आज राष्ट्रवाद को बढ़ाने की जरूरत है:हिंदू महासभा

हिन्दुत्व को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी भारत की एक जीवन प्रणाली स्वीकार किया है। माननीय उच्च न्यायालय के अपने एक आदेश में पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि यह विचारधारा किसी प्रकार की साम्प्रदायिकता नहीं है, अपितु यह विचारधारा मानवतावादी रही है। महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस एम.सी. छांगला ने भी बहुत पहले यह स्पष्ट कर दिया था कि हिंदू राष्ट्रीयता का प्रतीक शब्द है। हिंदुस्तान में रहने वाला हर व्यक्ति उसी प्रकार हिंदू है जिस प्रकार अमेरिका में रहने वाला व्यक्ति अमेरिकन और चीन में रहने वाला व्यक्ति चीनी है।हिंदू स्वभाव से उदार होता है इसलिए उदारता हिंदुत्व की पहचान है। हिंदुत्व मानव समाज के प्रति ही नहीं अपितु प्राणिमात्र के लिए भी दयाभाव रखता है। इसलिए अहिंसा प्रेम उसका भूषण है। हिंदू महासभा की दादरी में हुई बैठक में यही निचोड़ निकल कर सामने आया। सभी वक्ताओं और प्रतिनिधियों ने इस बात पर दु:ख व्यक्त किया कि हिंदुत्व जैसी मानवता वादी जीवन प्रणाली को कुछ लोग साम्प्रदायिकता के साथ जोड़कर देखते हैं। ये वो लोग हैं जो स्वयं साम्प्रदायिक हैं और अपनी सांप्रदायिकता को छिपाने के लिए हिंदू महासभा पर दोष मढ़ते हैं। हिंदू महासभा साम्प्रदायिकता की विरोधी रही है और उसने साम्प्रदायिक आधार पर देश के बंटवारे का विरोध किया था। देश के दुर्भाग्य से सत्ता उस समय उन लोगों के हाथ में आ गयी जिन्होंने बंटवारे के प्रस्ताव पर सबसे पहले हस्ताक्षर किये थे। हिंदू महासभा की बैठक में कश्मीर से हिंदुओं के पलायन और आसाम सहित पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में बिगड़े जनसांख्यिकीय आंकड़ों की गंभीरता पर केन्द्र सरकार को आगाह करते हुए कदम उठाने की मांग की गयी है। बैठक में अल्पसंख्यकों को मिलने वाले आरक्षण को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय तथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा अस्वीकृत किये जाने पर प्रसन्नता व्यक्त की गयी तथा मांग की गयी कि देश में आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना चाहिए। चाहे व्यक्ति किसी भी जाति, सम्प्रदाय अथवा वर्ग का क्यों न हो। महासभा ने गंगा की निर्मल और अविरल धारा को लोकहित में पवित्र बनाने के लिए भी केन्द्र सरकार से इस संबंध में एक अलग मंत्रालय की स्थापना करने की मांग की है। अपने राजनीतिक प्रस्तावों में हिंदू महासभा ने केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना करते हुए कहा है कि घरेलू और विदेश दोनों नीतियों पर यह सरकार असफल रही है। पार्टी का मानना है कि भाजपा भी अपनी दोगली चाल और छदम नीतियों के कारण हिंदू समाज का भला नहीं कर पायी। उसके चिंतन का भी दीवाला पिट गया और यही कारण है कि आज इस पार्टी के बड़े नेताओं की जूतियों में दाल बंट रही है। देश का बहुसंख्यक समाज इस पार्टी ने निराश किया है।महासभा ने कहा है कि उत्तर प्रदेश की सरकार साम्प्रदायिक शक्तियों के हाथों का खिलौना बनकर रह गयी है। वोटों के लिए लोगों का तुष्टीकरण किया जा रहा है। जिससे न्यायसंगत शासन प्रदेश की जनता को नहीं मिल पा रहा है। प्रदेश में जातिवाद और सम्प्रदायवाद का बोलबाला है। यह स्थिति निश्चित रूप से ही देश के लिए घातक है। आगामी दो हजार चौदह के लोकसभा चुनावों के लिए सारे दल अभी से तिकड़में भिड़ाने लगे हैं और देश के समाज को जातियों और सम्प्रदायों में बांटने की कुचालों में लग गये हैं। ऐसी परिस्थितियों में राष्ट्रीय सोच को विकसित करने और राष्ट्रवादी लोागें का साथ देकर व्यवस्था परिवर्तन करने की आवश्यकता है।

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