संस्कृति की परिभाषा और वैदिक संस्कृति

समूह-जीवन जीव को एक नयी चेतना देता है। इसलिए ही आदिकाल से मानव, पशु, पक्षी, आदि समूह मे रहकर जीवन जीते आये हैं। उनमें भी मानवसमूह विशिष्टï है। भगवान ने मनुष्य को बुद्घि दी है। इसलिए समूह में भी सबका कल्याण हो, सब आनंद प्राप्त कर सकें ऐसी व्यवस्था मनुष्य करने लगा। कालक्रम में इसमें वह परिवर्तन और नियंत्रण करने लगा। आदिकाल में ही हमारा समाज-निर्माण हुआ और समाज में संस्कृति का प्रादुर्भाव हुआ।
मनुष्य समाज में रहता है तथा समाज और संस्कृति एक दूसरे के पूरक हैं। समाज के बारे में आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने परिभाषाएं दी हैं। जैसे आरएम विलियम्स लिखते हैं-
एक सामाजिक समूह परस्पर संबंध। भूमिकाएं अदा करते हुए, लोगों का स्वयं तथा दूसरों से परस्पर क्रिया की इकाई रूप में माना हुआ, समूह है। इस प्रकार सामाजिक समुदाय कुछ निश्चित लोगों का समुदाय है। इस समूह में ही संस्कृति  पलती है। संस्कृति की भी अनेक समाजशास्त्रियों ने परिभाषाएं की हैं। जैसे ए डब्ल्यू ग्रीन ने लिखा है कि संस्कृति ज्ञान, व्यवहार, विश्वास की उन आदर्श पद्घतियों की तथा ज्ञान और व्यवहार से उत्पन्न हुए साधनों की व्यवस्था को कहते हैं जो सामाजिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो सामाजिक विरासत में गिने जाने वाले सब संस्कृति में आ जाते हैं। मेकाइवर और पेज लिखते हैं कि संस्कृति हमारे रहने और सोचने के तरीके, दैनिक कार्यकलाप, कला, साहित्य, धर्म, मनोरंजन और सुखोपभोग के तरीकों से अभिव्यक्त होती है। इस प्रकार संस्कृति में हमारी भावनाओं, मूल्यों शैलियों और बौद्घिक अभिव्यक्तियों का समावेश होता है। वोगार्ड के मतानुसार संस्कृति समाज के रीतिरिवाजों परंपराओं और चालू व्यवहार के प्रतिमानों से बनती है। संस्कृति समाज का मूल धन है। वह मूल्यों की ऐसी पूर्ववर्ती सृष्टïी है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति पैदा होता है और विकसित होता है।
संस्कृति शब्द का व्याकरण की दृष्टिï से निर्वचन करें तो सम उपसर्ग पूर्वक कृ धातु से सुट् आगम करके रिक्त प्रत्यय के योग से निष्पन्न माना गया है, जिस का अर्थ है अलंकृत सम्यक कृति अथवा चेष्टïा। संस्कृति मानव को सुव्यस्थित सामाजिक व्यवहार प्रदान करती है। व्यक्ति समाज में रहकर अपनी संस्कृति के अनुसार जीवन व्यतीत कर आनंद प्राप्त कर सकता है। डा. रामबेचन पांडेय ने योग्य ही लिखा है कि संस्कृति समाज को वैशिष्टï्य एवं व्यक्तित्व देती है। संस्कृति का दूसरा अर्थ करें तो सम्यक कृति अर्थात परमेश्वर की श्रेष्ठ कृति मानव को सदैव श्रेष्ठता के उन्नत शिखर पर स्थिर रहने का मार्गदर्शन देती हुई, हमारे ऋषिमुनियों के द्वारा सर्जन की हुई एवं तदनुकूल आचारसंहिता का कालक्रम से संस्कृति में समावेश हो गया। भिन्न भिन्न समाजों में भिन्न भिन्न संस्कृति होती है। संस्कृति की अपनी अपनी विशेषताएं रहती हैं। इसी तरह पौर्वात्य एवं पाश्चात्य संस्कृति में भी भिन्नता दिखाई पडती है। जैसे पाश्चात्य देशवासी पौर्वात्य देशवासियों को असभ्य और असंस्कृत मानते हैं। समाज जिस को सत्य मानता है वह उसकी संस्कृति बन जाती है।
भारतीय संस्कृति को प्राचीन काल से गौरव प्राप्त रहा है। भारतीय संस्कृति का बीज हमें वैदिक संस्कृति में मिलता है। वेदों में घुमंतु चरवाहों के स्थिर निकेतन कृषीवलों का, ग्रामों का एवं पुरों का उल्लेख मिलता है। वैदिक ऋषि बाद तक नगर जीवन के पक्षधर न होकर अरण्यवास के प्रेमी थे। वेदों में वैदिक काल की ग्राम्य संस्कृति और नगर संस्कृति का उल्लेख मिलता है। वैदिक काल में भी आज की तरह गांवों की अपेक्षा नगरों में ज्यादा लोग रहते थे। गांव में एक मुखिया होते थे और उनको ग्रामीणी कहा जाता था। लोग ग्रामीणी का चयन करते थे। राजा के चयन और निर्वाचन के लिए ग्रामणिओं का भी स्थान था। डॉ कपिलदेव द्विवेदी के मतानुसार किसान, कुम्हार, सेवक, पशुपालक, वैद्यादि गांवों में रहने वाले थे। प्राय: गांवों में किसान और पशुपालक लोग ही अधिक थे। वैदिककाल में कृषि को अधिक महत्व दिया जाता था। इसलिए कृषिविषयक अनेक सूक्त मिलते हैं। उस समय गौ को भी गौरव दिया जाता था। वैदिककाल में नगर में भी विभिन्न व्यवसाय करने वाले लोग होते थे। वैदिककाल में ग्राम्यसंस्कृति में प्राय: संयुक्त कुटुम्ब व्यवस्था थी। कुटुम्ब में सब मिल जुलकर रहते थे और कुटुम्ब में बुजुर्ग लोगों का सम्मान था। आधुनिक युग में भी गांवों में संयुक्त कुटुम्ब व्यवस्था दिखाई पड़ती है। वैदिक काल में सब लोगों के लिए सुख की कामना की जाती थी।
सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु कश्चिद दु:खमाप्नुयात।।
वैदिक संस्कृति में चार वर्णों की व्यवस्था थी समाजरूपी शरीर के ये चार अंग थे। जैसे मनुष्य शरीर में सब अंगों का अपना महत्व है वैसे ही वैदिककाल में इन सभी वर्णों का महत्व था। समाज व्यवहार सुव्यवस्थित रीति से चले इस लिए वर्णव्यवस्था थी। श्रीमदभगवदगीता में भी भगवान कहते हैं कि गुण और कर्म के आधार पर मैंने वर्णव्यस्था की है। वैदिक काल में मनुष्य में ऊंच नीच का भेद भाव नहीं था। ऋषि अपने से छोटे वर्ण में उत्पन्न व्यक्तियों को नमन किया करते थे। ब्रिटेन में सामाजिक विभाजन तीन श्रेणियों में किया गया है।
1 लर्जी 2 नोबेलिटी 3 कामन्स
जिसमें चौथा पोलेटेरियर भी जोड़ा जा सकता है। यहां भी समाज व्यवस्था के लिए ही विभाजन किया हुआ है। आदिमानव पशुवत जीवन व्यतीत किया करता था। धीरे धीरे समाज और संस्कृति ने उनको मनुष्यत्व प्रदान किया जो परस्पर मिलजुल कर अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने लगा। समाज में रहने वाला हर मनुष्य अपनी संस्कृति के अनुसार व्यवहार करे यह अनिवार्य हो गया।
संस्कृति में लोक और परलोक का विचार समाविष्टï हुआ, अच्छे कर्म करने वाले लोगों को इस लोक में आदर मिलने लगा और परलोक में भी सुख प्राप्त होता है-ऐसी मान्यता दृढ हुई। पापपुण्य का विचार समाविष्टï हुआ। अत: वैदिक काल के अध्यापकों से कहा गया है कि समाज पाप से बचे, ऐसी शिक्षा दें। संस्कृति के साथ जुड़ा हुआ पाप पुण्य का विचार समाविष्टï हुआ। अत: वैदिक काल के अध्यापकों से कहा गया है कि समाज पाप से बचे, ऐसी शिक्षा दें। संस्कृति के साथ जुड़ा हुआ पाप पुण्य का विचार मनुष्य को आध्यात्मिक ऊर्जा देता है, जो मनुष्य को जीवन में नियंत्रित करता है और निराशा से आश्वासन देता है कि मनुष्य जनम दिव्य है और जी भरकर जीने का संदेश देता है।
संस्कृति में मनुष्य के पूर्वजों के आचरण मार्गदर्शित विचारों, परंपराओं, मान्यताओं, आचार संहिताओं, सुविधाओं और प्रतिमानों का समावेश होता है, जिनसे मनुष्य अपना जीवन सुव्यवस्थित कर सकता है और आनंद प्राप्त कर सकता है। वैदिक संस्कृति वैसी ही संस्कृति है। उससे मनुष्य को जीवन जीने की वैज्ञानिक सूझ मिलती है। वहां मनुष्य को भौतिक और आध्यात्मिक सुख प्राप्त करने का उपाय दिखाया गया है और वह सुख लोग प्राप्त करते थे। भागदौड के आज के युग में भी मनुष्य वैदिक संस्कृति का मार्गदर्शन कर चिंतामुक्त हो कर सुखी रह सकता है।

Comment:

betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meybet giriş
meybet giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
hititbet giriş
meybet
meybet
orisbet giriş
orisbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
interbahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
hiltonbet giriş