इतिहास की कालिमा के चलते पसमांदा मुस्लिमों पर पिछड़े दलितों की राजनीति करने वाले खामोश हैं

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नवीन कुमार पाण्डेय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया है कि देश में पसमांदा मुसलमानों से ऐतिहासिक अन्याय हुआ है, उनके साथ लगातार भेदभाव होता रहा है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की एक रैली में प्रधानमंत्री के इस बयान से कथित धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदारों के बीच खलबली मच गई है। खुद को मुसलमानों का हितैषी और उनका रहनुमा बताने वाले तिलिमला गए हैं। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (AIMIM) चीफ असदुद्दीन ओवैसी के बयान देखेंगे तो बौखलाहट का अंदाजा लग जाएगा। वो पसमांदा की बात करते-करते पीएम मोदी पर व्यक्तिगत आक्षेप लगाने तक पहुंच गए। वो अपने लंबे-चौड़े बयान के आखिर में कहते हैं, ‘अगर कानून बनाना ही है तो उन मर्दों के खिलाफ बनाना चाहिए जो शादी के बाद भी अपनी पत्नी को छोड़कर फरार हो जाते हैं।’ हिंदी प्रदेश का एक मशहूर मुहावरा है- हंसुआ के बियाह में खुरपी का गीत। मतलब, संदर्भ कुछ और बयानबाजी कुछ और। बात पसमांदा मुसलमानों की हो रही है तो ओवैसी तीन तलाक के खिलाफ निर्मित कानून पर आ गए। खैर, यहां बात ओवैसी या उन जैसे नेताओं की नहीं, बात करेंगे कथित पिछड़ा कल्याण की राजनीति की। पिछड़ों की राजनीति करने वालों ने कैसे पिछड़े वर्ग के कल्याण की जगह पूरा फोकस समाज में जहर घोलने पर रखा।

यह संयोग नहीं है कि जिन दलों, संस्थाओं और शख्सियतों ने दलित-पिछड़ा उद्धार का ठेका लिया है, वही खुद के मुस्लिम हितैषी होने का भी दंभ भरते हैं। लेकिन जब मुसलमानों में पिछड़े यानी पसमांदा की बात आती है तो उनका रवैया बदल जाता है। जो हिंदुओं के दलित-पिछड़े और आदिवासियों के अधिकारों की बात, गला फाड़-फाड़कर करते हैं, उनके मुंह मुसलमानों के पिछड़ों पर बिंध से जाते हैं। पसमांदा पर बिल्कुल चुप्पी, घोर सन्नाटा। ऐसा क्यों? क्योंकि मकसद पिछड़ों का हित नहीं, अपनी राजनीति का उल्लू सीधा करना है। हिंदुओं के पिछड़ों के कल्याण के बहाने समाज में जिस तरह का जहर बोया गया, वो मुसलमानों के बीच नहीं हो सकता। पिछड़ों की राजनीति करने वालों के दोहरेपन की इंतहा यह है कि वो हिंदुओं में पिछड़ों के अधिकारों की तो बात करेंगे, लेकिन मुसलमानों में पिछड़ों की खुद बात करना तो दूर, कोई दूसरा करे तो उसे सांप्रदायिक ठहराने में तनिक देर नहीं करते।

पिछड़ों की राजनीति करने वाले हरेक दल की हालत यही है कि उन्होंने हिंदुओं की कथित उच्च जातियों- ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और कायस्थ के खिलाफ अभियान छेड़ा। उन्हें ऐतिहासिक रूप से शोषक साबित करने की हर कोशिश की। दलितों-पिछड़ों, आदिवासियों के मन में इन कथित उच्च जातियों के खिलाफ जहर कूट-कूटकर भर दिया। अब तो दलित-पिछड़ों की राजनीति करने वाले इतने डर गए हैं कि वो हिंदू समाज में सौहार्द्र का सपना भी देख लें तो नींद हराम हो जाती है। उनकी पूरी राजनीति हिंदुओं को जातियों में तोड़ो, दलितों-पिछड़ों को कथित अगड़ी जातियों के खिलाफ खड़ा रखो और वोट बटोरते रहो। आज दलित राजनीति का हाल ये है कि जिस किसी को भी खुद को दलित हितैषी साबित करना होता है, वो हिंदू प्रतीकों पर जोरदार हमला करता है।

आखिर, बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर यादव को रामचरित मानस के खिलाफ जहर उगलने की जरूरत क्यों पड़ी? उत्तर प्रदेश के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने उनका समर्थन क्यों किया? आखिर रामचरित मानस की प्रतियां जलाकर दलितों का किस तरह कल्याण हुआ? साफ है कि पिछड़ों को कथित उच्च जातियों और हिंदू धार्मिक प्रतीकों के खिलाफ खड़ा करने की पूरी कवायद जहरीली राजनीति का हिस्सा है, पिछड़ा-कल्याण का मार्ग नहीं। आज हाल यह है कि खुद को आंबेडकराइट्स कहने वाले अनिवार्य रूप से हिंदू विरोधी हो गए हैं। उनके हिंदू विरोध का आधार कथित जातीय जकड़न, पिछड़ों के शोषण का कथित तंत्र ही है। लेकिन हैरत की बात है वही आंबेडकराइट्स ‘भीम-मीम’ का नारा तो लगाते हैं, लेकिन मुसलमानों के पिछड़ों यानी पसमांदा के साथ हो रहे ऐतिहासिक अन्याय पर कुछ नहीं बोलते। बल्कि वो येन-केन प्रकारेण इसका बचाव करते हैं। कभी किसी दलित-पिछड़े की राजनीति करने वाले और दिन-रात मुसलमानों की चिंता में गलते रहने का दिखावा करने वाले को देखा है कि वो पसमांदा मुसलमानों के लिए आवाज उठा रहे हों, इसके लिए आंदोलन करना तो दूर?

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें वो एक हिंदू महिला का घूंघट खुद उठा देते हैं, लेकिन बुरके में सर से पैर तक ढंकी मुस्लिम महिला के सामने सावधान की मुद्रा में खड़े रहते हैं। सवाल है कि आखिर घूंघट पिछड़ापन है तो बुरका क्यों नहीं? अगर पिछड़ी जातियों के शोषण के लिए उच्च जातियों के खिलाफ मोर्चा खोला जा सकता है तो पसमांदा मुसलमानों के शोषण के लिए सैयद, शेख, मुगल, पठान के खिलाफ अभियान क्यों नहीं छेड़ा जाता? जब हिंदुओं के लिए ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी’ का नारा दिया जा सकता है तो फिर मुसलमानों के लिए क्यों नहीं? मुस्लिम समाज में पसमांदा की भागीदारी तो 85 प्रतिशत होने का दावा है। अगर मुसलमानों में 85 प्रतिशत आबादी पर 15 प्रतिशत का रौब चल रहा है तो आखिर हिंदू समाज में पिछड़ापन देखकर नींद-चैन खोने वाले दलों, नेताओं और बुद्धिजीवियों के माथे पर बल क्यों नहीं पड़ता है? इसमें तो कोई शक नहीं कि मुस्लिम राजनीति से लेकर सरकारी संस्थाओं और समाज तक उच्च जातीय मुसलमान ही कब्जा जमाए बैठे हैं। कांग्रेस नीत यूपीए सरकार की तरफ से गठित राजिंदर सच्चर समिति की वर्ष 2005 में आई रिपोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि कैसे मुट्ठीभर उच्च जातीय मुसलमान हर जगह छाए हुए हैं जबकि 85 प्रतिशत पसमांदा की भागीदारी सिमटकर रह गई है।

हैरत की बात है कि देश में हर कोई दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और मुसलमानों की भलाई की चिंता में ही मग्न है। हर किसी राजनीतिक दल का दावा है कि वो गरीब, पिछड़े और मुसलमानों के हितैषी हैं। ये सभी बीजेपी पर लांछन लगाते हैं कि यह फासीवादी दल है जो अमीरों और उच्च जाति के हिंदुओं का भला सोचती है। हालांकि, बीजेपी को लगातार दो लोकसभा चुनावों एवं अलग-अलग राज्यों के विधानसभा एवं स्थानीय चुनावों में समाज के कमजोर वर्ग के मतदाताओं का साथ मिलने और अब पार्टी की तरफ से पसमांदा के लिए अभियान छेड़ने से यह तोहमत भी आधारहीन ही साबित हो रही है। फिर भी, अगर यह मान भी लें कि बीजेपी को गरीबों, पिछड़ों और मुसलमानों की चिंता नहीं है तो सवाल यह है कि आज तक तो बाकी सभी पार्टियां दलित हितैषी होने का ही दावा करती रही हैं, फिर 70-75 वर्षों में दलितों की स्थिति क्यों नहीं सुधरी? नहीं सुधरी या जिस गति से सुधरनी चाहिए, उस रफ्तार से नहीं सुधरी, इसका दावा भी वही पार्टियां करती हैं, कोई और नहीं। इसी आधार पर तो वो आरक्षण की व्यवस्था अभी बनाए रखने को अनिवार्य बताते हैं।

क्या समाज के कमजोर तबके की आवाज होने का दंभ भरने वाले कभी इसका जवाब देंगे कि आखिर दशक पर दशक बीतने के बावजूद पिछड़ों की स्थिति क्यों नहीं सुधर पा रही है? खासकर, बिहार, यूपी, तमिलनाडु जैसे प्रदेशों में जहां दलित हितैषी और उच्च जाति के खिलाफ ताल ठोंककर विभिन्न दलों ने दशकों तक शासन किया, वहां दलितों-पिछड़ों के हालात कितने बदले हैं? अगर बदले हैं तो पसमांदा मुसलमानों के हालात क्यों नहीं बदलने चाहिए? उनके हितों की बात क्यों नहीं होनी चाहिए? उन्हें क्यों नहीं बताना चाहिए कि कैसे उनकी उच्च जातियां उनका शोषण कर रही हैं- ठीक उसी तरह, जिस तरह दलितों-पिछड़ों के जेहन में लगातार ठूंसा जा रहा है कि कथित उच्च जातियां उनके दुश्मन हैं? इसका जवाब सबको पता है।

एक भी दल ऐसा नहीं है जिसे सिर्फ दलितों-पीड़ितों की चिंता है, वो मुसलमानों की चिंता में भी समान रूप से डूबे रहते हैं। उनकी राजनीति ही यही है- हिंदुओं में जातीय पहचान को मजबूत करते रहो, कभी संपूर्ण हिंदू समाज को एक एंटिटि के रूप में मत सोचने दो और इसके उलट कभी मुसलमानों की एकजुटता भंग मत करो, उन्हें एक जमात बनाए रखो ताकि अपनी राजनीति चलती रहे। कर्नाटक विधानसभा चुनाव इस राजनीति की सफलता का सबसे ताजा उदाहरण है। वहां मुसलमानों ने कांग्रेस के पक्ष में एकमुश्त मतदान कर दिया और बीजेपी अपना पिछला प्रदर्शन दुहराकर भी बुरी तरह हार गई। कथित पिछड़ों और मुसलमानों की हितैषी राजनीति इन्हीं दो मोर्चों पर टिकी है- हिंदुओं में फूट, मुसलमानों की एकजुटता। इसलिए दिन-रात पिछड़ा-दलित की रट लगाने वाले, पसमांदा की बात करना तो दूर, सोचना तक सही नहीं समझते। अब बीजेपी पसमांदा का मुद्दा उठा रही है तो इनके पेट में मरोड़ें जरूर उठेंगी।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं।

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