आर्य समाजों की राजनीति 1

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आज देश में अधिकांश ऐसी आर्य समाजें हैं जिनमें घटिया स्तर की राजनीति हो रही है । लोग पदों के लिए कुत्तों की भांति लड़ रहे हैं। एक दूसरे की टांग खींचना , एक दूसरे के प्रति जहर उगलना और ओच्छी मानसिकता से उपजी अभद्र भाषा का प्रयोग करना , आर्य समाज में बैठे लोगों की एक सामान्य सी प्रवृत्ति हो गई है। कभी इन्हीं आर्य समाजों में बहुत ऊंचे चरित्र के विद्वान लोग पदों को सुशोभित किया करते थे । उनके भीतर पदलोलुपता नाम की भावना ढूंढे से भी नहीं थी। उनके लिए पद से अधिक कार्य के प्रति समर्पण का भाव महत्व रखता था। पद प्राप्त करने के पश्चात वह अपने पदीय दायित्वों का निर्वाह करने में किसी प्रकार का प्रमाद नहीं दिखाते थे। उसकी गरिमा को बनाए रखना के लिए अपने आपको हर प्रकार से आर्य सिद्ध करने का प्रयास करते थे। उस समय आर्य समाज के पदाधिकारियों का अन्य लोग भी ह्रदय से सम्मान करते थे। सभी लोग उन पर विश्वास करते थे और उनके आचरण को अपने लिए अनुकरणीय मानते थे। उन्हें देखकर लोग यही कहते थे :-

आचरण की उच्चता को देखकर हैरान हूं
कौन होगा और ऐसा, सोच कर परेशान हूं?
दीपक जलाए प्रेम के और धर्म के तेल से,
डाल बाती दिव्यता की आर्य की पहचान हूं।।

आर्य समाज के पदाधिकारियों की भाषा बड़ी परिष्कृत होती थी। जब वे बोलते थे तो उनके मुख से फूल से झड़ते थे। लोग उन्हें ध्यान लगाकर सुनते थे और उनके कहे हुए शब्दों को अमृत वचन मानकर ग्रहण करते थे। उनका अपनी भाषा पर इतना नियंत्रण और अधिकार होता था कि घंटों तक धाराप्रवाह  बोलने के पश्चात भी लोग उनकी सभा से हिलते नहीं थे। नई से नई बात बताकर वे लोगों को मंत्रमुग्ध करते थे और अपने साथ बांधे रखने में सफल होते थे।

जोड़ तोड़ की राजनीति

अपवादस्वरूप आज भी ऐसी दिव्य विभूतियां हैं, जो आर्य समाजों के पदों को सुशोभित कर रही हैं और वे जब बोलते हैं तो उनके मुखारविंद से भी अमृत की वर्षा होती है, परंतु उनकी संख्या निरंतर कम होती जा रही है। मेरी दृष्टि में कई आर्य समाज ऐसी हैं जिनके प्रधानों का आर्य विचारधारा से दूर-दूर का भी कोई संबंध नहीं है। वह अपनी जोड़-तोड़ की राजनीति के माध्यम से किसी प्रकार प्रधान पद पर पहुंच गए। इसके पश्चात ये लोग वहां के पुरोहित को, विद्वानों को , संन्यासी , वानप्रस्थियों को उत्पीड़ित करते हैं। उनसे अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं । अपने मनमाने ढंग से उन्हें भगाने का प्रयास करते हैं। कितने ही विद्वानों के ऐसे प्रसंग मेरे पास हैं जिन्होंने बड़े दु:ख के साथ बताया कि अमुक आर्य समाज के अमुक प्रधान ने किस प्रकार उनके साथ अभद्रता का व्यवहार कर उन्हें आर्य समाज से बाहर कर दिया ?

रक्षक ही भक्षक बन बैठे, गैरों से शिकायत क्या होगी ?
मित्र भी मित्र रह न सका, शत्रु से इनायत क्या होगी ?

जिसको आर्य समाज में ‘सेवक’ के नाम से जाना जाता है, यदि उसकी जाति बिरादरी किसी शूद्र वर्ग से है तो उसका उत्पीड़न उसी प्रकार होता है जैसे समाज में अपना वर्चस्व बना कर रखने वाले लोग करते देखे जाते हैं। जिस आर्य समाज की स्थापना शूद्र के कल्याण के लिए की गई थी, उसमें उसकी ऐसी दुर्दशा देखकर आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद जी महाराज की आत्मा भी कराहती होगी। यदि आज स्वामी दयानंद जी महाराज होते तो ऐसे लोगों को वह निश्चय ही आर्य समाज से बाहर का रास्ता दिखा देते।

विद्वानों को भी नहीं छोड़ा

अनेक आधिकारिक विद्वान भी ऐसे हैं जो इन अभद्र और अशोभनीय भाषा बोलने वाले प्रधानों की तानाशाही का शिकार बने हैं और जिन्हें बहिष्कृत करके इन लोगों ने आर्य समाजों से दूर कर दिया है। मेरी नजरों में कई चेहरे ऐसे हैं जिन्होंने मुझे आपबीती सुनाई है और उनकी विद्वत्ता को किस प्रकार तिरस्कृत और बहिष्कृत होना पड़ा है ? – उसको कहते – कहते उनकी आंखों में आंसू आ गए। इन लोगों का दोष केवल इतना होता है कि यह आर्य समाज के सिद्धांतों के अनुसार कई बार अपनी बात को मनवाने का प्रयास करते हैं जबकि तानाशाह प्रधान अपनी प्रधानी को ऊपर रखकर उनके दिए हुए परामर्श को मानना अपना अपमान मानते हैं । विद्वानों की तर्कसंगत, न्यायसंगत ,शास्त्रसंगत और लोकसंगत बातें भी इन तानाशाह प्रधानों को अपने आदेशों के सामने तुच्छ और हेय दिखाई देती हैं।
यह आर्य समाज ही था जिसने राजा को विद्वानों की परिषद के अधीन रहकर काम करने के भारत के प्राचीन राजनीतिक संस्कार को स्थापित करने पर बल दिया था। स्वामी दयानन्द जी महाराज के राजनीतिक चिंतन को यदि पढ़ा जाए तो उन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में इस संबंध में मनु महाराज को बार-बार उद्धृत कर इस व्यवस्था को अपनाने पर बल दिया है, जिसमें ब्राह्मण अर्थात विद्वान की बात को मानना राजा का धर्म बताया गया है। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजा अर्थात किसी आर्य समाज का तानाशाह प्रधान लोकतांत्रिक ढंग से न चुना जाकर बलात पदों को कब्जा रहा है और फिर बौद्धिक शक्ति की अवहेलना कर ऋषि के सिद्धांतों और उनकी सोच का उपहास कर रहा है ? जिस पद पर बैठकर किसी व्यक्ति से न्याय ,नीति और धर्म के पालन की अपेक्षा की जाती थी वही व्यक्ति उस पद पर बैठकर अन्याय,अनीति और अधर्म के कार्य कर रहा है, जिससे विद्वानों का उत्पीड़न हो रहा है। विद्वानों का उत्पीड़न किसी भी समाज के लिए शुभ नहीं माना जा सकता। जब-जब ऐसी स्थिति आती है तब – तब समझो कि पतन की गहरी निशा अपना प्रभाव दिखाने लगी है।

स्वामी जी ने भी नहीं सोचा होगा कि….

स्वामी जी महाराज ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि उनके जाने के इतने समय पश्चात ही आर्य समाज में पदों को लेकर लोग इस प्रकार लड़ेंगे और ऐसे लोग पदों पर काबिज हो जाएंगे जिनका नैतिकता व सिद्धांतों से दूर-दूर का भी संबंध नहीं होगा। मनु महाराज की मनुस्मृति का उन्हें क, ख, ग भी नहीं आता होगा।

पुरानी पीढ़ी के आर्य समाजियों ने अपने जीवन की गाढ़ी कमाई से आर्य समाजों को खड़ा करने का प्रयास किया। उन्होंने आर्य समाज के भावी कार्यक्रमों की रूपरेखा निरंतर चलती बनती रहे, इसके लिए आर्य समाजों के लिए कोई ना कोई ऐसा साधन बना कर दिया जिससे उन्हें मासिक आय दुकानों के किराए आदि से निरन्तर प्राप्त होती रहे। यह उनकी दूरगामी सोच का ही प्रतीक है कि उन्होंने प्रत्येक आर्य समाज मंदिर के लिए स्थायी रूप से कमाई का साधन बनाकर दिया। लेकिन आज स्थिति दूसरी हो गई है। आर्य समाज के कोष और उसके स्थायी आर्थिक संसाधनों पर किसी परिवार या व्यक्ति विशेष का कब्जा हो गया है। इसी कोष को लेकर या कमाई के आर्थिक संसाधनों को लेकर लगभग हर आर्य समाज घटिया राजनीति का शिकार होकर रह गया है। इसके पीछे के कारणों पर यदि विचार किया जाए तो पता चलता है कि जहां कुछ असामाजिक और अनार्य लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं ,वहीं कुछ ऐसे लोग भी आर्य समाज में काम करते देखे जाते हैं जिनके माता – पिता के संस्कारी होते हुए भी वे अपने माता-पिता के संस्कार नहीं ले पाए । वे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़े और परंपरागत रूप से या अपने माता-पिता के प्रभाव का दुरुपयोग करते हुए पिता से प्रधान पद को या किसी और पद को प्राप्त करने में सफल हो गए।

डॉ राकेश कुमार आर्य

लेखक की “आर्य समाज एक क्रांतिकारी संगठन” नामक पुस्तक से

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