विरजानन्द दंडी जी की अध्यापन प्रणाली लेख *

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(जगतगुरु महर्षि दयानंद सरस्वती जी की 200 वीं जयंती के उपलक्ष्य में 200 लेखों की लेखमाला के क्रम में आर्य जनों के अवलोकनार्थ लेख संख्या 7)

प्रज्ञा चक्षु विरजानन्द जी अपने प्रत्येक विद्यार्थी को अपूर्व व अभिनव प्रणाली से पढ़ाते थे। जैसे अध्यापक गण सब छात्रों को एकत्रित करके उनका विभाग करके एक-एक श्रेणी को पढ़ाते हैं विरजानन्द जी इस प्रणाली से नहीं पढ़ाया करते थे। प्रातः व सायं कालीन समय के भीतर जिस समय जो विद्यार्थी आ जाता और पुस्तक लेकर बैठ जाता उसी समय उसे पढ़ाने लग जाते थे। कभी-कभी तो संध्या के पश्चात भी रात्रि के 8 व9 बजे तक भी विद्यार्थी दंडी जी के पास बैठकर पढ़ते थे। दंडी जी बिना विश्राम उन्हें पढ़ाते जाते। जब तक पढ़ने वाला स्वयं न थक जाता वह पढ़ाना बंद नहीं करते थे। विरजानन्द जी के लघु जीवन चरित् लेखक देवेंद्र नाथ मुखोपाध्याय ने उनके विषय में ठीक ही लिखा है।

” दंडी जी की पाठशाला रूपी अन्नशाला में सदा अन्न व्यंजन प्रस्तुत रहता था। केवल आवश्यकता इतनी थी कि तुम वहां जायो पत्तल डालो और खाओ”।

आज देश में पौराणिक पद्धति से संचालित होने वाले गुरुकुलो की तो बात ही छोड़िए आर्ष पद्धति से संचालित होने वाले कुछ गुरुकुलो में भी प्रायः यह देखा जाता है आचार्य विद्यार्थी पर इतना बौद्धिक श्रम नहीं करते।

संसाधनों से संपन्न गुरुकुलो में भी है बौद्धिक श्रम से वितराग वृत्ति देखी जाती है।

ऐसे आराम मतलब आधुनिक आचार्यों को प्रज्ञा चक्षु विरजानन्द जी के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए।

एक बार दंडी जी की पाठशाला में धरणीधर नामी एक नैयायिक पंडित दांडी जी के पास शास्त्रार्थ के उद्देश्य आया। दंडी जी के साथ थोड़े ही वार्तालाप के पश्चात यह बात कहकर उसने विदा ली—” मैंने 14 वर्ष का समय वृथा ही नष्ट किया नवद्वीप न जाकर आपके पास आकर पढता तो अच्छा होता ।

लेखकीय टिप्पणी
नवद्वीप भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के नादिया जिले का एक धार्मिक सांस्कृतिक नगर है। जो दो नदियों के संगम के बीच स्थित है। प्राचीन काल से ही यह नगर संस्कृत व न्याय दर्शन के अध्ययन के लिए प्रसिद्ध रहा है यहां अनेको महाविद्यालय थे। बंगाल के संत चैतन्य महाप्रभु की भी यह जन्म स्थली है।

अध्यापन के समय के अतिरिक्त विरजानन्द जी की पाठशाला का द्वार बंद रहता था। जब कोई बाहर से दरवाजा खटखटाता तो दंडी जी पूछते तुम कौन हो? आगंतुक यदि कहता मैं आपके दर्शन के लिए आया हूं तो दंडी जी तत्काल उत्तर देते दर्शन की आवश्यकता नहीं है लौट जाओ। यदि आने वाला कहता मैं विद्यार्थी हूं तो दरवाजा खोलकर उसे भीतर बेठा लेते ।उसको पढ़ाने बैठ जाते उसके साथ विद्या संबंधी वार्तालाप करने लग जाते।
अपनी पाठशाला में पाणिनि युग के पश्चात पंडित जी नवीन शिक्षार्थी विद्यार्थियों की परीक्षा लेने लगे थे जिसे आज की भाषा में हम स्क्रीनिंग कह सकते हैं। वह पढ़ने वाले की बुद्धि की परीक्षा करके जान लेते कि वह मेधावी है या नही ।योग्य होने पर पाठशाला में उसे स्वीकार कर लेते थे। जिस विद्यार्थी के विषय में वह बताते की इतने समय में यह व्याकरण पर अधिकार कर लेगा ठीक उतने ही समय में वह व्याकरण में दक्ष हो जाता था। दूसरा परिवर्तन उन्होंने यह किया अब कोई नया विद्यार्थी आता तो वह पूछते थे तुमने साधारण मनुष्य प्रणीत पुस्तक पढ़ी है या ऋषि प्रणीत यदि वह कहता मनुष्य प्रणीत पढी है तो कहते मनुष्य प्रणीत ग्रन्थों का मल तुम्हारे ह्रदय में किसी प्रकार के आर्ष ज्ञान को नहीं बैठने देगा। तुम मनुष्य प्रणीत ग्रन्थों की सब बात भूल जाओ। जो भी मनुष्य प्रणीत ग्रन्थ तुम्हारे पास है उसे फेंक दो। विद्यार्थी के ऐसा करने पर ही वह उसे पढ़ाते थे।

दंडी जी किसी भी विद्यार्थी को टीका, भाष्य , वृत्ति की सहायता से नहीं पढ़ते थे। दांडी जी ने अपनी यह मान्यता निर्धारित की थी कि आर्ष ग्रंथों के भाष्य के नाम पर अनार्ष ग्रन्थों की संख्या बहुत बढ़ गई है। नाना मत मतांतर उत्पन्न हो गए हैं। सैकड़ो संप्रदाय बन गए हैं। वह प्रत्येक सूत्र का पदच्छेद कर कर बहुत सरल रीति से पढ़ते थे। सूत्र श्लोक का उच्चारण इतना मधुर शांत होता था कि विद्यार्थी सुनकर ही अर्थ का अनुमान लगा लेता था। दंडी जी की उच्चारण शुद्धता उत्तम उच्च कोटि की थी जिसकी तुलना नहीं की जा सकती।

दांडी जब विद्यार्थियों को पढ़ाते थे तो किसी ऊंचे आसन या गद्दी पर बैठकर नहीं पढ़ाते थे ।गद्दी को वह परिहास करते हुए कहते थे यह गद्दी नहीं, गधी है। वह कहा करते थे उसी ऋषियों का जिस प्रकार उच्च आदर्श होता है उसी प्रकार ऋषि के ग्रन्थों में भी समदर्शिता होती है ऋषि प्रणीत ग्रन्थों के अध्यापन के समय वह समदर्शीता का पालन करते थे। अपने शिष्यों के सुख-दुख का भी ख्याल करते थे। कोई कष्ट नही बना रहे वह पूरी चेष्टा करते थे। उनके किसी भी विद्यार्थी की कही निंदा ना हो किसी के आचरण में कोई दोष हीनता ना हो यह भी दंडी जी सुनिश्चित करते थे ।दंडी जी आत्म स्वाभिमानी थे। एक बार मथुरा के एक सेठ गुरु सहाय मल ने दंडी जी के पास आकर उनके विद्यार्थियों की सहायता करने का प्रस्ताव किया ।दंडी जी ने तत्काल उत्तर दिया हमारे विद्यार्थी गण क्या भूखे हैं जो आपका सहायता लेंगे।

ऐसे अनेकों प्रसंग दंडी जी के सम्बन्ध में उपलब्ध है जो उनके शिष्य गण वनमाली चौबे आदि ने उनके जीवनीकारों को बतलाए है।

गुरु यदि त्यागी विरक्त होगा तो उससे शिष्य भी इसी मार्ग पर चलेंगे ।आह! कितने कितने गुरू भक्त थे दयानंद जिसने गुरु के पग का अनुशीलन अनुकरण करते हुए सर्वदा गद्दीयो को लात मारी।

दुर्भाग्य है आज इस देश की आधुनिक यूनिवर्सिटीयो में चेयर गद्दीयो की ही लड़ाई है। मठ मंदिरों में गद्दी को लेकर झगड़े हैं।

राजनीतिक क्षेत्र का तो कहना ही क्या।

हमने विरजानंद ,दयानंद सरीखे सुधारको, गुरुवरो, संतों के पावन जीवन चरित्र से कोई प्रेरणा नहीं ली।

शेष अगले लेख में

आर्य सागर खारी 🖋️

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