हमारे देश में प्रजातंत्र की मजबूत जड़ों के होने की बात अक्सर कही जाती है, पर जब हम उत्तर प्रदेश में हो रही राजनीति की वर्तमान दुर्दशा के चित्रों को बार-बार घटित होते देखते हैं, तो यह विश्वास नहीं होता कि भारत में प्रजातंत्र की गहरी जड़ें हैं। उत्तर प्रदेश सहित कई प्रदेशों को कुछ परिवारों ने अपने ढंग के समाजवाद और अपने ढंग के लोकतंत्र में जकड़ रखा है। उत्तर प्रदेश में भी मुलायम सिंह यादव ने जिस ‘समाजवादी वंश’ की नींव रखी थीं वह उनकी एक सामंती सोच को ही दर्शाता है, उसमें ना तो कहीं लोकतंत्र था और ना ही कहीं समाजवाद था। यदि उनके समाजवाद वंशीय शासन में कही लोकतंत्र और समाजवाद होते तो पूरे प्रदेश को एक ही परिवार न संभाल रहा होता, और एक ही परिवार का स्वयंभू अध्यक्ष भी ना होता।
ऐसा नहीं है कि एक परिवार की वंशीय परंपरा की इस बीमारी से सपा ही ग्रसित है, और भी कई राजनीतिक दल हैं, जो इसी परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। इनमें कांग्रेस सबकी सिरमौर है। सब ‘चोर चोर मौसेरे भाई’ हैं-इसलिए जब भी कहीं लोकतंत्र की हत्या होती है तो दूसरे चोर यही कहते हैं कि यह उनका अपना भीतरी विषय है। मुलायम सिंह यादव के स्थान पर अखिलेश आ जाएं और कल को सोनिया के स्थान पर राहुल आ जाएं तो यह इनका अंदरूनी मामला है। इससे लोकतंत्र का और समाजवाद का कोई लेना देना नही है? कितनी अच्छी परिभाषा है और क्या अच्छा तर्क है, लोकतंत्र और समाजवाद की हत्या का कि सारी प्रतिभाओं की हत्या कर दो और कह दो कि यह तो इनका भीतरी विषय है।
माना कि अखिलेश एक गंभीर युवा हैं और उन्होंने अपनी गंभीरता से लोगों को प्रभावित भी किया है परंतु क्या अपने पिता के केवल वही वारिस हैं? क्या देश में राजतंत्र है जो सारे दरबारी केवल अखिलेश का ही ‘राजतिलक’ करने के लिए बाध्य हैं? लोकतंत्र और समाजवाद कहते हैं कि प्रतिभाएं तलाशों भी, तराशो भी और फिर उन्हें परोसो भी। परिवारवादी लोकतंत्र को देश की जनता पर थोपने वाले हमारे राजनीतिज्ञों ने प्रतिभाएं तलाशी तो हैं, पर उन्हें तराशा नही है और यदि तराशा भी है तो उतने तक ही जितने तक वे एक परिवार की भक्ति की साधना में सफल हो सकें और परोसा तो है ही नहीं। बसपा को देखिये, चाहे सपा को देखिये और चाहे कांग्रेस को या ऐसे अन्य राजनीतिक दलों को देखिये जो किसी परिवार की भक्ति में लगे हैं-सब में प्रतिभाओं पर कड़े पहरे लगे हैं। कड़े पहरों और प्रतिबंधों के बीच प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं और हम लोकतंत्र के उपासक होकर भी कहे जा रहे हैं कि यह उनका ‘अंदरूनी मामला’ है।
लोकतंत्र के पहले सिद्घांत (प्रतिभाएं तलाशो, तराशो और परोसो) की रक्षा यह लोकतंत्र और समाजवाद भी नहीं कर पाया है तो इसे देखकर कैसे कहा जाए कि भारत में लोकतंत्र की गहरी जड़ें हैं? ऐसा भी नही है कि भारत की जनता लोकतंत्र के इस सिद्घांत की हत्या में सम्मिलित ना हो। हम सब एक नागरिक के रूप में इस सारे हत्याकांड के लिए तब कहीं अधिक उत्तरदायी हो जाते हैं जब हम अपने मताधिकार का उचित प्रयोग नहीं कर पाते हैं और अपना मत मस्तिष्क का प्रयोग न करते हुए भावनाओं में बहकर दे आते हैं। मानो उस दिन लोकतंत्र और समाजवाद की हत्या का इन राजनीतिक दलों को प्रशस्ति पत्र और प्रमाणपत्र हम ही दे देते हैं कि तुमने जो कुछ किया या जो कुछ कर रहे हो वह सब कुछ उचित है, और हमें स्वीकार है। देश के लोगों के लिए ही किसी शायर ने क्या सुंदर लिखा है :-
”मंजिलें बड़ी जिद्दी होती हैं
हासिल कहां नसीब से होती है।
मगर वहां तूफान भी हार जाते हैं
जहां कश्तियां जिद पर होती हैं।
भरोसा ईश्वर पर है तो जो लिखा है
तकदीर में बस वही पाओगे
मगर भरोसा अगर खुद पर है तो
ईश्वर वही लिखेगा जो आप चाहोगे।”
सचमुच हमने अभी वह लिखना आरंभ नहीं किया है जो हमें लिखना चाहिए हम राजनीतिनिरपेक्ष रहकर राष्ट्र-धर्मनिरपेक्ष हो गये हैं। ‘कोऊ नृप होई हमें का हानि’ का गलत अर्थ हमें समझाया गया है कि कोई भी राजा बन जाए इससे हमें क्या लेना देना, जबकि इसका वास्तविक अर्थ है कि राजा चाहे कोई भी हो वह इतना न्यायी और धर्मप्रेमी होगा कि उससे हमें कोई हानि नही होगी। यह दूसरा अर्थ ही लोकतंत्र और समाजवाद की पहली शर्त घोषित करता है कि ‘राजा न्यायी और धर्मप्रेमी हो,’ ऐसे चेहरों को आगे लाकर सभी राजनीतिक दल परोसें और जनता से कहें कि इनमें से भी अपने लिए सर्वोत्तम को चुनो और उसे राजा बनाओ। यह सोच ही लोकतंत्र व समाजवाद की रीढ़ है। देश का वर्तमान लोकतंत्र व समाजवाद कह रहा है कि ‘निकृष्टतमों में से उत्कृष्टतम छांटो’ और लोकतंत्र व समाजवाद का सिद्घांत कहता है कि-‘उत्कृष्टों में से उत्कृष्टतम छांटो।’ जिस दिन देश में लोकतंत्र और समाजवाद के इस मूल सिद्घांत पर राजनीति काम करने लगेगी और ‘आउलों एवं व्याकुलों’ को किसी के द्वारा अपने ऊपर थोपने से यह कहकर इंकार कर देगी कि यह उनका अंदरूनी मामला नहीं, अपितु इससे देश के राजनीतिक चरित्र और व्यवस्था का गहरा संबंध है-उसी दिन यह कहा जाएगा कि देश में लोकतंत्र की गहरी जड़ें हैं। जनता को राजनीति सापेक्ष होना ही होगा और राजनीतिक दलों को प्रतिभाओं के तलाशने, तराशने और परोसने के लोकतांत्रिक समाजवादी मूल्य को अपनाने के लिए बाध्य करना ही होगा।

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