‘भारत नेहरू-गांधी का देश हो गया है।’ तथा इसकी विचारधारा गांधीवादी हो गयी है। ये विशेषण है जो हमारे कर्णधारों ने विशेषत: स्वतंत्र भारत में उछाले हैं। वास्तव में सच ये है कि इन विशेषणों के माध्यम से देश को बहुत छला गया है।

वाद क्या होता है?
हमें कभी ये भी विचार करना चाहिए कि ‘वाद’ होता क्या है? सीधे शब्दों में वाद का अर्थ है ‘विचारधारा।’ जब किसी व्यक्ति के साथ (उसके नाम सहित) ‘वाद’ को जोडक़र हम देखते हैं तो उस व्यक्ति के मौलिक चिंतन का अध्ययन करना आवश्यक होता है, जैसे-यदि हम माक्र्स की साम्यवादी विचारधारा का अवलोकन करें तो माक्र्स के मौलिक चिंतन के तत्वों को हमें उस साम्यवादी विचारधारा में खोजना होगा-जिसे आज का संसार ‘माक्र्सवाद’ के नाम से जानता है।
जितना अधिक इस विचारधारा में माक्र्स का मौलिक चिंतन होगा उतना ही अधिक इसे हम ‘माक्र्सवाद’  के नाम से जानेंगे। पूरी ईमानदारी का प्रदर्शन हम विचारधारा के अवलोकन में करते हुए यह भी सुनिश्चित कर लें कि इस मौलिक चिंतन को किसी अन्य समकालीन अथवा पूर्वकालीन विद्वान के मौलिक चिंतन ने कितना प्रभावित किया है? इसे आप जितना अधिक पा सकें, खोज सकें अथवा देख सकें उतने अंश को माक्र्सवाद में से निकालकर उसी विद्वान के खाते में डाल दें, जिसकी विचारधारा से चोरी करके उसने उस चिंतन पर अपनी मुहर लगाने का प्रयास किया था या ऐसा हमने समझ लिया था। 
तब जो माक्र्स के पास शेष बचे, उसे उसका मौलिक चिंतन स्वीकार करके उसके नाम का ‘वाद’ घोषित किया जाए। इस प्रकार यह बचा हुआ शेष मौलिक चिंतन ही ‘वाद’ है, अर्थात माक्र्स की विचारधारा है। गांधीजी पर भी इसी उदाहरण का अनुसरण करते हुए आप दृष्टिपात करें। गांधीवाद की व्याख्या करने से पूर्व आपको गांधीजी के मौलिक चिंतन पर विचार करना होगा। केवल उनका मौलिक चिंतन ही उनका होगा, शेष चिंतन जितना इस व्याख्या की छलनी में से छनकर नीचे गिर जाए, उसे जो लोग बलात् उनका बताकर उस पर थोप रहे हैं। उनसे अलग करना होगा। जब आप विचार करें कि क्या-
-गांधीजी गीता प्रेमी थे?
-गांधीजी गंगा प्रेमी थे?
-गांधीजी ‘राम-राज्य’ को भारत में स्थापित करना चाहते थे?
-गांधीजी भारतीय राजनीति में आदर्शों के ध्वजवाहक थे?
-गांधीजी अहिंसा के प्रेमी थे?
-गांधीजी ने ‘असहयोग आंदोलन’ और ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ का निराला प्रयोग भारत में किया?
-गांधीजी लोकतंत्र के प्रबल समर्थक थे?
-गांधीजी नैतिक मूल्यों को अपनाने पर बल देते थे?
-गांधीजी मानवता के उपासक थे?
-गांधीजी साम्प्रदायिक सद्भावना के प्रतीक थे?
-गांधीजी मानव को ईश्वर की कृति मानकर मानव को मानव से जोडऩा चाहते थे? इत्यादि।
आज हमें गांधीजी के नाम पर ये सारी बातें बलात् ठोक-ठोक कर बताई जाती हैं कि सारी बातें गांधीजी की विचारधारा से निकली हैं। इसलिए इन्हें ‘गांधीवाद’ कहा जाता है।

यथार्थ से दूर रहा गांधीवाद
अब सर्वप्रथम गांधीजी के गीता प्रेम को ही ले लें। देखिये गांधीजी का गीता प्रेम केवल इसलिए था कि वे एक हिंदू परिवार में जन्मे थे। किंतु गीता का वह संदेश जिसके अनुसार ‘परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्क्रताम’ का जीवंत आदेश हमें मिलता है, उससे गांधीजी बहुत दूर थे। हिंदुओं की सज्जनता और सहिष्णुता की उसके शत्रु भी मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करते हैं। किंतु गांधीजी ने इन सज्जनों की सहिष्णुता का अनुचित लाभ उठाने का आजीवन प्रयास किया। उन्होंने अपनी सहिष्णुता को लगभग कायरता की सीमा तक झुकाया। उसमें वीरता की हुंकार उत्पन्न ही नहीं होने दी। जैसा कि उन्होंने अपनी पुस्तक ‘धर्मपालन’ भाग-1 के पृष्ठ 77 पर लिखा है-
‘हिन्दुओं से मैं कहूंगा कि मुसलमान मारते हैं तो मर मिटो। यदि कोई मेरे कलेजे में खंजर भोंक दें और मारते-मारते मैं यह मनाऊं कि मेरा लडक़ा उसका बदला ले तो मैं निरा पापी हूं।’ जिस गीता को हाथ में लेकर गांधी जी आजीवन चलते रहे उसके मर्म को वह नही समझ सके। इसलिए धर्म के मर्म को समझने में उनके चर्मचक्षु चूक कर गये।
सज्जनों के कल्याण और दुष्टों के विनाश की घोषणा साथ-साथ करके पवित्र गीता ने ‘शठे शाठ्यम् समाचरेत’ अर्थात जैसे को तैसा वाली भावना को ही बलवती किया था। जिसे गांधीजी ठुकरा रहे थे। यह था गांधीजी का गीता प्रेम। जिसके उपदेश के सर्वथा विपरीत आचरण वह कर रहे थे।
कांग्रेस ने गीता के उपदेशों के विपरीत चलकर जिस गांधीवाद का प्रचलन इस देश में किया और जिस पर हमारा राजनीतिक नेतृत्व आंख मूंदकर चला जा रहा है, वह छद्म धर्मनिरपेक्षता का मार्ग इसीलिए है। गीता और गांधी का कोई मेल नहीं। इसलिए गीता और गांधीवाद (यदि कोई है तो) सर्वथा विपरीत दिशा में बहने वाली दो नदियां हैं। अब आईये, गांधीजी के गौ प्रेम पर। उपरोक्त धर्मपालन पुस्तक भाग-2 के पृष्ठ 135 पर उन्होंने लिखा है-‘गोहत्या बंद कराने का अर्थ गैर हिंदुओं के साथ अन्याय और जबरदस्ती करना होगा’ इसी प्रकार ‘प्रताप’ और लाहौर 29 दिसंबर सन 1924 ई. में उन्होंने लिखा था-‘मैं कट्टर सनातनधर्मी हूं, परंतु एक मुसलमान को अधिकार दूंगा कि यदि उसका विश्वास है तो वह नि:संदेह गाय का मांस खाये।’
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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