मौन व्रत स्वेच्छा या मजबूरी

गांधीवादी अन्ना हजारे की ओर से शुरू किये गये एक सप्ताह के ‘मौन व्रत’ का उद्देश्य भले ‘आत्म शांति’ घोषित किया गया हो लेकिन इसके आयोजन का समय कुछ और ही कहानी बयां करता है। दरअसल देश में बड़े बदलाव लाने की उम्मीदें जगाने के बाद हजारे पक्ष की ओर से पिछले कुछ दिनों में ऐसे बयान दिये गये या ऐसे आह्वान किये गये जिसने समूची टीम अन्ना को ही सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया है।

मीडिया कवरेज हासिल करने में सिद्धहस्त हजारे पक्ष के साथ मुश्किल यह है कि वह राजनीतिक पार्टियों के सवालों का जवाब देने में कच्चा है इसलिए किसी भी आरोप या विवाद पर स्पष्टीकरण देते समय कोई नया विवाद खड़ा कर दे रहा है। इस तरह जब हजारे पक्ष रोज नये विवादों में उलझता चला जा रहा है और अन्ना भी अपनी टीम के सदस्यों को गैर जरूरी बयान देने से नहीं रोक पा रहे हैं तो उपाय के रूप में चुप रहना श्रेयस्कर समझा गया।

रामलीला मैदान में हजारे के अनशन के समय जो आरोप लगाये जा रहे थे कि उनकी टीम ने उन्हें ‘हाईजैक’ कर रखा है वह सही हों या नहीं, लेकिन इसको लेकर अब कुछ सवाल तो उठने लगे हैं। प्रशांत भूषण का कश्मीर पर दिया विवादित बयान हो या फिर अरविंद केजरीवाल का अन्ना को संसद से ऊपर बताना, दोनों ही से हजारे ने असहमति जताते हुए कहा है कि वह अपने पक्ष के सदस्यों से कहेंगे कि वह हर मुद्दे पर ना बोलें और अपनी सीमा का उल्लंघन नहीं करें। जाहिर है यह बात अन्ना ने मानी है कि उनकी टीम के सदस्यों ने अपनी सीमा का उल्लंघन किया है। यहां एक और हैरत भरी बात यह दिखती है कि कुछ समय पहले एक सुर में बोलने वाले हजारे पक्ष के नेता सहित सभी सदस्य अब अलग अलग सुरों में बोल रहे हैं। अन्ना हजारे कह रहे हैं कि वह कांग्रेस के विरोध में नहीं हैं। उन्होंने वादा किया है कि अगर संप्रग सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में मजबूत लोकपाल विधेयक पारित करेगी और दूसरे सुधार भी लागू करेगी, तो वह कांग्रेस के साथ काम करेंगे। लेकिन दूसरी ओर अरविंद केजरीवाल तथा मनीष सिसौदिया ने अन्ना का वीडियो संदेश तैयार करवा कर इसे हरियाणा के हिसार संसदीय उपचुनाव में कांग्रेस के विरोध में इस्तेमाल किया। यही नहीं हजारे ने कहा कि वह फिलहाल आंदोलन के लिए उत्तर प्रदेश नहीं जाएंगे लेकिन उनकी टीम ने हजारे का उत्तर प्रदेश दौरे का विस्तृत कार्यक्रम जारी कर दिया। टीम अन्ना के सदस्यों की बात करें तो उसमें अब हजारे सहित सभी विवादित बन चुके हैं। अन्ना हजारे पर आरएसएस के सहयोग से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन छेड़़ने का आरोप है और इस संबंध में कांग्रेस के एक महासचिव ने संघ की ओर से हजारे को दिया गया समर्थन पत्र जारी भी किया है। इसके अलावा टीम अन्ना के महत्वपूर्ण सदस्य प्रशांत भूषण और शांति भूषण भी कम विवादित नहीं हैं।

सूत्रों की मानें तो शांतिभूषण की विवादित सीडी मामले में दिल्ली पुलिस ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट में कहा है कि वकील शांति भूषण की राजनीतिक नेताओं मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह से की गई बातचीत संबंधी विवादित सीडी वास्तविक है। सीडी में भूषण कथित तौर पर मुलायम सिंह और अमर सिंह से कहते दिखाए गए हैं कि उनका बेटा और वकील प्रशांत भूषण ‘न्यायाधीश को पाले में ला सकता है। यही नहीं शांति और प्रशांत भूषण को नोएडा में भूखंड आवंटन पर भी विवाद है। इसके अलावा प्रशांत भूषण ने कश्मीर में ‘जनमत संग्रह’ की बात कर एक तरह से अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाने का काम किया है। एक संगठन की ओर से उन पर किये गये हिंसक हमले निंदाजनक तो हैं लेकिन प्रशांत जैसे वरिष्ठ अधिवक्ता और जागरूक नागरिक की ओर से कश्मीर पर दिया गया बयान भी ‘अक्षम्य’ ही होना चाहिए। वह जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला दे रहे हैं वह देश को विभाजित करने वाले बयानों पर लागू नहीं होती। यहां प्रशांत भूषण के कश्मीर संबंधी बयान की निंदा करते हुए भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काट्जू का यह कहना बिलकुल सही प्रतीत होता है, ‘‘अगर आप कह सकते हैं कि कश्मीर अलग हो सकता है, तब कल को नगा कहेंगे हम अलग हो सकते हैं। मिजो कहेंगे कि हम भी अलग होना चाहते हैं। तमिल भी कहेंगे कि हम अलग होना चाहते हैं।‘‘ दूसरी ओर किरण बेदी पर आरोप लगाये जाते रहे हैं कि उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा है लेकिन वह इससे सदा इंकार करती रही हैं।

लेकिन यह महत्वाकांक्षा तब उभर कर आई जब हजारे पक्ष की बैठक के दौरान उन्होंने भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की ‘जन चेतना यात्रा’ को समर्थन देने का सुझाव रखा। इसके बाद वह अरविंद केजरीवाल के साथ हिसार में कांग्रेस विरोधी सभाओं में भी शामिल हुईं। वह एक और बात को लेकर विवादों में हैं कि आयकर विभाग ने हाल ही में उनसे संबद्ध दो गैर-सरकारी संगठनों की जांच के लिये नोटिस भेजा है। विभाग का इस बारे में कहना है कि यह कार्रवाई कानून के मुताबिक है। तो अब कुल मिलाकर सवाल यह उठते हैं कि टीम अन्ना में गैर विवादित है कौन? और किसके उद्देश्यों पर सवाल नहीं उठाया जा सकता? जन लोकपाल के बाद टीम अन्ना जिन चुनाव सुधारों की बात कर रही है उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त भारतीय संदर्भ में अव्यवहारिक बता चुके हैं तो प्रधानमंत्री का कहना है कि इस पर राजनीतिक आम सहमति की जरूरत है। बहरहाल, अब देखना यह है कि पूर्व में भ्रष्टाचार के विरोध में अपार जन समर्थन हासिल कर चुका ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ क्या हालिया घटनाओं के बाद आगे भी पुरानी साफलता दोहरा पाता है?

– नीरज कुमार दूबे

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