अकर्मण्यता हमारा लक्ष्य न हो
प्रकृति अपना कार्य कर रही है, इतिहास अपना कार्य कर रहा है। कालचक्र अपनी गति से घूम रहा है। तीनों बातें भारत के पक्ष में हैं। किंतु इसका अभिप्राय यह कदापि नहीं है कि हम हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाएं या अकर्मण्यता को गले लगाकर अपने दुर्भाग्य की पटकथा स्वयं ही लिख डालें।
ज्यों-ज्यों समय और परिस्थितियां हमारे अनुकूल होती जाएंगी त्यों-त्यों हमको और भी अधिक कर्मशील बनना होगा। मानवीय बनना होगा और अपनी उदारता का परिचय देना होगा।
हम अत्याचारी नहीं बनेंगे, अपितु धर्मरक्षक बनेंगे। अनाचारी नहीं बनेंगे, हमें दानवता का नहीं अपितु मानवता का संदेश फैलाना है। हमें पुन: एक समृद्घ और विश्वगुरू ‘भव्य भारत’ बनाना है, और उसी के लिए अपना जीवन होम करना है। भारत भव्य बने और विश्वगुरू बने यह हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए, आदर्श होना चाहिए।

नये समय की नई चुनौतियां
मानव के लिए किसी भी युग में चुनौतियां समाप्त नहीं होती हैं, केवल उनका रूपांतरण ही हुआ करता है। कई बार एक चुनौती समाप्त सी हुई जान पड़ती है तो दूसरी चुनौती पहली वाली से भी भयंकर रूप में उठ खड़ी होती है। शोषक और शोषितों के समाज में मुखौटे ही परिवर्तित होते हैं। पात्र ही बदलते हैं परंतु भूमिकाएं वही रहती हैं।
उदाहरण के लिए कभी दास खरीदने और विक्रय करने की परंपरा विश्व में रही थी। आज बंधुआ मजदूर उन्हीं का एक स्वरूप है। ऐसे-ऐसे उदाहरण हैं कि मात्र पांच हजार रूपये देकर किसी व्यक्ति को लोग जीवन भर के लिए अपना मजदूर बना लेते हैं। ऐसी स्थिति आज के सभ्य समाज के लिए सचमुच लज्जास्पद है।
इसी प्रकार सती प्रथा कभी हुआ करती थी। जब यह प्रचलन था तो उस समय पति के साथ पतिव्रता स्त्रियां स्वयं सती हुआ करती थीं। फिर एक समय आया जब स्त्रियों को बलात् सती होने के लिए बाध्य किया जाने लगा। वह बलात् सती कराने की प्रथा निंदनीय थी।
सती प्रथा की समाप्ति
परिणामस्वरूप समाज के जागरूक लोगों ने आवाज उठाई। इस आवाज की विशेष प्रतिनिधि आवाज बनी बंगाल के ‘राजा राममोहन राय’ की आवाज। समय ने करवट ली और यह कलुषित परंपरा बहुत सीमा तक समाप्त हो गयी। किंतु यह समाप्त भी नहीं हुई, थी कि समाज में दहेज का भयानक दानव हमारे बीच आ खड़ा हुआ और सतियों के लिए इसी बीच चिता सजाने लगा। पहले पति के मरने के पश्चात सती होने की बाध्यता थी तो दहेज के दानव के जन्म लेते ही पति की उपस्थिति में ही उसी के हाथों सती को चिता पर भेजा जाने लगा।
दुष्टतापूर्ण भूमिकाएं वही रहीं केवल पात्र परिवर्तित हुए। अत्याचार का ढंग यदि परिवर्तित हो जाएं तो भी अत्याचार तो अत्याचार ही कहा जाएगा। इसलिए हमारा मानना है कि हमें जागरूक बने रहना है। अत्याचार रूपांतरित यदि होगा तो हमें उसके परिवर्तित स्वरूप को पकडऩा होगा, पहचानना होगा और उसे मिटाना होगा।
जैसे राजनीतिक क्षेत्र में आज मर्यादाहीनता का बोलबाला है-ऐसे समय भारतवर्ष में कितने ही अवसर आये हैं जब शासक अमर्यादित हुआ है। शासक ही शोषक बन गया है, हमें इसकी रीति नीति को सुधारना होगा-एक चुनौती मानकर। इस देश में शोषण के नये स्वरूपों को समझना होगा। यथा-
  1. अधिकारी अपने सेवानिवृति के पश्चात अपने स्थान पर अपने ही किसी पारिवारिक व्यक्ति को ‘सैट’ कर रहे हैं। प्रतिभाओं को उपेक्षित किया जा रहा है। शोषण का यह भी एक स्वरूप है।
  2. आरक्षण के नाम पर प्रतिभाओं की उपेक्षा हो रही है। अयोग्य व्यक्ति को लाभ मिल रहा है। आरक्षण के नाम पर शोषण का यह ढंग हमने शोषण मिटाने के नाम पर ही खड़ा किया है। इसकी भयानकता को समझा जाए और इसके विरूद्घ आवाज उठायी जाए।
  3. नारी समानता के नाम पर उच्छ्रंखलता हो रही है। हन्में नारी के रूप में सीता चाहिए और पुरूष के रूप में राम। आज हमारे सामने यह एक बहुत बड़ी चुनौती है, इसके लिए हमें आज समाज में व्यभिचार, यौनाचार और भौतिकवाद की चलती हुई इस आंधी का मुंह मोडऩा है।
  4. जेहादी आतंकी हो गये है। यह समय की चुनौती है।
  5. शिक्षा को भारतीयता के सर्वथा विरूद्घ जाकर प्रदान किया जा रहा है। हमारा गौरवपूर्ण अतीत हमें ही सर्वथा नीरस और फीका बनाकर पढ़ाया जा रहा है। इस स्थिति पर हमें विचार करना होगा, इत्यादि।

(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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