हम दानव नही मानव बनें

अथर्ववेद के आठवें काण्ड के सूक्त संख्या दो मंत्र संख्या 8 का एक मंत्र है-
आरादरातिं निऋतिं परोग्राहिं क्रव्याद:
पिशाचान। रक्षा यत्सर्वं दुर्भूतं तत्तम इवाप हन्मसि।।
जिन व्यक्तियों में दान न देने की वृत्ति होती है, जो अदानी होते हेँ वह दानव हैं, क्योंकि दान न देने की वृत्ति भोगप्रवण बनाती है, यही भोगप्रवणता मृत्यु की ओर ले जाती है। इसके विपरीत जो दानशील हैं, वह मानव हैं क्योंकि दान देने की वृत्ति त्याग प्रवण कहलाती हैं। यही त्याग प्रवणता मोक्ष की ओर ले जाती है। हम मान तभी पा सकते हैं जब हम दानशील बनें। दानशील व्यक्ति न केवल मान पाता है बल्कि उसकी आत्मा को भी संतोष मिलता है, मान मिलने से यश की प्राप्ति भी होती है।
एक बार की घटना है कि किसी धार्मिक स्थल पर एक पवित्र यज्ञ चल रहा था। एक सज्जन प्रतिदिन उस आयोजन में सम्मिलित होते थे। यज्ञ के समापन पर उस सज्जन ने धन की पोटली संयोजक महोदय को जैसे ही प्रदान की, संयोजक महोदय ने कहा-आईए सेठ जी! मंच पर तो इस धन की पोटली को रखिए, मैं इतने दिन से कार्यक्रम में आ रहा था, आपने मुझे मंच पर कभी नही बुलाया। आज कैसे मैं सेठजी भी हो गया और मंच पर भी बुलाना चाहते हैं, क्या बात है? संयोजक महोदय ने कहा महाशय जी यह धन की पोटली आपके पास थी तब तक आप केवल आप थे, जब आपने इस धन की पोटली का त्याग किया, दान किया, तभी आप सेठ जी भी कहलाए जा रहे और मंच पर भी निमंत्रण किया जा रहा है, तभी आपको मान भी मिल रहा है। अत: दानशीलता व्यक्ति को दानवता से हटाकर मानवता की ओर जोड़ता है, यश और मान की प्राप्ति भी कराता है। अत: आराति न बनें, दानशील बनें। इसीलिए तैत्तिरीय उपनिषद में कहा है-
श्रद्घया देयम-श्रद्घा से दान करना चाहिए।
अश्रद्घया देयम-अश्रद्घा से भी दान करना चाहिए।
श्रिया देयम-प्रसन्नता (यश) के लिए दान करना चाहिए।
हिया देयम-लज्जा से दान देना चाहिए।
भिया देयम-भय से दान देना चाहिए।
जिस घरमें कलह होता है, उस कुल को निऋति ग्रहीत कहते हैं। घर में कलह विनाश का कारण है यह दानवता है। जिस घर में शांति होती है उस घर में उन्नति और ऐश्वर्य की वृद्घि होती है। घरों में अनेक बार झगड़े होते हैं। सास अपनी बहू के दोष पुत्र को कहकर पुत्र की पीढ़ा को बढ़ाती रहती है और पत्नी अपने पति से सदैव अपनी सास की शिकायत करती रहती है यही दानवता है। पुत्र तथा पति के रूप में यदि युवा केवल चुप ही रह जाता है, न्याय और अन्याय का निर्णय नही करता। यह भी मानवता नही है इसे मानसिक हिंसा भी कह सकते हैं। यदि आप घर के मुखिया हैं और आप न्यायपूर्ण निष्पक्ष व्यवहार नही करते तो समझो आप में मानवता की कमी है। पुत्र अपनी मां को और पति अपनी पत्नी को यदि सदैव प्रसन्न रखना चाहता है तो उसे निष्पक्ष होकर न्यायपूर्वक निर्णय करना होगा समझौता भी न्यायपूर्ण होना चाहिए। कोई भी पुत्र अपनी मां को पूरी सुविधायें नही दे सकता और न ही कोई पति अपनी पत्नी को पूरी सुविधायें दे सकता है ऐसे में दोनों की सीमाओं का ध्यान रखते हुए निष्पक्षता पूर्वक निर्णय ले यही मानवता है, यही सच्ची अहिंसा है किसी के प्रति अन्याय दानवता एवं हिंसा है।
शरीर मन, वाणी से किसी को अन्यायपूर्ण किसी कारण कोई कष्टï न दिया जाना अहिंसा एवं मानवता है न्यायपूर्ण व्यवहार करना मानवता है, अन्यायपूर्ण व्यवहार सहना भी दानवता है।
न्यायपूर्ण व्यक्ति का समर्थन न करना भी हिंसा एवं दानवता है। यदि आप किसी सभा में जा रहे हैं वहां यदि आप किन्हीं स्वार्थों के कारण न्याय के पक्ष नही ले रहे तो भी मानवता के विरोधी हैं। जिस सभा में असत्य का पक्ष लिया जाता है वह सभा मरे हुए लोगों की सभा मानी जाती है। जब दुर्योधन, दु:शासन ने द्रोपदी का भरी सभा में अपमान किया तथा तब द्रोपदी ने द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह को उलाहने भरे शब्दों में कहा था-यह सभा, सभा नही है यह तो मरे हुए लोगों की सभा है। यदि आप सच्चे अहिंसक और मानव की कोटि में आना चाहते हैं तो आपका सभा में भी सत्य को सत्य कहने का साहस होना चाहिए।
लोभवृत्ति भी दानव होने का लक्षण है जो व्यक्ति लेता ही लेता है, लेने में विश्वास रखता है, देने में नहीं, वह भी दानव बन जाता है, धन ही उसके जीवन का उद्देश्य बन जाता है, यही उसके निधन का कारण बन जाता है। जो महान व्यक्ति वेद के सत्य नियमों का पालन (ब्राहमण का कत्र्तव्य है कि दान लेना और दान देना) नही करता है वह पतित माना जाता है, जो लेता है परंतु देने का स्वभाव नही है, वह ब्रहमा आज्ञा के विरूद्घ आचरण करता है, ऐसे बिगड़े पतित ब्राहमण को निऋति एवं लोभी कहा है वह मानव भी दानव की श्रेणी में चला जाता है। जो क्षत्रिय अपनी रक्षा करने के स्वभाव को छोड़कर दूसरे प्राणियों और मनुष्यों के मास का भक्षण करता है, लुटेरा बन जाता है, ऐसे गिद्घ, कौवे, शेर, चीतों की तरह दूसरों की मांस को अपने पोषण के लिए प्रयोग करता है ऐसे पतित क्षत्रिय को दानव के क्रव्याद श्रेणी में रखा जाता है।
जो वैश्य गरीबों को दान देने की बजाए गरीबों का रक्त पी जाते हैं ब्याज पर ब्याज लगाकर, निर्धन को जीवित अवस्था में मरे हुए के तुल्य कर देते हैं पशुओं से अधिक परिश्रम लेकर उन्हें कम भोजन देकर दुखी करते हैं अपने कर्मचारियों से अधिक कार्य कराकर उन्हें कम पारिश्रमिक देते हैं वह वैश्य भी पतित श्रेणी में माने जाते हैं वह भी दानव की कोटि के होने के कारण पिशाच कहलाते हैं।
क्रूर कर्म करने वाले मानव को राक्षस कहते हैं। शरीर से उत्तम कर्म करने वाले को जो सबकी सेवा करता है सेवा के द्वारा ही प्रभु की प्राप्ति करता है, उसे शूद्र कहते हैं। शूद्र जो कि उत्तम गुण कर्म से युक्त था, उसे त्याग कर दुष्ट कर्मों में प्रवृत्त हो जाता है, दूसरों की सेवा न कर उन्हें हानि पहुंचाता है, सदा दुष्ट कर्मों को करता है। सज्जनों के प्रति बुरा व्यवहार और दुर्जनों के प्रति मित्रता का भाव रखता है वह मानव श्रेणी से पतित होकर दानव श्रेणी में आ जाता है। हमारे किसी कर्म से किसी को बाधा पहुंचे इसे भी दानवता व हिंसा कह सकते हैं। हमारे किसी कर्म से किसी को बाधा न पहुंचे इसे मानवता कहते हैं। दूसरों के प्रति गलत सोचना भी दानवता है, इसेस हमारी संस्कार दूषित हो जाएंगे इससे पाप और बढेंगे। शरीर और वाणी से जो हिंसा करते हैं, वह पहले मन से शुरू होते हैं अत: हमें पहले मानसिक हिंसा से बचना चाहिए। यही हिंसा हमें दानवता की ओर ले जाती है। स्वतंत्रता अच्छी बात है परंतु स्वच्छंदता दानवता है। सामान्य व्यवहार में दूसरों को प्रेम से समझायें यदि बार बार समझाने पर भी वह नही मानता तो कठोरता का प्रयोग कर सकते हैं। यह कठोरता भी मानवता है हिंसा नही है। परंतु यदि बिना किसी कारण के क्रोध व द्वेष के कारण कठोर वाणी का प्रयोग हो रहा है तो यह भी दानवता है। यदि हम पक्षपात और वैरभाव को भुलाकर कार्य करेंगे तो सृष्टि आनंदमयी हो जाएगी।
अत: हमारा कत्र्तव्य है कि सबसे प्रीति रखते हुए परंतु महर्षि दयानंद के शब्द के अनुसार-सबसे प्रीतिपूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य वर्तना चाहिए। की भावना के अनुसार कर्म करेंगे तो समाज में मानवता के गुणों का विकास होगा।

Comment:

norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpas giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
mariobet giriş
betvole giriş
mariobet giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
mariobet giriş
betpas giriş
hititbet giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
dedebet
betkanyon
radissonbet
casinofast
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
norabahis giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betwild giriş
redwin giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betpark giriş
vegabet giriş
vegabet giriş
redwin giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
realbahis giriş
realbahis giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
timebet giriş
timebet giriş
betpark giriş