स्वामी दयानंद जी के जीवन के गुमनामी के चार पांच वर्ष

images (11)

स्वामी दयानंद जी महाराज के जीवन पर यद्यपि बहुत कुछ लिखा जा चुका है पर उनसे जुड़ी हुई कई ऐसी पहेलियां आज भी इतिहास के लिए कौतूहल का विषय बनी हुई हैं ,जिनका उत्तर खोजा जाना समय की आवश्यकता है। इनमें से सबसे बड़ी पहेली है कि स्वामी दयानंद जी महाराज 1856 से 1860 के बीच में क्या कर रहे थे ? ये चार-पांच वर्ष उनके जीवन के ऐसे कालखंड की ओर संकेत करते हैं जिन पर कई प्रकार के रहस्यों के पर्दे पड़े हुए हैं। हमारा मानना है कि स्वामी दयानंद जी महाराज जैसा कर्मशील व्यक्ति अपने इन 5 वर्षों में भी निष्क्रिय होकर नहीं बैठ सकता था। उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक पल को कर्मशीलाता के साथ उत्सव मनाते हुए जिया। उन्होंने एक-एक पल के मूल्य को समझा। इसलिए उनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह 5 वर्ष के अपने अमूल्य समय को कहीं व्यर्थ ही गंवाते रहे होंगे। अपने जीवन के इन चार-पांच वर्षों में स्वामी दयानंद जी महाराज की गतिविधियां क्या रहीं ? इस पर उनके जीवन चरित् के लिखने वाले बाबू देवेंद्र नाथ मुखोपाध्याय ने लिखा है कि ‘इस विषय में हम कुछ नहीं कह सकते कि नर्मदा के उत्पत्ति स्थान के दर्शन के पश्चात उन्होंने क्या-क्या किया ? कहां-कहां गए ? किस-किस नए योगाभ्यास के उद्देश्य से किस-किस योगी के पास गए? वस्तुत: इस पहाड़ी ग्राम के वृक्ष के नीचे रात्रि भर विश्राम करके जब वे अगले दिन संध्योपासना के पश्चात आगे जाने को उद्यत हुए, उसके पीछे का उनका जीवन न केवल हमारे लिए ही अंधकार में छुपा हुआ है, बल्कि संसार के लिए भी अज्ञात है।( इसी कथन को ‘नवजागरण के पुरोधा : दयानंद सरस्वती’ के लेखक श्री भवानीलाल भारतीय जी ने भी उद्धृत किया है।)
हमारा मानना है कि स्वामी जी महाराज के लिए वेद के प्रचार प्रसार के लिए अपने देश का स्वाधीन होना बहुत आवश्यक था। उन्होंने इस बात को गहराई से अनुभव किया था कि व्यक्ति सामाजिक आत्मिक और आध्यात्मिक उन्नति तभी कर सकता है जब वह प्रत्येक प्रकार से स्वाधीनता का अनुभव करने में अपने आप को सक्षम पाता हो । कोई भी पराधीन राष्ट्र अपनी संस्कृति की रक्षा नहीं कर सकता। अपनी इसी प्रकार की सोच के कारण स्वामी दयानंद जी महाराज देश की स्वाधीनता के भी साधक बने । वे यह भली प्रकार जानते थे कि कोई भी मुस्लिम या ईसाई भारत को वैसा प्यार नहीं करता, जैसा यहां का बहुसंख्यक समाज अर्थात हिंदू करता है। इसीलिए श्रीमती एनी बेसेंट ने उनके बारे में कहा है कि ‘स्वामी दयानंद पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत, भारतीयों के लिए की घोषणा की।’ आगे चलकर स्वामी जी की इसी विचारधारा को देश के क्रांतिकारी आंदोलन के प्रत्येक नेता ने अपनाया।
हमें स्वामी दयानंद जी महाराज के इन चार-पांच वर्षों के संदर्भ में तत्कालीन परिस्थितियों पर विचार करना चाहिए। जिनसे पता चलता है कि उस समय देश भीतर ही भीतर क्रांति के लिए उबल रहा था। जिस समय 1857 की क्रांति की भूमिका तैयार हो रही थी उस समय स्वामी दयानंद जी महाराज एक परिव्राजक का जीवन जी रहे थे। नर्मदा और गंगा के तटवर्ती क्षेत्रों में ही इस क्रांति का व्यापक प्रभाव पड़ा था और इन्हीं क्षेत्रों में स्वामी दयानंद जी महाराज उस समय प्रवास कर रहे थे। उन्होंने हरिद्वार में नाना साहेब, अजीमुल्ला खां, बाला साहेब, तात्या टोपे और बाबू कुंवर सिंह से मुलाकात की थी। यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है कि उन्होंने अपने जीवन काल में अनेक राजाओं, सेठ साहूकारों और अधिकारियों को सुधारने और देश की आजादी के लिए तैयार किया था। उन्होंने आम जनता को देश की आजादी के लिए काम करने के लिए बाद में प्रेरित किया, पहले उन लोगों को प्रेरित किया जो नेतृत्व कर सकते थे। इसी काल में स्वामी जी महाराज ने मंगल पांडे से भी मुलाकात की थी। इसे आप इस प्रकार भी कह सकते हैं कि बैरकपुर में रहते हुए क्रांति का शुभारंभ करने वाले मंगल पांडे ने भी स्वामी जी महाराज से आशीर्वाद लिया था। क्रांति का व्यापक स्तर पर शुभारंभ करने वाले मेरठ के धन सिंह कोतवाल गुर्जर ने भी स्वामी जी से आशीर्वाद लिया था। इस कथन की पुष्टि आचार्य दीपंकर जी की पुस्तक ‘ स्वाधीनता आंदोलन और मेरठ’ से होती है।
जो लोग यह कहते हैं कि स्वामी दयानंद जी का राजनीति और राजनीतिक गतिविधियों से कोई लेना-देना नहीं था और उन्हें राजनीति या राजनीतिक गतिविधियों के साथ जोड़ने से उनका व्यक्तित्व घटता है, उनके इस मत से हम सहमत नहीं हैं। ऐसा कहने वाले लोगों को यह समझना चाहिए कि हमारे भारतवर्ष में राष्ट्र की अवधारणा वेदों के प्रादुर्भाव के साथ ही हो गई थी। यही कारण है कि राज्य संचालन का संकल्प जहां हमारे राजनीतिक लोगों ने लिया वहीं राष्ट्र रक्षा का संकल्प हमारे ऋषियों ने संभाल यहां तक कि महर्षि मनु जैसे महाविद्वान व्यक्ति को भी राष्ट्र रक्षा के उपाय उनके समकालीन ऋषियों की सभा के माध्यम से ही उपलब्ध होते थे। यही परंपरा हमारे देश में निरंतर बनी रही। शस्त्र राज्य संचालन करने वाले क्षत्रिय के लिए आवश्यक था तो शास्त्र राष्ट्र रक्षा के प्रति संकल्पित विद्वानों ऋषियों के लिए अपेक्षित था। स्वामी दयानंद जी महाराज राजाओं को जगा कर जहां उन्हें राज्य संचालन और राष्ट्र रक्षा के लिए संकल्पित कर रहे थे, वहीं वह अपने पुनीत दायित्व के प्रति उदासीन हों, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता। उन्होंने मौन रहकर अपना कार्य संपादित किया । क्योंकि उन्हें किसी भी प्रकार की एषणा छू भी नहीं गई थी। क्षितीश वेदालंकार जी अपनी पुस्तक ‘चयनिका’ के पृष्ठ 38 पर लिखते हैं कि ‘यदि विद्रोह (1857 की क्रांति से ) उनका संपर्क था तो मौन सर्वथा उचित था। क्योंकि अंग्रेजों का शासन रहते ‘आ बैल मुझे मार’ में कोई बुद्धिमानी नहीं थी। यह भीरुता नहीं थी, नीतिमत्ता थी।’
‘भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम में आर्य समाज का योगदान’ नामक पुस्तक के लेखक आचार्य सत्यप्रिय शास्त्री जी ने भी ऐसे अनेक तथ्य और प्रमाण प्रस्तुत किए हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि स्वामी दयानंद जी महाराज 1857 की क्रांति में सक्रियता से अपना योगदान दे रहे थे। इसके लिए उन्हें उनके गुरु पूर्णानंद जी से उस समय प्रेरणा मिली। पूर्णानंद जी के आदेश से ही वह दंडी स्वामी बिरजानंद जी से मिलने के लिए चले थे। वास्तव में उस समय गुरु बिरजानंद जी की अवस्था 79 वर्ष की थी। उनके गुरुजी पूर्णानंद जी की अवस्था उस समय 110 वर्ष की थी । जबकि उनके भी गुरुजी ओमानंद योगी जी की अवस्था उस समय 160 वर्ष की थी। इन तीनों महान विभूतियों से उन्हें इतिहास का सीधा ज्ञान मिला। जिसमें मुगलों और अंग्रेजों के द्वारा हिंदुओं पर किए जा रहे अत्याचारों को उन्होंने बिना किसी लागलपेट के इन महान संन्यासियों के श्रीमुख से श्रवण किया। उस समय दंडी स्वामी बिरजानन्द जी महाराज मथुरा में बड़ी-बड़ी सभाओं के माध्यम से लोगों को क्रांति के लिए तैयार कर रहे थे। इन तीनों महान सन्यासियों और उनके द्वारा किए जा रहे विशेष कार्य की जानकारी हमें निहाल सिंह आर्य जी की पुस्तक ‘सर्वखाप पंचायत का राष्ट्रीय पराक्रम’ नामक पुस्तक से मिल जाती है। इस पुस्तक में भी यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित किया गया है कि स्वामी दयानंद जी महाराज का 1857 की क्रांति से सीधा संबंध था। स्पष्ट है कि स्वामी जी महाराज अपने जीवन के उपरोक्त चार-पांच वर्ष के काल में हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठे थे बल्कि देश के उस प्रत्येक व्यक्ति को जाकर जगा रहे थे जो हाथ पर हाथ धरे बैठा था।
1857 की क्रांति के प्रति स्वामी जी का क्या दृष्टिकोण रहा होगा ? यदि इस पर विचार किया जाए तो ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में वर्णित उनके इस लेख से उनके दृष्टिकोण की स्पष्ट जानकारी होती है ‘जब संवत 1914 (अर्थात् सन् 1857 के वर्ष ) में तोपों के मारे मंदिर मूर्तियां अंग्रेजों ने उड़ा दी थीं, तब मूर्ति कहां गई थीं? प्रत्युत बाघेर लोगों ने जितनी वीरता की, शत्रुओं ( अर्थात अंग्रेजों ) को मारा, परंतु मूर्ति एक मक्खी की टांग भी नहीं तोड़ सकी , जो श्री कृष्ण के सदृश कोई होता तो इनके ( अर्थात अंग्रेजों ) के धुर्रे उड़ा देता और वह (अर्थात अंग्रेज ) भागते फिरते अर्थात भारत छोड़कर चले जाते।’ ( ‘चयनिका’, पृष्ठ – 41)
स्वामी दयानंद जी महाराज की देश के स्वाधीनता आंदोलन में अग्रणी भूमिका को देखते हुए देश के पहले उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार पटेल ने उनके बारे में कहा था कि ‘भारत की स्वतंत्रता की नींव वास्तव में स्वामी दयानंद ने ही डाली थी।’
स्वामी जी महाराज के दिए हुए संस्कारों ने पूरे देश के युवा मानस को झकझोर कर रख दिया था। ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आर्य समाज का विशेष ( 80% ) योगदान’ नामक पुस्तक इस विषय में विशेष रूप से पठनीय है। इस पुस्तक के अध्ययन से यह तथ्य पूर्ण रूप से उजागर होता है कि स्वामी जी महाराज के मार्गदर्शन में चलने वाले आर्य क्रांतिकारियों के कारण सर्वत्र क्रांति की धूम मच गई थी।
स्वामी जी के द्वारा भारत की स्वाधीनता का मार्ग प्रशस्त किया गया। उनके जीवन चरित् को पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने देश को आजाद करने की विशद योजना पर कार्य किया। उनकी यह योजना उनके जीवन के कथित चार-पांच वर्ष के गुमनाम काल में ही तैयार की गई थी।
उनके द्वारा नमक सत्याग्रह के बारे में भी पूर्व में ही ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्पष्ट कर दिया गया था। इसी विचार को लेकर लगभग 70 वर्ष बाद गांधी जी ने नमक सत्याग्रह किया था। कांग्रेस के इतिहास लेखक पट्टाभि सीतारमैया ने स्वामी जी के इसी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर कहा था कि ‘गांधीजी राष्ट्र-पिता हैं, लेकिन स्वामी दयानंद राष्ट्र–पितामह हैं।’ कांग्रेस के इतिहास लेखक ने स्वामी जी महाराज के बारे में ऐसे विचार निश्चित रूप से तभी व्यक्त किए गए होंगे जब उन्होंने यह भली प्रकार देख लिया होगा कि उन्होंने भारत के स्वाधीनता आंदोलन को महात्मा गांधी से भी अधिक प्रभावित किया था या उनके ऐसे विचार रहे होंगे जिनकी छत्रछाया के नीचे सारे आंदोलन को लाया जा सकता था। कांग्रेस के इतिहास लेखक के ये विचार उस दयानंद के प्रति हैं जो एक असहाय और निर्धन मां के उस दृश्य को देखकर फूट-फूट कर रोया था, जिसने गरीबी के कारण अपनी धोती को ही बेटे का कफन बना लिया था और फिर मृत बेटे की देह को नदी में बहाकर उस कफन को अपने शरीर पर लपेटकर अपनी लज्जा को ढक लिया था। यह विचार उस दयानंद के प्रति भी हैं जिन्होंने अंग्रेजों के वायसराय लॉर्ड नॉर्थ ब्रुक से स्पष्ट कह दिया था कि वे अंग्रेजों के राज्य की भारत के लोगों के सामने प्रशंसा कभी नहीं कर सकते। क्योंकि वह स्वयं प्रातः सायं संध्या में परमपिता परमेश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि जितनी जल्दी हो सके अंग्रेजों का राज यहां से खत्म हो जाना चाहिए।

स्वामी जी महाराज ने अपने जीवन काल में जहां विभिन्न राजनीतिक पुरुषों को देश की आजादी के लिए तैयार किया, वहीं उन्होंने साधु संन्यासियों को भी एक संगठन के नीचे लाने पर गंभीरता से विचार किया।
1757 ईस्वी में अंग्रेजों ने प्लासी के युद्ध में सफलता प्राप्त की थी। वर्ष 1857 में वे लोग भारतवर्ष में अपने शासन की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने के कार्यक्रम आयोजित करना चाहते थे। दयानंद जैसे देशभक्त संन्यासी के लिए इस बात को स्वीकार करना कतई भी संभव नहीं था कि अंग्रेज यहां पर अपने शासन के 100 वर्ष पूर्ण होने के कार्यक्रम आयोजित करें। तनिक विचार कीजिए कि जिस दयानंद ने अंग्रेजों की शिक्षा नीति का विरोध किया हो , उनके न्यायालयों का विरोध किया हो, वह उन्हें 1857 में अपने शासन की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने के कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति कैसे दे सकते थे ? स्पष्ट है कि जिस काल को उनके जीवन का गुमनामी का काल कहा जाता है, उसमें वह देश की स्वाधीनता के लिए कार्य कर रहे थे। उनकी योजना थी कि देश को पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त हो । इसके लिए आंदोलन की भूमिका ऐसी तैयार करनी थी जिसके चलते अंग्रेजी साम्राज्य तो उखड़कर समाप्त हो ही जाए, साथ ही अंग्रेजों से पहले शासन करने वाले मुसलमानों को भी वैदिक संस्कृति को क्षतिग्रस्त करने का अवसर उपलब्ध न हो। स्वामी दयानंद के इस प्रकार के चिंतन से प्रेरित होकर ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्वामी दयानंद को ‘आधुनिक भारत का निर्माता’ बताया था।
स्वामी दयानंद जी महाराज ने अपने जीवन के उन गुमनाम 5 वर्षों को देश की स्वाधीनता के लिए लगाया। इस बात की साक्षी हमें ‘ स्वाधीनता आंदोलन और मेरठ’ नामक पुस्तक से मिलती है। जिसके विद्वान लेखक आचार्य दीपंकर जी ने स्वामी दयानंद जी महाराज को बाबा औघड़नाथ के नाम से उल्लेखित किया है। इस पुस्तक से स्पष्ट होता है कि स्वामी जी महाराज ने उस समय हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के सैनिकों को अंग्रेजों के विरुद्ध उकसाया और उन्हें अंग्रेजों को यहां से भगाने के लिए प्रेरित किया। उस समय संपूर्ण भारतवर्ष में कोई अन्य संन्यासी ऐसा नहीं था, जिसने देश की आजादी के लिए इतना बड़ा काम किया हो या क्रांतिकारियों की देशभक्त सेना का निर्माण कर उसे अगले 100 वर्ष तक की वैचारिक ऊर्जा प्रदान कर दी हो।
स्वामी दयानंद जी के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा व्यक्त करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई ने कहा था कि यदि आर्य समाज न होता तो भारत का क्या होता, इसकी कल्पना करना भी भयावह है। आर्य समाज ने जिन तीन चीजों की शुरुआत की थी, उनके बारे में कांग्रेस को पता भी नहीं था. स्वराज की पहली उद्घोषणा स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने की थी और वह आर्य समाज ही था, जिसने भारतीय समाज के मूल्यों से पटरी से उतर चुकी गाड़ी को पटरी पर लाने का काम शुरू किया था। यदि आर्य समाज न होता तो भारत, भारत न होता।’
‘भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम में आर्य समाज का योगदान’ नामक पुस्तक के लेखक आचार्य सत्यप्रिय शास्त्री जी बताते हैं कि ‘अपने शिष्यों के साथ ऋषि एक दिन चित्तौड़गढ़ का किला देखने गए। जिस ऋषि दयानंद की आंखों में पिता, माता और बहनों का वियोग तरी न ला सका, चित्तौड़गढ़ की दशा देखकर उसकी आंखों से झर झर आंसू बहने लगे। ऋषि दयानंद ने एक ठंडी सांस लेकर निम्नलिखित आशय के शब्द कहे ‘ब्रह्मचर्य के नाश होने से भारतवर्ष का नाश हुआ है और ब्रह्मचर्य का उद्धार करने से ही देश का उद्धार हो सकेगा।’
कुल मिलाकर कहने का अभिप्राय है कि स्वामी दयानंद जी महाराज के जीवन के गुमनामी के कथित चार-पांच वर्ष के काल को उनकी राष्ट्र साधना की कहानी के साथ जोड़कर प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। उनकी राष्ट्र साधना के पक्ष को जितना ही अधिक स्पष्ट किया जाएगा, उतना ही वह भारत और भारतीयता के हित में होगा। उनका चिंतन शस्त्र और शास्त्र साधना के समन्वय का चिंतन है। उनकी योजना भारत को भव्य बनाने की योजना है और उनका संकल्प भारत को विश्व गुरु बनाने का संकल्प है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

Comment:

vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpuan giriş
betpark giriş
betpuan giriş
betpark giriş
betpipo giriş
betpipo giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
betnano giriş
betnano giriş
bets10 giriş
bets10 giriş
bets10 giriş
bets10 giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
restbet giriş
betnano giriş
restbet giriş
betpas giriş
betpas giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
restbet giriş
restbet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
safirbet giriş
vaycasino giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
vaycasino giriş
sekabet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
madridbet giriş
myhitbet giriş
myhitbet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
meritking giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
betpas giriş
restbet giriş
restbet giriş
siyahbet giriş
siyahbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
madridbet giriş
betvole giriş
betvole giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpipo giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betnano giriş
pusulabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
casinowon giriş
casinowon giriş
pusulabet giriş