डिजिटल प्रौद्योगिकी की प्रगति ने जीवन के सभी पहलुओं में क्रांति ला दी है. शैक्षिक परिदृश्य में तो इसकी भूमिका विशेष रूप से प्रमुख है, जो दुनिया भर में महिलाओं और किशोरियों के लिए अभूतपूर्व अवसर प्रदान कर रही है. ऑनलाइन शिक्षण प्लेटफार्मों ने लड़कियों के लिए शिक्षा तक पहुंच को आसान बना दिया है, जिससे दूरदराज के क्षेत्रों में लड़कियों को अपने शैक्षिक प्रयासों को आगे बढ़ाने में मदद मिल रही है.

बांडी चेंचियां की 22 वर्षीय सलमा भी इसी का एक उदाहरण है. वह स्कूल स्तर पर एक प्रतिभाशाली छात्रा रही है और उच्च शिक्षा हासिल करना चाहती थी. लेकिन जैसा कि सभी जानते हैं कि भारत में अधिकांश ग्रामीण लोगों की वित्तीय स्थिति और लड़कों की तुलना में लड़कियों की शिक्षा पर खर्च के प्रति समाज का नकारात्मक रवैया रहा है. ऐसे में अधिकांश किशोरियों की उच्च शिक्षा खतरे में रही है. वित्तीय और सामाजिक परिस्थितियों के कारण 12वीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद, इस क्षेत्र की अधिकांश लड़कियों की शादी आम प्रचलन है. जिससे वह उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अपने सपनों को पूरा करने में असमर्थ रहती हैं. ऐसे में डिजिटल माध्यम (इंटरनेट) के ज़रिये अपने सपनों को पूरा करना उनके लिए एक सशक्त माध्यम बनता जा रहा है. सलमा ने भी इसी डिजिटल क्रांति को अपने सपने को पूरा करने का माध्यम बनाया है.

इस तरह वह अपने परिवार में स्नातक की पढ़ाई करने वाली पहली लड़की बन गई है. इस तरह, उसने न केवल अपने परिवार की बाकी लड़कियों के लिए बड़े सपने देखने का मार्ग प्रशस्त किया है, बल्कि उन्हें यह भी बताया कि उन्हें भी अपने परिवार के लड़कों के समान शिक्षा का पूरा अधिकार है. वर्तमान में, सलमा अब अपनी पढ़ाई के साथ साथ विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारियां भी कर रही है और उसे पूरी उम्मीद है कि एक दिन वह अपने पैरों पर खड़ा होने और सशक्त बनने के अपने सपने को पूरा करेगी. सलमा अपनी छोटी बहन आसिया के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं. अपनी बहन की पढ़ाई के प्रति लगन को देखने के बाद आसिया भी अब बड़े सपने देखना चाहती है और उसे उम्मीद है कि एक दिन वह भी आत्मनिर्भर बनेगी और खुद को सामाजिक बंधनों से मुक्त कर लेगी. सलमा की सफलता के बाद अब आसिया ही नहीं बल्कि आसपास की अन्य लड़कियों को भी प्रोत्साहन और मार्गदर्शन मिला है.

डिजिटल प्रगति ने शिक्षा के साथ साथ रोजगार परिदृश्य को भी नया आकार दिया है, जिससे महिलाओं को विभिन्न उद्योगों में प्रवेश करने के नए रास्ते उपलब्ध हुए हैं. डिजिटल कनेक्टिविटी से संभव हुए दूरस्थ कार्य ने महिलाओं के लिए अवसर के नए द्वार खोल दिए हैं. इससे उन्हें पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए व्यक्तिगत कार्यबल में अधिक सक्रिय रूप से भाग लेने का अवसर मिला है. 22 साल की रुखसार काज़मी ऐसी ही एक मिसाल हैं, जो पढ़ाई के अलावा वर्तमान में ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाली गैर लाभकारी संस्था चरखा में स्वयंसेवी प्रशिक्षक भी हैं. इस संगठन का मुख्यालय दिल्ली में है, लेकिन इंटरनेट की मदद से वह दिल्ली से करीब 850 किमी दूर अपने गांव बांडी चेंचियां में अपने घर से उनके साथ काम कर रही है. रुखसार कहती है कि “लोगों की आवाज बनने में सक्षम होना, कुछ ऐसा कार्य है जिस पर मुझे गर्व है. मेरे साथ ग्रामीण लेखकों की एक टीम है. मुझे लगता है कि इसमें इंटरनेट की बहुत बड़ी भूमिका है. गूगल ज़ूम मीटिंग और व्हाट्सएप जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म इसमें मेरी मदद करते हैं. इसकी वजह से मैं हमेशा अपनी टीम से जुड़ी हुई रहती हूं, चाहे वे कहीं भी हों. मैं और मेरी टीम के सदस्य अपने क्षेत्र के बारे में लिख सकते हैं और समाचार पत्रों के माध्यम से देश भर के लोगों तक उनके मुद्दे पहुंच सकते हैं. यदि इंटरनेट और डिजिटल विकास नहीं होता, तो मैं गांव के बाहर की दुनिया तक पहुंच नहीं पाती और आज इतना आत्मनिर्भर और स्वतंत्र नहीं बन पाती.”

इतना ही नहीं, डिजिटल प्लेटफॉर्म ने आज उद्यमिता के क्षेत्र में भी महिलाओं को समान अवसर प्रदान किया है और उन्हें अपने व्यवसाय को लॉन्च करने और बढ़ावा देने के लिए एक पहचान दी है. ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया और ऑनलाइन मार्केटिंग ने उनके सामने आने वाली सभी बाधाओं को समाप्त कर दिया है, जिससे महिला उद्यमियों को वैश्विक स्तर तक पहुंचने में मदद मिली है. ग्राहकों से जुड़ने, लेनदेन का प्रबंधन करने और उत्पादों या सेवाओं को डिजिटल रूप से बढ़ावा देने की क्षमता, महिलाओं के लिए व्यवसायों में गेम चेंजर साबित हुई है. इस सिलसिले में 40 साल की रजिया बेगम का नाम अहम हो जाता है. जो बांडी चेंचियां में ही अपनी जनरल स्टोर की दुकान चलाती हैं. उन्होंने कहा, ”इस डिजिटल युग में लोग ऑनलाइन भुगतान करना चाहते हैं, लेकिन मुझे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी. जिसका असर मेरे बिजनेस पर पड़ रहा था. फिर मेरी बेटी ने मुझे पेटीएम और नेट बैंकिंग के बारे में बताया और इसका इस्तेमाल करना भी सिखाया. जिसके बाद अब मुझे व्यापारिक लेन-देन बहुत आसान लगता है. पहले मुझे इस काम के लिए घर के पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता था. लेकिन अब मैं सारी वित्तीय लेनदेन खुद ही करती हूं. निश्चित रूप से डिजिटल दुनिया मेरे लिए कई समस्याओं का समाधान बनकर आई है.

डिजिटल प्रभुत्व ने सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर महिलाओं की आवाज़ को बुलंद किया है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म समर्थन के लिए एक मंच प्रदान कर रहा है, जिससे महिलाओं को अपने अनुभव साझा करने, जागरूकता बढ़ाने और लैंगिक समानता के लिए समर्थन जुटाने में मदद मिल रही है. इसका एक उदाहरण 18 साल की युवा किशोरी सहरिश है. स्नातक प्रथम वर्ष की छात्रा सहरिश पुंछ के ‘कस्बा’ गांव की रहने वाली है. जिसने अपनी प्रतिभा से लोगों को परिचित कराने के लिए सोशल मीडिया मंच का बखूबी इस्तेमाल किया है. इसके माध्यम से वह अपनी कला और पेंटिंग कौशल को एक पहचान दे रही है. दूरदराज के इलाके से होने के कारण सोशल मीडिया ही उनके लिए एकमात्र माध्यम बचा था. जहां वह अपनी प्रतिभा को लोगों के साथ साझा कर रही है. इसमें वह सफल भी रही है. आज वह इस प्लेटफॉर्म के जरिए अपनी एक अलग पहचान बना रही है. इसके साथ ही वह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रोजमर्रा के मुद्दों पर अपनी आवाज उठाने में भी सक्रिय रहती है. सहरिश का कहना है कि ”सोशल मीडिया के माध्यम से मैं न केवल अपनी प्रतिभा बल्कि अपने आसपास मौजूद हजारों लोगों की आवाज भी बनना चाहती हूं.” सोशल मीडिया पर प्रतिभा दिखाने का विचार कैसे आया? इस सवाल के जवाब में वह कहती है, ”मैंने यूट्यूब पर लोगों को ऐसा करते देखा तो मैंने सोचा कि जब वे ऐसा कर सकते हैं तो मैं भी इस डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल क्यों नहीं कर सकती? डिजिटल उन्नति ने देश के सुदूर ग्रामीण इलाकों में हम जैसी किशोरियों के लिए अवसरों के द्वार खोल दिए हैं. अब हमारे लिए सभी बाधाओं को पार करना आसान हो गया है.”

हालांकि, सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समाज में रहने के बावजूद ये महिलाएं और किशोरियां कई तरह से अपने संघर्षों का सामना कर रही हैं. तमाम बाधाओं के बावजूद उन्होंने इसे पार किया और आज उन लड़कियों के लिए सफलता की एक मिसाल बन गई हैं जो यह सोचती हैं कि देश के सुदूर इलाके में रहने के कारण उन्हें मौका नहीं मिल पाता है. शिक्षा और रोजगार के अवसरों को उद्यमिता और सामाजिक सशक्तिकरण में बदलने से लेकर डिजिटल विकास ने एक समावेशी और न्यायसंगत दुनिया को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. हालांकि चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं. लेकिन इसके बावजूद उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं में प्रौद्योगिकी का निरंतर एकीकरण आगे के विकास के लिए आशाजनक रास्ते प्रदान करता है. डिजिटल विकास के माध्यम से लिंग भेद को समाप्त करने की यह एक शुरुआत मात्र है. अब यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि डिजिटल प्रभुत्व के लाभ समाज के सभी वर्गों के लिए सुलभ हो. यह लेख संजॉय घोष मीडिया अवार्ड 2023 के तहत लिखा गया है. (चरखा फीचर)

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