चीन भारत और दलाईलामा
चीन हमारा प्राचीन पड़ोसी देश है। इसे धर्म की दृष्टि देने वाला भारत है। इन दोनों देशों का बहुत कुछ सांझा है। यदि अतीत के पन्ने पलटे जाएं और उस पर ईमानदारी से कार्य हो तो पता चलेगा कि चीन भी कभी आर्यावत्र्त के अंतर्गत ही आता था। आज चीन ने अपने आर्यावत्र्तकालीन अतीत से अपने आप को सर्वथा अलग कर लिया है। उसे आर्यावत्र्त  के साथ संबंध जोडऩे तक से लज्जा आती है, इधर भारत में 1947 के पश्चात के नेतृत्व ने भी अपने आपको भारत के आर्यावत्र्तकालीन अतीत से काटकर देखने में ही अपना भला समझा। उसने भी चीन सहित आर्यावत्र्त  के किसी भी देश को यह बताने या समझाने का प्रयास नहीं किया कि हम तुम एक सांझे इतिहास की सांझी विरासत के उत्तराधिकारी हैं। वर्तमान को भूगोल से संचालित नहीं किया जा सकता। इसके विपरीत वर्तमान जब भटक जाए तो उसे इतिहास के तथ्यों से ही सही रास्ते पर लाया जा सकता है। कूटनीति की रणनीति को सफल करने के लिए दो पड़ोसी देशों को इस तथ्य को ही समादर देना होता है। पर भारत और चीन दोनों ने मूर्खता की और वे अपनी सीमा का निर्धारण भूगोल के आधार पर करने लगे। यदि ये दोनों अपनी सीमा के निर्धारण के लिए इतिहास के न्यायालय में थोड़ी देर के लिए भी ईमानदारी से खड़े हो जाते तो इन्हें उत्तर मिलने में 70 वर्ष नहीं, अपितु सात घंटे ही लगते, तब जिस काम के लिए इन दोनों देशों ने 70 वर्ष में अपार ऊर्जा का व्यय कर दिया है-उससे बचा जा सकता था। जब इतिहास की उपेक्षा करोगे तो वर्तमान भटकेगा भी और दिशाविहीन होकर वह विनाश भी करेगा, जैसा कि चीन और भारत के संबंधों में हम वर्तमान में देख भी रहे हैं। 
भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने तिब्बत को हड़पते हुए चीन को रोकने का उचित प्रयास नहीं किया। यदि इस घटना के घटित होते समय ही पंडित नेहरू के नेतृत्व में भारत उठ खड़ा होता तो संपूर्ण विश्व उस समय भारत के साथ होता। उस समय प्रथम विश्वयुद्घ को समाप्त हुए मात्र चार वर्ष का ही समय हुआ था। विश्व के लोग युद्घों की विनाशलीला से पहले से ही भय खा रहे थे, तब वह नहीं चाहते थे कि द्वितीय विश्वयुद्घ के समाप्त होते ही चीन जैसा कोई देश तीसरे विश्वयुद्घ की पृष्ठभूमि तैयार करने लगे। तब विश्व के देश साम्राज्यवाद को ‘पाप’ समझ रहे थे और इस दिशा में बढ़ते चीन को रोकने के लिए तब सारा विश्व एक हो सकता था, परंतु भारत चूक गया। यदि भारत उस समय यूएनओ में चीन का सक्षम विरोध करता तो संपूर्ण विश्व भारत के साथ होता। ऐसी स्थिति में विश्वस्तर पर भारत एक सुदृढ़ देश के रूप में उभरता और चीन को यूएनओ में अपना स्थान प्राप्त करने तक के भी लाले पड़ जाते। वैसे भी उस समय आज के चीन को नहीं, अपितु ताईवान को यूनएनओ की सदस्यता दी गयी थी। चीन ने जब तिब्बत को हड़पा तो विश्व ने भारत की ओर बड़ी आशाभरी दृष्टि से देखा था, परंतु नेहरू का भारत उचित समय पर बोलने के स्थान पर मौन रह गया। उस मौन का परिणाम यह गया कि चीन को यूएनओ में सुरक्षा परिषद तक की सदस्यता मिल गयी।
चीन द्वारा तिब्बत को हड़पने की इस घटना ने इतिहास का पीछा आज तक नही छोड़ा है। हमें नहीं लगता कि तिब्बत को चीन द्वारा हड़पने की यह घटना भविष्य में भी इतिहास का पीछा छोड़ देगी। इसने 1949 में इतिहास को पथभ्रष्ट किया था और भविष्य में यह धर्मभ्रष्ट इतिहास का निर्माण कर तीसरे विश्वयुद्घ में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर अपना विकृत चेहरा दिखा सकती है। 
तिब्बत प्रकरण में हमारी कूटनीतिक भूल यह भी हुई है कि हमने दलाईलाला को 1949 से ही भारत में शरण दी हुई है। इससे चीन भारत को सदा ही सशंकित दृष्टि से देखता है, और उसके हृदय में यह बात शूल की भांति चुभती रहती है कि भारत के उसके विरोध के उपरांत भी दलाईलामा को अपने यहां रखे हुए है। अपनी इस मानसिकता के चलते ही चीन पाकिस्तान को भारत के विरूद्घ उकसाता है और भारत को धमकाने का भी दुस्साहस करता। 
भारत की विदेशनीति का उपहासास्पद पक्ष देखने योग्य है, यथा-एक ओर तो भारत तिब्बत को चीन का भीतरी मामला कहता है, और उसके चीन में विलय को भी अपनी मान्यता देता है, और दूसरी ओर दलाईलामा की सरकार को भी अपना समर्थन देता है। दलाईलामा को अपने यहां पूर्ण सुविधाएं देने वाला भी भारत ही है। अब यदि तिब्बत चीन का भीतरी विषय है तो दलाईलामा भी तो चीन के भीतरी विषय की परिधि में ही आते हैं, तब उन्हें भारत में रखने का औचित्य क्या है? दूसरे जब भारत चीन में तिब्बत विलय को अंतिम मानता है तो ऐसी परिस्थिति में तिब्बत की किसी निर्वासित सरकार को मान्यता देना भी अतार्किक है।
सरदार पटेल प्रधानमंत्री नेहरू से कई गुणा व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते थे। वह चीन के प्रति कभी भी आश्वस्त होकर बैठने वाले नहीं थे। वह साम्राज्यवादी चीन से भारत को सुरक्षित रखने के पक्षधर थे। वह चाहते थे कि वे चीन से माथे पर सलवटें डालकर बातें की जाती रहें, उससे कभी भी हँसकर बातें नहीं करनी हैं, और गलबहियां तो कतई नहीं करनी हैं। पर नेहरू जी ने चीन से दूसरी नीति अपनाई। उन्होंने उसे बड़ा भाई माना और उसके प्रति अपने चेहरे की गंभीरता को समाप्त कर उससे हँस-हँसकर बातें करते-करते 1954 में संपन्न हुए पंचशील समझौते के समय तो गलबहियां तक कर बैठे। चीन ने अपने समक्ष आत्मसमर्पण कर चुके इसी नेहरू के भारत की 1962 में पिटाई कर दी। तब नेहरू जी को लगा कि धोखा हो गया। यदि उस समय सरदार पटेल होते तो अवश्य कहते कि-”नेहरूजी! धोखा हुआ नहीं है, अपितु धोखे की मेज पर धोखा खाने के लिए हम स्वयं ही जा बैठे।” 
सचमुच चीन के प्रति भारत की विदेशनीति की पूर्ण समीक्षा का समय अब आ गया है। पाकिस्तान के साथ बैठे चीन को भारत ने ही एक विश्वशक्ति बना दिया है, और आज ‘ड्रैगन’ के नाम से कुख्यात चीन भारत के विनाश की हर योजना को अपनाने को तैयार लगता है, उसे दलाईलामा भारत में रहे-यह स्वीकार नहीं। ऐसे में भारत को स्पष्ट करना होगा कि वह दलाईलामा को किन शर्तों पर भारत में रख सकता है, और यदि रख सकता है तो उसके गंभीर परिणामों को वह किस सीमा तक सहन कर सकता है?

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