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इस्कॉन का सच

Dr DK Garg

भाग दो

International Society of Krishna Conciousness यानि इस्कॉन का नाम कारण और पंजीकरण

स्वामी जी विदेश में रहते थे जिनका सन्यास के बाद प्रभुपाद नाम हुआ ,उनकी योगिराज महापुरुष कृष्ण के जीवन चरित्र में अगाध श्रद्धा थी। अंग्रेजो के मध्य कृष्ण चरित्र पर प्रवचन देते थे और धीरे धीरे बहुत प्रसिद्ध हो गए । जैसे हमारे देश में भी है की बहुत से प्रवचन देने वाले धर्म गुरु धीरे धीरे स्वयं की कहानी सुरु कर देते है और उनके अनुयाई उनको ईश्वर के दूत के रूप में प्रचारित करने लगते हैं, गुरु भी इस लालच के चक्रव्हू में आ जाते है और मूल उद्देश्य कही खो जाता है और उसका स्थान पाखंड और धन कुबेर की महात्वकांछा ले लेती हैं।
ऐसा ही यहाँ हुआ ,भक्तो की भारी भीड़ होने लगी तो उनके कुछ चेलों ने इस मौके को फ़ौरन भुनाया जबकि स्वामीजी तो सीधे सादे वानप्रस्थी थे, उन्हें कहाँ समझ थी ये सब करने की? उन्हें तो केवल समाज के उत्थान के लिए प्रवचन से मतलब होता था, और भीड़ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी |
लेकिन जो चढ़ावा और दान के रूप में करोडो रुपये एकत्र हो रहे थे, उन्हें संभालने के लिए एक संस्था का निर्माण किया गया और नाम रखा गया :
International Society of Krishna Conciousness –
जिसको हिंदी में इस्कॉन और अंग्रेजी में भी Iscon का नाम दिया गया।

ये एक अमरीका में रचित, स्थापित, स्थित, पंजीकृत कंपनी है जिसके स्वामी अमरीकन हैं, स्वामी भक्तिवेदांत जी नहीं |

पंजीकरण के बाद इस्कॉन ने कुछ नियम बनाए ताकि एक विशेष पंथ का रूप दिया जा सके ।इसके लिए धर्म के चार स्तंभ बनाए जीना वर्णन भाग एक में किया है : तप, शौच, दया,और सत्य

इसके अतिरिक्त इस्कॉन संस्था के अनुयाई ब्रह्मचारी और सन्यासी काल मे कुछ अनिर्वाय नियम बनाए जिनका पालन करना अनिवार्य किया गया:

1.आपको कर्मी और फैशन के सारे कपड़ो का त्याग करना होगा।
2.आप एंड्रॉयड मोबाईल गुरु के अनुमतिबिना नही सहजा सकते है।
3.आपको आपके सारे बैंक अकाउंट और किसीभी पैसों से संबंधित खाते बंद कराने होंगे। सभी प्रकार के सम्पति से सम्बंधित रिश्ते, व्यवहार और क्रियाए आपको त्याग करनी होंगी।
4.आप अब आपके मनमानी नुसार नही जी सकते। आपको सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
5.आप किसी भी स्त्री के साथ बिना काम के नही बोल सकते है। बोलते समय अंतर और मर्यादा आवश्यक है।
6.आपके लिए अब से सभी स्त्रियां आपकी माताएं और सभी पुरुष आपके प्रभु है । आपको इसी भाव से सेवा करनी होगी।
7.सन्यासी काल मे आपको भगवान का जाप, भजन कीर्तन, शास्त्रो का पठन, और अन्य सेवा करना अनिर्वाय होगा।
8.आप दैनंदिन विधि के अलावा एकांत में नही रह सकते। हर समय आपके साथ दो या ब्रह्मचारी होना अनिवार्य है।
9.आप अपने माता पिताओं से मिल सकते है बोल सकते है मात्र अब घर पर जाकर नही रह सकते ।
10. बीमारी और अन्तिम समय के अलावा आप को मातापिता से दूर रहना अनिवार्य है।
लेकीन जबतक आप ब्रह्मचारी हो, तबतक आप अपने माता पिता के घर आ-जा सकते है।

नाम परिवर्तन द्वारा गुरु द्वारा दूसरा नाम देना

भाग 3

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