ओ३म् “देश एवं मानव निर्माण में गोरक्षा एवं गोसंवर्धन का महत्वपूर्ण स्थान”

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परमात्मा ने मनुष्य एवं इतर आत्माओं के लिये सृष्टि को उत्पन्न कर इसे धारण किया है। परमात्मा में ही यह सारा ब्रह्माण्ड विद्यमान है। आश्चर्य होता है कि असंख्य व अनन्त लोक-लोकान्तर परमात्मा के निमयों का पालन करते हुए सृष्टि उत्पत्ति काल 1.96 अरब वर्षों से अपने अपने पथ पर चल रहे हैं। ये कभी आपस में टकराते नहीं जबकि मनुष्यों द्वारा निर्मित व संचालित सीमित संख्या के वाहन प्रतिदिन परस्पर टकरा जाते हैं जिससे बड़ी संख्या में जान व माल की हानि होती है। इसी कारण से कहा जाता है कि परमात्मा की सभी व्यवस्थायें आदर्श हैं जिसकी प्रेरणा लेकर हमें भी अपनी सभी व्यवस्थाओं को सुव्यवस्थित करना चाहिये। परमात्मा ने मनुष्य व इतर सभी प्राणियों की आवश्यकता के सभी पदार्थ बनाये हैं। मनुष्य के लिए माता-पिता, समाज, आचार्य आदि की आवश्यकता होती है जिनकी पूर्ति भी परमात्मा द्वारा ही की जाती है। शैशवास्था में मनुष्यों को माता का दूध चाहिये जिसकी प्राप्ति भी परमात्मा ने ही उत्तम रीति से की हुई है। शैशवास्था के बाद की मनुष्यों की आवश्यकता की सभी वस्तुयें वा पदार्थ भी परमात्मा ने सृष्टि में रचकर प्रदान कर रखें हैं।

मनुष्य को जीने के लिए प्राण-वायु, जल, अग्नि, अन्न, फल, ओषधियां तथा दुग्ध आदि पदार्थों की आवश्यकता होती है। यह सब पदार्थ भी मनुष्य को सृष्टि में ही प्राप्त होते हैं। मनुष्य के जीवन में दुग्ध का अत्यन्त महत्व है। इसकी पूर्ति गो आदि पशुओं से होती है। देशी गाय का दुध श्रेष्ठ व उत्तम होता है। गाय के दुग्ध में बुद्धि को ज्ञान प्राप्त करने में योग्य बनाने सहित शरीर के आरोग्य व बल प्रदान उत्पन्न करने तथा शारीरिक वृद्धि में गोदुग्ध की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि किसी बच्चे को माता का दूध सुलभ न हो तो गो माता के दूध से वह पल जाता है। छोटे शिशु का माता के दुग्ध के स्थान पर अन्य विकल्प गोदुग्ध ही होता है। शैशवास्था के बाद भी मनुष्य की पूरी आयु में दुग्ध व दुग्ध निर्मित दही, छाछ, मक्खन, घृत, पनीर आदि के द्वारा उसके शरीर का पोषण होता है। गो दुग्ध अन्न व फलों का भी विकल्प होता है। यदि अन्न व फल आदि सुलभ न हों तो गोदुग्ध से इनकी भी पूर्ति होती है। इसी कारण गोदुग्ध को पूर्ण आहार माना जाता है। हमने उदर के रोगियों के बारे में पढ़ा है जिन्होंने अपना पूरा जीवन गोदुग्ध के सहारे ही यशस्वी रूप में व्यतीत किया। देशी गाय का दुग्ध सभी साध्य व असाध्य रोगियों के लिए क्षुधा निवृति, पोषण एवं रोग निवृत्ति का कार्य करता है। गोदुग्ध बल व आयुवर्धक होता है। इसे अमृत की संज्ञा भी दी जाती है। अतः शिक्षित व बुद्धिमान मनुष्यों के सभी देशों में देशी गाय का पोषण एवं रक्षण होना चाहिये और गाय की अपनी जन्मदात्री माता के समान श्रद्धापूर्वक सेवा की जानी चाहिये। ऐसा होने पर राष्ट्र सभी प्रकार की उन्नति कर अपने सभी लक्ष्यों, जनता की सुख व शान्ति, अजेयता, ज्ञान विज्ञान की उन्नति, विकास, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष को प्राप्त हो सकता है। यदि किसी देश में गोपालन व गोसंरक्षण नहीं होता तो उस राष्ट्र को शिक्षित व संस्कारित मनुष्यों का राष्ट्र नहीं कहा जा सकता। ऐसे राष्ट्र में पूर्ण सुख व शान्ति स्वप्नवत् होती है जो कभी पूरी नहीं हो सकती। इस प्रकरण में वेदों व आर्यसमाज के विद्वान पूर्व कीर्तिशेष सांसद पं. प्रकाशवीर शास्त्री की पुस्तक ‘गोरक्षा-राष्ट्ररक्षा’ की स्मृति भी उठती है जिसमें गोरक्षा को राष्ट्ररक्षा का पर्याय माना गया है और इसके पक्ष में पुस्तक में अनेक प्रमाण व तथ्यों को प्रस्तुत किया गया है।

महर्षि दयानन्द ने गोरक्षा व इसके संवर्धन सहित गोहत्या रोकने की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण लघु पुस्तक ‘गोकरुणानिधि’ की रचना की थी। अपने विषय की यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पुस्तक है। इस पुस्तक में विषय को अनेक युक्तियों व तर्कों से प्रस्तुत किया गया है और तत्कालीन अंग्रेज सरकार की प्रमुख महारानी विक्टोरिया से भारत में गोरक्षा सहित गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध की मांग की गई थी। महर्षि दयानन्द ने देश में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाने के लिये आन्दोलन किया था। उन्होंने इसके लिये एक विस्तृत ज्ञापन तैयार किया था जिस पर लाखों लोगों के हस्ताक्षर कराये गये थे। यह अभियान चल ही रहा था कि मध्य में उनकी विष दिये जाने से मृत्यु हो गयी जिससे वह कार्य अधूरा रह गया। ऋषि दयानन्द अपने समय में गोरक्षा, गोपालन तथा गोहत्या पर प्रतिबन्ध की चर्चा किया करते थे। वह अनेक बड़े अंग्रेज राज्याधिकारियों से भी गोरक्षा के विषय में मिले थे और उनको गोहत्या पर प्रतिबन्ध के समर्थन में अपने विचारों को तर्कों व युक्तियों से सहमत किया था। यदि उनकी अचानक मृत्यु न हुई होती तो वह गोरक्षा आन्दोलन को उसके उचित समाधान तक पहुंचा कर अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करते। ऋषि दयानन्द कृत गोकरुणानिधि लघु पुस्तक को प्रत्येक देशवासी को अवश्य पढ़ना चाहिये। इस पुस्तक की भूमिका में ऋषि दयानन्द ने गोरक्षा के विषय में महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किये हैं। हम उनके विचारों को यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। वह लिखते हैं कि वे धर्मात्मा विद्वान् लोग धन्य हैं, जो ईश्वर के गुण, कम्र्म, स्वभाव, अभिप्राय, सृष्टि-क्रम, प्रत्यक्षादि प्रमाण और आप्तों के आचार से अविरुद्ध चलके सब संसार को सुख पहुंचाते हैं। और शोक है उन पर जो कि इनसे विरुद्ध स्वार्थी दयाहीन होकर जगत् में हानि करने के लिये वर्तमान हैं। पूजनीय जन वे हैं कि जो अपनी हानि होती हो तो भी सब के हित के करने में अपना तन, मन, धन लगाते हैं। और तिरस्करणीय वे हैं जो अपने ही लाभ में सन्तुष्ट रहकर सबके सुखों का नाश करते हैं।

ऋषि दयानन्द पुस्तक की भूमिका में आगे लिखते हैं ऐसा सृष्टि मे कौन मनुष्य होगा जो सुख और दुःख को स्वयं न मानता हो? क्या ऐसा कोई भी मनुष्य है कि जिसके गले को काटे वा रक्षा करे, वह दुःख और सुख का अनुभव न करे? जब सब को लाभ और सुख ही में प्रसन्नता है, तो विना अपराध किसी प्राणी का प्राण वियोग करके अपना पोषण करना यह सत्पुरुषों के सामने निन्दित कर्म क्यों न होवे? सर्वशक्तिमान जगदीश्वर इस सृष्टि में मनुष्यों के आत्माओं में अपनी दया और न्याय को प्रकाशित करें कि जिससे ये सब दया और न्याययुक्त होकर सर्वदा सर्वोपकारक काम करें और स्वार्थपन से पक्षपातयुक्त होकर कृपापात्र गाय आदि पशुओं का विनाश न करें कि जिससे दुग्ध आदि पदार्थों और खेती आदि क्रियाओं की सिद्धि से युक्त होकर सब मनुष्य आनन्द में रहें। ऋषि दयानन्द ने भूमिका में यह भी कहा है कि यह ग्रन्थ इस अभिप्राय से रचा गया है जिससे गो आदि पशु जहां तक सामथ्र्य हो बचाये जावें और उनके बचाने से दूध घी और खेती के बढ़ने से सब को सुख बढ़ता रहे। परमात्मा कृपा करें कि यह अभीष्ट शीघ्र सिद्ध हो। अपने ग्रन्थ की भूमिका में ऋषि दयानन्द ने गोरक्षा वा गोहत्या निषेध के महत्व को बहुत ही प्रभावशाली शब्दों में प्रस्तुत किया है।

गोकरुणानिधि पुस्तक में ऋषि दयानन्द ने कहा है कि सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर ने इस सृष्टि में जो-जो (गो आदि पशु) पदार्थ बनाये हैं, वे निष्प्रयोजन नहीं हैं, किन्तु एक-एक वस्तु अनेक-अनेक प्रयोजन के लिये रची है। इसलिये उन से वे ही कार्य लेना सब को उचित होता है, न कि उससे पूर्ण प्रयोजन न लेकर बीच ही में वह नष्ट कर दिया जावे। क्या जिन-जिन प्रयोजनों के लिये परमात्मा ने जो-जो पदार्थ बनाये हैं, उन-उन से वे-वे प्रयोजन न लेकर उनको प्रथम ही विनष्ट कर देना सत्पुरुषों के विचार में बुरा कर्म नहीं है? पक्षपात छोड़ कर देखिये, गाय आदि पशु और कृषि आदि कर्मों से सब संसार को असंख्य सुख होते हैं वा नहीं? जैसे दो और दो चार होते हैं, वैसे ही सत्यविद्या से जो-जो विषय जाने जाते वे अन्यथा कभी नहीं हो सकते। इस पुस्तक में ऋषि दयानन्द ने एक गाय की एक पीढ़ी से होने वाली गायों से दुग्ध तथा बैलों से कृषि होकर उत्पन्न अन्न आदि पदार्थों का गणित की विधि से हिसाब लगाकर बताया है कि एक गाय की एक पीढ़ी से यदि 6 गाय और 6 बैल मान लिये जायें तो 6 गायों से 1,54,440 एक लाख चैवन हजार चार सौ चालीस मनुष्यों का पालन एक बार में हो सकता है। इसी प्रकार एक गाय की एक पीढी में जीवित 6 बैलों से जीवन भर उत्पन्न अन्न आदि पदार्थों से 2,56,000 मनुष्यों का पालन एक बार में हो सकता है। दूध व अन्न को मिलाकर देखने से विदित होता है कि एक गाय की एक पीढी से 4,10,440 चार लाख दस हजार चार सौ चालीस मनुष्यों का एक बार के भोजन के रूप में पालन होता है। वह यह भी बतातें है कि अधिक गोदुग्ध होने व उसका सेवन करने से मनुष्य का मल कम मात्रा में होता है। इससे वायु कम दुर्गन्धयुक्त होता है। इससे वायु प्रदुषण व विकार कम होने से रोग भी कम होते हैं। मनुष्य स्वस्थ रहते हैं तो उनके शरीर में अधिक बल होने व लम्बी आयु होने से वह अधिक कार्य करते हैं जिससे देश में अधिक सुख व समृद्धि होती है। ऐसे अनेक पक्षों पर ऋषि दयानन्द जी ने अपनी पुस्तक गोकरुणानिधि में प्रकाश डाला है।

यजुर्वेद में गाय को अघ्न्या कहा गया है। इसका अर्थ होता है न मारने योग्य। मन्त्र में शब्द आये हैं ‘अघ्न्या यजमानस्य पशून् पाहि।’ इन वेद के शब्दों में परमात्मा मनुष्यों को कहते हैं कि हे मनुष्य! तू इन पशुओं को कभी मत मार, और यजमान अर्थात् सब को सुख देनेवाले मनुष्यों से सम्बन्धित पालतू पशुओं की रक्षा कर जिनसे तेरी भी पूरी रक्षा होवे। ईश्वर की आज्ञा को मानना सब मनुष्यों का कर्तव्य है। अतः किसी मनुष्य को किसी भी पशु की आहार व भोजन के लिये हत्या कदापि नहीं करनी चाहिये। यह पाप एवं ईश्वर की आज्ञा का उल्लंघन होता है। अपनी पुस्तक में महर्षि दयानन्द ने एक स्थान पर पूर्वपक्ष के रूप में एक प्रश्न प्रस्तुत किया है। वह लिखते हैं कि जिस देश में सिवाय मांस के अन्य कछ नहीं मिलता वहां वा आपत्काल में अथवा रोगनिवृत्ति के लिए मांस खाने में दोष नहीं होता। इसका समाधान व उत्तर देते हुए वह कहते हैं कि यह आपका कहना व्यर्थ है। क्योंकि जहां मनुष्य रहते हैं वहां पृथिवी अवश्य होती है। जहां पृथिवी है वहां खेती वा फल फूल आदि होते हैं। और जहां कुछ भी नहीं होता, वहां मनुष्य भी नहीं रह सकते। और जहां ऊसर भूमि है, मिष्ट जल और फलाहार आदि के न होने से मनुष्यों का रहना भी दुर्घट है। और आपत्काल में भी मनुष्य अन्य उपायों से निर्वाह कर सकते हैं, जैसे मांस के न खाने वाले करते हैं। और विना मांस के रोगों का निवारण भी ओषधियों से यथावत् होता है। इसलिए मांस खाना अच्छा नहीं है। मांसाहार के प्रकरण में मनुस्मृति का 5/51 श्लोक ‘अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी। संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः।।’ भी महत्वपूर्ण है जिसमें कहा गया है कि (गो आदि किसी पशु की हत्या की) अनुमति देने वाले, मांस के काटने, पशु आदि के मारने, उनको मारने के लिये और बेचने, मांस के पकाने, परोसने और खाने वाले यह 8 मनुष्य घातक हिंसक अर्थात् यह सब पाप करने वाले हैं। अतः मांस खाने सहित इसमें किसी भी रूप में सहयोग करने से पाप होता है। इस कारण किसी भी बुद्धिमान मनुष्य को मांसाहार का पाप कदापि नहीं करना चाहिये।

पुस्तक के अन्त में ऋषि दयानन्द ने गोरक्षा की मार्मिक अपील की है। वह कहते हैं कि ध्यान देकर सुनिये कि जैसा दुःख सुख अपने को होता है, वैसा ही औरों को भी समझा कीजिये। यह भी ध्यान में रखिये कि वे पशु आदि अर्थात् खेती आदि कर्म करने वाले प्रजा के पशु आदि और मनुष्यों के अधिक पुरुषार्थ ही से राजा का ऐश्वर्य अधिक बढ़ता और न्यून होने से नष्ट हो जाता है। इसीलिये राजा प्रजा से कर लेता है कि उनकी रक्षा यथावत् करे, न कि राजा और प्रजा के जो सुख के कारण गाय आदि पशु हैं उनका नाश किया जावे। इसलिये आज तक जो हुआ सो हुआ, आंखें खोल कर सबके हानिकारक कर्मों को न कीजिये और न करने दीजिये। हां, हम लोगों का यही काम है कि आप लोगों की भलाई और बुराई के कामों को जता देवें, और आप लोगों का यही काम है कि पक्षपात छोड़ सब गो आदि लाभकारी पशुओं की रक्षा और बढ़ती करने में तत्पर रहें। सर्वशक्मिान् जगदीश्वर हम और आप पर पूर्ण कृपा करें कि जिससे हम और आप लोग विश्व के हानिकारक कर्मों को छोड़ सर्वोपकारक कर्मों को करके सब लोग आनन्द में रहें। इन सब बातों को सुन मत डालना किन्तु सुन रखना, इन अनाथ पशुओं के प्राणों को शीघ्र बचाना। अन्त में वह कहते हैं ‘हे महाराजधिराज जगदीश्वर! जो इन (गाय आदि पशुओं) को कोई न बचावे तो आप इनकी रक्षा करने और हम से कराने में शीघ्र उद्यत हुजिये।।’

हमने लेख में गोरक्षा व गो संवर्धन के पक्ष में तथा गोहत्या के विरोध में वेद तथा ऋषि दयानन्द के विचार प्रस्तुत किये हैं। गोहत्या, गोमांसाहार सहित अन्य पशुओं की हत्या व उनके मांस का सेवन अमानवीय एवं निन्दित कर्म है। यह अधर्म व पापकर्म है। मनुष्य को इसे तत्काल छोड़ देना चाहिये। इससे संसार में सुखों की वृद्धि होगी। कल व भविष्य में मरने पर यदि हम भी पशु बने तो हम स्वयं की पशु हत्या के दुःख से बच सकेंगे। आज हम जो दूसरों के साथ करते हैं, परमात्मा की व्यवस्था में वह भविष्य व परजन्म में हमारे साथ भी हो सकता व होता है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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