समय की आवश्यकता : घाटी में प्रेम मार्ग अपनाए सरकार

पीके खुराना
जिन इलाकों में चरमपंथी गतिविधियां न हों, वहां आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट की जरूरत नहीं है। समय की मांग है कि प्रशासन लोगों से ज्यादा रू-ब-रू हो, उनके सुख-दुख में शामिल हो और अलगाववादियों की गतिविधियों, खासकर सोशल मीडिया की गतिविधियों पर गहरी निगाह रखी जाए। यदि हम ऐसा कर पाए तो कश्मीर के हालात सुधरने की संभावना बनेगी। अब हमें सेना की शक्ति का दंभ छोडक़र प्यार और बातचीत के इस विकल्प पर फोकस करना चाहिए। देखना यह है कि कितनी जल्दी सरकार इस सच को समझ पाती हैज्
कश्मीर घाटी जल रही है। श्रीनगर में मतदान का प्रतिशत निराशाजनक रूप से कम रहा है और अनंतनाग का उपचुनाव स्थगित करना पड़ गया है। कश्मीर घाटी में लंबे समय से सेना और अद्र्धसैनिक बल तैनात हैं। तस्वीर का एक रुख यह है कि आवश्यकता होने पर सेना बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय आगे बढक़र जम्मू-कश्मीर में जनता की सहायता करती रही है, उसके बावजूद हमारे सैनिकों को पत्थर खाने पड़ रहे हैं। लात, घूंसे और पत्थर खाते हुए भी सैनिक संयम बरत रहे हैं और शेष भारत में उन युवाओं के प्रति गुस्सा उफन रहा है, जो भारत में रहते हुए पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाते हैं और सैनिकों को पत्थर मारते हैं। तस्वीर का दूसरा रुख यह है कि सेना और अद्र्धसैनिक बलों के पास लगभग असीमित अधिकार हैं और कई बार ज्यादतियां भी हुई हैं। कश्मीरियों को लगता है कि यह उनकी स्वतंत्रता का हनन है और उन पर अत्याचार हो रहा है। पाकिस्तान सेना, उनकी जासूसी संस्था आईएसआई, पाकिस्तान समर्थक मौलवी और आतंकवादी गुट जम्मू-कश्मीर के युवकों को गुमराह कर रहे हैं। सरकारी प्रयत्न नाकाफी सिद्ध हो रहे हैं और आधे-अधूरे मन से चले बातचीत के दौर भी एक तरह से जख्मों पर नमक छिडक़ते रहे हैं। हाल ही में सेना की ओर से एक कश्मीरी युवक को मानव ढाल की तरह इस्तेमाल करने का वीडियो सामने आने पर घाटी से प्रकाशित होने वाले लगभग हर अखबार ने गुस्सा जाहिर किया है और सरकार के रुख की आलोचना की है। घाटी में नौ अप्रैल को हुए उपचुनावों में आठ कश्मीरियों के मारे जाने के बाद स्थिति और तनावपूर्ण बनी हुई है। अखबार कह रहे हैं कि सेना जरूरत से ज्यादा ताकत का इस्तेमाल करती है। स्मार्टफोन के कारण ऐसी घटनाओं का वीडियो बनाना और उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करना चुटकियों का काम है। इससे वहां की जनता का आक्रोश और भी बढ़ता है।
स्पष्ट है कि घाटी में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर हम नई चुनौतियों से दरपेश हैं। एक अखबार का आरोप है कि संबंधित अधिकारी और सरकार उन सिफारिशों पर अमल नहीं कर रहे, जो राजनीतिज्ञों ने हालात सुधारने के लिए सुझाई थीं, तो एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार कहता है कि जम्मू-कश्मीर की सत्तारूढ़ पीडीपी और बीजेपी गठबंधन वाली सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती, क्योंकि कश्मीरी लोगों में अलगाव और गुस्से का स्तर बढ़ाने में उसकी भी भूमिका है। एक अन्य अंग्रेजी अखबार का कहना है कि घाटी में बदले माहौल के मद्देनजर ऐसा नहीं लगता कि प्रदर्शन कोई अलग-थलग घटना हैं। अलगाव की भावना इस समय सबसे अधिक है। बातचीत के मौके बहुत सिकुड़ चुके हैं और ऐसे वक्त में असंतोष, विरोध प्रदर्शनों की ओर मुड़ गया है। ऐसी स्थिति में हिंसा से नहीं बचा जा सकता। झड़प की एक घटना उपचुनाव के दौरान हुई हिंसा के बाद हुई है। इस घटना में सुरक्षा बलों की फायरिंग में आठ लोगों की मौत हो गई थी। प्रदर्शनकारियों ने बडग़ाम जिले में मतदान केंद्रों पर हमला किया था, जिसके बाद सुरक्षा बलों ने गोलियां चलाई थीं। हिंसा की इन घटनाओं के बाद राज्य सरकार ने अस्थायी रूप से कालेजों और स्कूलों को बंद करने के आदेश दिए, साथ ही इंटरनेट सेवाओं को बंद कर दिया गया। बुरी खबर यह है कि जम्मू-कश्मीर में अब लड़कियां और स्कूलों के बच्चे भी पत्थरबाजी में शामिल हो गए हैं। श्रीनगर से लेकर सोपोर तक सोमवार को जो पत्थरबाजी हुई, उसमें 60 छात्रों के समूह ने जमकर पत्थरबाजी की। जवाब में पुलिस ने छात्रों पर आंसू गैस और मिर्ची ग्रेनेड फेंके। कुपवाड़ा से लेकर सोपोर तक और श्रीनगर से कुलगाम तक स्कूल की यूनिफार्म में छात्र पत्थरबाजी में शामिल थे। अधिकारियों का कहना है कि सोमवार के विरोध प्रदर्शन में शामिल छात्र संगठन कश्मीर यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (कुसू) के बारे में किसी को ज्यादा मालूम नहीं है। श्रीनगर में एसपी कालेज और सरकारी महिला कालेज के छात्र-छात्राओं ने आजादी के नारों के अलावा भारत विरोधी नारे लगाए और उन्होंने श्रीनगर की एक मुख्य सडक़ पर जाम भी लगाया। इसी तरह से सोपोर में भी सैकड़ों छात्र-छात्राएं विरोध प्रदर्शन में सडक़ पर उतर आए। इन्होंने आजादी और भारत विरोधी नारे लगाए। इन प्रदर्शनकारियों ने सीआरपीएफ कैंप पर पत्थर फेंकने शुरू कर दिए तो पुलिस को आंसू गैस छोड़ी। पत्थरबाजी से डरे दुकानदारों को अपनी दुकानें बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा। सवाल यह है कि जब जनता चुनाव में भाग लेने के लिए तैयार न हो और बच्चे पत्थरबाजी और देश विरोधी नारों पर उतर आएं तो यह समझना गलत होगा कि सब कुछ ठीक है। इसका अर्थ यह भी है कि अब तक का सरकार का रवैया और नीतियां ऐसी रही हैं, जिससे जम्म-कश्मीर की समस्या हल होने के बजाय और भी उलझती जा रही है और स्थिति बिगड़ी ही है। भारत का हिस्सा होने के बावजूद जम्मू-कश्मीर का अपना अलग संविधान भी है और धारा-370 के प्रभाव के कारण जम्मू-कश्मीर की विशिष्ट स्थिति है। लेकिन असंतोष के कारण सेना और अद्र्धसैनिक बलों की तैनाती ने वहां के नागरिकों में असंतोष को बढ़ाया है। पाकिस्तान ने इस स्थिति का लाभ उठाकर कश्मीरी युवकों को गुमराह करने में सफलता प्राप्त की और परिणामस्वरूप अविश्वास की खाई चौड़ी होती रही है। समस्या यह है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हिंदू भावनाओं में उभार आया और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद संघ समर्थक भी लगभग जिहादियों सा व्यवहार करने लगे हैं।
ऐसे लोग समस्या की गहराई को समझे बिना सोशल मीडिया पर तरह-तरह से सुझाव दे रहे हैं और माहौल को और खराब कर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर एक राजनीतिक समस्या है, जिसे राजनीतिक तौर पर हल किए जाने की आवश्यकता है, लेकिन नई दिल्ली में जम्म-कश्मीर को सुरक्षा और आर्थिक समस्या मानते हैं। समय-समय पर नई दिल्ली में कश्मीरी लोगों से बातचीत की कोशिश होती है। वार्ताकार नियुक्त किए जाते हैं, समितियां बनती हैं, लेकिन परिणाम शून्य रहता है। इससे कश्मीरियों का शक और मजबूत हो जाता है कि दिल्ली इस समस्या का हल नहीं ढूंढना चाहती। और समस्या पाकिस्तान ही नहीं है, यह स्थानीय विद्रोह है, जिसमें कश्मीरी बच्चे खुद को कुर्बान करने को तैयार हैं। लेकिन अगर आप ध्यान से सुनें, तो कश्मीरी इस संघर्ष की समाप्ति चाहते हैं। वे इस समस्या का हल चाहते हैं। एक निर्भीक और साहसी राजनीतिक प्रतिष्ठान को समस्या के हल के लिए पहल करने की जरूरत है, हर किसी से बातचीत करने की जरूरत है। जिन इलाकों में चरमपंथी गतिविधियां न हों, वहां आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट की जरूरत नहीं है। 
समय की मांग है कि प्रशासन लोगों से ज्यादा रू-ब-रू हो, उनके सुख-दुख में शामिल हो, अलगाववादियों की गतिविधियों, खासकर सोशल मीडिया की गतिविधियों पर गहरी निगाह रखी जाए और कश्मीरी युवकों को अलगाववादी नेताओं के बच्चों और रिश्तेदारों की ऐश का सच समझाया जाए। अलगाववादियों के किसी रिश्तेदार की जान नहीं जाती, वे कश्मीर में ही नहीं रहते। यह रास्ता लंबा, कठिन और चुनौतीपूर्ण है, लेकिन रास्ता भी यही है। यदि हम ऐसा कर पाए तो कश्मीर के हालात सुधरने की संभावना बनेगी। अब हमें सेना की शक्ति का दंभ छोडक़र प्यार और बातचीत के इस विकल्प पर फोकस करना चाहिए। देखना यह है कि कितनी जल्दी सरकार इस सच को समझ पाती है।

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