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आस्तिकता और चमत्कार
कुछ लोग कहते हैं, भारत में ईश्वर अवश्य है । क्योंकि कोई भी इस देश को बसाना नहीं चाहता, फिर भी यह बसा हुआ है, यह किसी चमत्कार से कम नहीं है ।
नास्तिक विचार वाले लोगों का ईश्वर से सबसे बड़ी शिकायत यह होती है कि इतनी गड़बड़ हो रही है, फिर भी ईश्वर कुछ करता क्यों नहीं ?
जो कार्य मनुष्य कर सकता है, उसे करने से ही उन कार्यों की सार्थकता है, उसके लिए ईश्वर को दोष देता रहता है, और फिर एक बच्चे की तरह कह देता है, हे ईश्वर ! मैं तुझे नहीं मानता । तू है ही नहीं ।
ईश्वर को इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता है कि कोई उसे मानता है या नहीं । जो उसकी उपासना करता है, वही इससे लाभ उठाता है । नास्तिक भी दुःख होने पर रोते बिलखते हैं, सुख होने पर खुश होते हैं । अच्छा कार्य करने पर उनको भी आत्म-संतुष्टि मिलती है ।
आस्तिक लोग नास्तिकों से अधिक नास्तिक हैं । उन्हें ईश्वर की सत्ता के स्पष्ट दिखाई देने वाले लक्षणों, युक्तियों, प्रमाणों से कुछ लेना देना नहीं है । उसे तो वह चमत्कार चाहिए जिसे वह चमत्कार समझता है । यह विराट ब्रह्माण्ड, यह अद्भुत व्यवस्था, प्रकृति के नियम, कर्म-फल व्यवस्था, यह सृष्टि रचना , उन्हें चमत्कार नहीं लगता ।
तथाकथित आस्तिक लोग समोसे खाकर धन प्राप्ति या नौकरी मिलने को चमत्कार मानते हैं । वे लोग अविवाहित स्त्री से संतान होना, मुरदे का जी उठना आदि को ही चमत्कार मानते हैं । ऐसे ही चमत्कार उनकी आस्तिकता का आधार होता है ।
कोई गुरु, कोई भगवान (?) स्वयं को ईश्वर सिद्ध करने के लिए अपने अनुयायियों के आत्मिक उन्नति, योग मेें उन्नति के स्थान पर चमत्कारों की साक्षियाँ देते हैं । असाध्य रोग ठीक हो गया, नौकरी मिल गई, व्यापार में लाभ हो गया आदि । यह आस्तिकता तो नास्तिकता से भी ज्यादा हानिकारक है ।
आस्तिकता की आधारशिला है परमेश्वर की सर्वव्यापकता और न्याय व्यवस्था को जानना और मानना । जो यह मानते और जानते हैं कि परमेश्वर न्यायकारी है, वह कर्मों का फल पूरा-पूरा देता है, और परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार आचरण करते हैं, वे ही सच्चे आस्तिक हैं ।
जो यह सोचता है कि किसी व्यक्ति विशेष की सिफारिश से परमेश्वर हमारे पापकर्मों का फल नहीं देगा या पापों के बदले में सुख देगा, वह वास्तव में परमेश्वर का सबसे बड़ा निन्दक और नास्तिक है ।
आप्त पुरुषों के उपदेश और परमात्मा की उपासना से हम आगे पाप करने से हट जाते हैं, यह भी एक चमत्कार ही है ।
परमेश्वर की सर्वव्यापकता के कारण वह हमारे अच्छे बुरे कर्मों को ठीक प्रकार से जानता है । पाप के दुःख रूप फल से किसी भी प्रकार से बचा नहीं जा सकता । यही आस्तिकता की आधारशिला है ।
किसी चौथे, सातवें आसमान या किसी सतलोक में बैठा हुआ ईश्वर न तो हमारे कर्मों को जान सकता है, और न फल दे सकता है । वहाँ बैठाकर हमें उसके संदेश वाहकों की कहानी बनानी पड़ती है । फिर इसके प्रमाण के लिए चमत्कार |
संभवतः लोग सत्य ही कहते हैं कि इस देश में कोई ईश्वर अवश्य है । कोई ईश्वर का दूत बनकर खा रहा है । तो कोई अलग अलग ईश्वर बनाकर खा रहे हैं । कोई ईश्वर को गाली देकर खा रहा है ।
ईश्वर की भक्ति से मिलने वाले आत्मिक आनन्द को प्राप्त करने के विषय में भी कोई सोचे तो सचमुच में चमत्कार हो जाये ।
…… सहदेव समर्पित |
सम्पादक, शान्ति धर्मी पत्रिका |

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