गांधीजी के नैतिक मूल्यों ने इन समस्याओं को और उलझा दिया। आज परिणाम हम देख रहे हैं कि मानव-मानव से जुड़ा नहीं है, अपितु पृथक हुआ है। आज मानव दानव बन गया है। संप्रदाय आदि के झगड़े राष्ट्र में शैतान की आंत की भांति बढ़े हैं। क्योंकि हमने मजहब संप्रदाय, वर्ग, पंथ, भाषा, जाति आदि की विभिन्नताओं को ज्यों का त्यों बनाये रखकर ‘विभिन्नता में एकता की परिकल्पना’ गांधीजी के नैतिक मूल्यों के आईने में की। गांधीवादियों ने हमें बताया कि हमें सारी विभिन्नताओं का सम्मान करना है, उन्हें बनाये रखना है, उनकी पहचान को मिटने नही देना है। इस पर किसी टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है। राष्ट्र के निर्माण के लिए विश्व के किसी भी दार्शनिक, राजनीतिज्ञ या राजनीतिशास्त्री ने विभिन्नताओं को बनाये रखने की वकालत नहीं की, अपितु उन्हें मिटाने का निर्णय लिया।
भारत में गांधीवादियों ने इसके विपरीत आचरण किया। गांधीजी ने अपना धार्मिक चोला पहनकर राजनीति की और यही व्यक्ति महात्मा बनकर उसकी आड़ में एक राजनेता भारत को नचाता रहा। किंतु हमें उपदेश दिया गया कि-”धर्म और राजनीति का कोई मेल नहीं है अर्थात गुलगुले खाकर भी गुड़ से परहेज करना”- इन गांधीवादियों से सीखा जा सकता है। समझ नही आता कि यह गांधीजी की कैसी ‘विचित्र नैतिकता’ थी?
दूसरों का अधिकार छीन लिया गया
प्रसिद्घ इतिहासज्ञ डा. पीएन ओक साहब अपनी पुस्तक ‘विश्व इतिहास के विलुप्त अध्याय’ के पृष्ठ 51 पर लिखते हैं-”सन 1950 ई. के आसपास भारत के ढीले-ढाले सनकी शासकों ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास लिखने का व्यंग्यात्मक प्रयत्न किया। अनेक संगठनों को आदेश भेज दिये गये कि वे जिन-जिन क्षेत्रों, प्रदेशों में हों वहां से संपूर्ण जानकारी का संग्रह कर लें। इसका परिणाम यह हुआ कि उन भारतीय देशभक्तों के संबंध में विपुल मात्रा में जानकारी का विशद संग्रह हो गया, जिन्होंने तलवारों और शमशीरों, पिस्तौलों और बंदूकों से विदेशियों के साथ युद्घ लड़ा था। पराक्रम और शौर्य के संघर्ष की इस पृष्ठभूमि में सन 1914 ई. से सन 1945 ई. तक भारत में कुलबुलाने वाले अनशनों और विरोध स्वरूप किये गये प्रदर्शनों वाला गांधी आंदोलन लघु, भीरूतापूर्ण, असंगत और उपहासास्पद प्रतीत होने लगा।
अत: तुरंत आदेश भेज दिये गये कि पहले संग्रह किये गये कागज पत्रों को तुरंत रद्द कर दिया जाए और इस जांच को मात्र निष्प्रभ गांधीवादी आंदोलन तक ही सीमित रखा जाए।”
इस प्रकार गांधीवाद की नैतिकता किसी का अधिकार छीनने के रूप में भारत में मुखरित हुई। फलस्वरूप कितने ही ऐसे वीर और शूरवीर भारत के इतिहास में अपना स्थान बनाने में या प्राप्त करने में असफल रह गये, जिन्होंने हंसते हंसते भारत माता की बलिवेदी पर अपने प्राणों का उत्सर्ग किया था। यह इतिहास के साथ घोर अन्याय था-जिसे सिर्फ गांधीवादी ही कर सकते थे।
यदि इससे पूर्व हम देखें तो ज्ञात होता है कि मुसलमानों और अंग्रेजों ने भी भारतीय इतिहास को अपने ढंग से तोड़ा मरोड़ा और लिखा था। स्वतंत्रता के उपरांत अपनी सरकार से स्वाभाविक अपेक्षा थी कि वह भारत के इतिहास को सच-सच वास्तविक रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करती, किंतु यहां भी वह नही किया गया जिसकी अपेक्षा थी। अपितु इस अपेक्षा के सर्वथा विपरीत आचरण करते हुए इस देश की स्वतंत्र सरकारों ने भी ‘इतिहास की हत्या करने में कोई संकोच नही किया’ किसी का अधिकार छीनना एक घातक अपराध है। जिन लोगों ने भारत में ऐसा किया वे इतिहास के हत्यारे और राष्ट्र के घोर शत्रु हैं।
हमारी सरकारों ने गांधीवाद का चोला पहनकर सूचना पाने वाले को उस व्यक्ति का मौलिक अधिकार माना है। यह कैसी घोर विडंबना है कि सूचना पाने का अधिकार देकर भी उसे सही सूचना (इतिहास की सही जानकारी) से वंचित रखा जा रहा है। इस भयंकर और अक्षम्य षडय़ंत्र पर से पर्दा उठना चाहिए कि वे कौन लोग हैं जो हमारे सूचना पाने के मौलिक और संवैधानिक अधिकार में बाधक हैं? ऐसा नाटक अब बंद होना चाहिए, जिससे पर्दे के पीछे से सत्य, अहिंसा और बंधुत्व के कोरे आदर्शों की भी हत्या की जा रही है। किंतु फिर भी देश पर गांधीवाद के आदर्शों को लपेटा जा रहा हो और उसे बलात् थोपा जा रहा हो।
दोहरे मापदण्ड
गांधीजी की नैतिक मूल्यों में आस्था दोहरे मापदण्डों पर आधारित थी। एक ही समय में एक ही बिंदु पर एक ही स्थान पर, उनके मापदण्ड हिंदू और मुसलमानों के लिए भिन्न-भिन्न थे।  गांधीवाद के गुण को गांधीजी का मौलिक चिंतन कहा जा सकता है। जबकि हमारे देश में किसी भी ऐसे महात्मा का उल्लेख और उदाहरण नहीं मिलता, जिसने अपनी मान्यताओं और मापदण्डों में दोहपरापन उत्पन्न किया हो।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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