स्वामी नारायण संप्रदाय का सच* भाग 2

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डॉ डी के गर्ग
भाग -2

विश्लेषण: घनश्याम पांडे यानि नीलकंठ स्वामीनारायण को एक शरीरधारी महापुरुष कह सकते है जिन्होंने अपनी चातुर्य से एक नए संप्रदाय को सुरु किया और इस तरह से हिन्दू धर्म में एक और विभाजन सुरु हुआ, यधपि ये कहते है की ये भी हिन्दू धर्म का हिस्सा है परंतु इस विषय में न्यायालय का निर्णय आ चुका है की ये संप्रदाय हिंदू नही है।
इस संप्रदाय की नयी मान्यताये और नयी पूजा पढ़ती ,ग्रन्थ आदि के कारण भी इनको हिन्दू कहना ठीक नहीं।

आश्चर्जनक किंतु सत्य

  1. परिवारवाद और सन्यास की परंपरा का मजाक
    इस सम्प्रदाय के संस्थापक का परिवार जो की आधुनिक वेशभूषा में एक संभ्रांत परिवार की तरह देश विदेश में रहता है ,ये दूसरो को संन्यास की दीक्षा देते है लेकिन उनके परिवार से कोई सन्यासी नहीं बनता वे आधुनिक दुनिया की चमक में आनंदित रहते है। और सन्यासी जमीं पर बैठते है ,भक्त गण ऊपर आसान पर बैठते है।
    परिवार का कोई सदस्य सन्यासी नहीं बनता और छोटे बच्चो को संन्यास की दीक्षा दे देते है जो की आजीवन निशुल्क इनकी सेवा करते रहते है।

2.जाति पाती, छुआ छूत
स्वामीनारायण मंदिर में दलितों के प्रवेश के लिए कांग्रेस ने गुजरात में सत्याग्रह शुरू किया था. मंदिरों में पहले दलितों को प्रवेश नहीं था. शाह कहते हैं कि स्वामीनारायण में मंदिर में भी साधुओं के बीच जाति को लेकर भेदभाव है. उन्होंने कहा कि भगवा ऊंची जाति वाले पहनते हैं और सफेद नीची जाति वाले होते है .
3. घनश्याम पांडे जी भगवान विष्णु के अवतार

ये धनश्याम पांडे को विष्णु और अन्य हिंदू देवताओं का अवतार मानते है।
कितना बड़ा झूट है की स्वामीनारायण की मूर्ति में कृष्ण, राम, विष्णु आदि के सभी अवतार विलीन हो जाते हैं ?लेकिन भवन में लगी हुई स्वामीनारायण की मूर्ति किसी भी कृष्ण, राम, विष्णु आदि मूर्ति में विलीन नहीं होते हैं।

इनका कहना है कि ये विष्णु के अवतार है और 20000 देवी देवता का वास है, राम कृष्ण इनमे विलीन हो जाते हैं और बाबा शिष्यों को जन्म मरण से मुक्ति दिलवा ही देंगे बाबा के नाम का जाप करना आदि से सिद्ध होता है की ये झूठ पर चलने वाला संप्रदाय है।

4.बीमार और अल्पायु व्यक्ति कैसे दूसरे को शतायु बनाएगा?

जब घनश्याम पांडे जी स्वयं शतायु नहीं रह पाए और बीमारी के कारण इनकी मृत्यु हुई तो ये जीते जी और अब मृत्यु के बाद दुसरे को कैसे स्वर्ग ले जा सकते है ,ये भी झूट है ।

5.राजनीती में रुतबा

राजनीती में प्रवेश करके इन लोगो ने अपना रुतबा कायम किया है और अकूत धन संपत्ति जो एकत्र की है उस पर इनके परिवार का एक छत्र अधिकार होता है .

इनके अनुयाई कितने धन संपन्न और ताकतवर है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत और दुबई के राजनैतिक लोगों से मोनोपोली करके सबसे बड़ा हिंदू मंदिर के नाम पर जमीन भी प्राप्त कर ली. यूएई में इसी स्वामीनारायण संप्रदाय को बड़ी जमीन मिली है और इनके संप्रदाय का मंदिर बन रहा है जिसे हिंदू मंदिर प्रचारित किया जा रहा है.
6 गुरु भगवान की शैक्षिक योग्यता – घनश्याम पांडे की शैक्षिक योग्यता का कोई प्रमाण नहीं मिलता है ।
इन्होंने वेद उपनिषद दर्शन आदि धर्म ग्रंथ पढ़ना तो दूर देखे सुने भी नहीं है.
• स्वामीनारायण संप्रदाय के मंदिरों में आम तौर पर सिर्फ घनश्याम पांडे के मूर्ति लगी होती है और उनकी ही पूजा होती है लेकिन देखने पर ऐसा लगेगा जैसे श्री कृष्ण की मूर्ति है….

• स्वामीनारायण वाले सभी त्योहार परंपराओं का सम्मान करते हैं लेकिन सर्वोच्च घनश्याम पांडे को ही मानते हैं.जब गीता सर्वोच्च है तो अन्य ग्रंथ छूट ही जाएंगे. इसी तरह भविष्य में स्वामीनारायण संप्रदाय का इसी तरह प्रचार चलता रहा तो हिंदू धर्म का मतलब या जिक्र होने पर इनके मंदिर और परंपराओं की छवि ही दिमाग पर जीवित होगी.

विवादों से नाता:
स्वामी जी की अकूत संपत्ति का स्वामी इनका ही परिवार है जिनमे आपस में संपत्ति को लेकर विवाद कोर्ट तक भी गया।
सेंटर फोर सोशल नॉलेज एंड एक्शन अहमदाबाद के अच्युत याग्निक बताते हैं कि 19वीं सदी में ही स्वामीनारायण ने अपने दो भतीजों को यूपी से बुलाया. एक को कालूपुर मंदिर की गद्दी दी और दूसरे भतीजे को वडताल मंदिर की.
लेकिन उनका दोनों भतीजों को गद्दी देना लोगों को रास नहीं आया. इसे लेकर विरोध शुरू हुआ. विरोध के बाद स्वामीनारयण संप्रदाय दो खेमों में बंट गया. घनश्याम पांडे के खेमे ने वंश परंपरा को स्वीकार किया और दूसरे खेमे ने साधु परंपरा को अपनाया.
20वीं शताब्दी में साधु परंपरा के शास्त्री महाराज ने नई गद्दी चलाई. इस गद्दी को नाम दिया गया बोचासनवासी अक्षय पुरुषोत्तम संप्रदाय. यह संप्रदाय आधुनिक समय में बाप्स नाम से लोकप्रिय है. बाप्स परंपरा के लोगों को ही साधु परंपरा वाला कहा जाता है.
याग्निक कहते हैं वल्लभाचार्य और विट्ठलाचार्य के महिलाओं को लेकर स्कैंडल के कारण स्वामीनारयण को और बल मिला. इसी स्कैंडल को ध्यान रखते हुए यह नियम बनाया गया कि स्वामीनारायण संप्रदाय के साधु महिलाओं को देख भी नहीं सकते.

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