उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार ने प्रदेश में विवाह पंजीकरण को अनिवार्य घोषित कर सामाजिक सुधारों की दिशा में एक क्रांतिकारी निर्णय लिया है। इस निर्णय से महिला अधिकारों की रक्षा होगी, साथ ही इसका सीधा लाभ उन मुस्लिम महिलाओं को अधिक मिलेगा जिनके पति उनकी बिना स्वीकृति और सहमति के किसी अन्य महिला को पत्नी के रूप में घर में रख रहे हैं। इस निर्णय को लेकर योगी आदित्यनाथ ने यह अनुभूति करायी है कि वह स्वच्छ शासन देने के प्रति संकल्पबद्घ हैं।
भारतीय समाज में फिल्मी जगत ने और टी.वी. संस्कृति ने कई बुराइयों को जन्म दिया है। इन बुराइयों में से एक बड़ी बुराई है-पति-पत्नी के संबंधों को तनावपूर्ण करने की और दूसरी बुराई है-हमारे युवा वर्ग को विलासी और कामी बनाने की। इसके कारण विवाहेत्तर संबंधों का क्रम भारत में पिछले 30-35 वर्षों में तेजी से चला है। युवा पीढ़ी नशेड़ी होती जा रही है और वह यौवन की दहलीज पर पांव रखते-रखते ही जीवनीशक्ति का नाश करने लगती है। ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ की भयंकर बीमारी इसी मानसिकता के चलते फैली है। हम कैंसर या एड्स की बीमारी को घातक मानकर उनका उपचार करने के लिए तो चिकित्सा विज्ञानियों से कोई औषधि तैयार करने की अपेक्षा करते हैं-पर समाज में युवा पीढ़ी केे जीवनीशक्ति के विनाश की गतिविधियों में लिप्त होने या ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ जैसी प्राणलेवा घातक बीमारियों का उपचार करने के लिए समाजविज्ञानियों और धर्मशास्त्रियों से कोई औषधि तैयार करने की अपेक्षा नहीं करते। यदि कोई समाजशास्त्री या धर्मशास्त्री ऐसा प्रयास करता भी है तो हम उसकी जाति या उसका मजहब देखते हैं। किसी कारण से यदि वह समाजशास्त्री या धर्मशास्त्री हिंदू है और हिंदू होकर जीवनीशक्ति के विनाश को अपराध कहता है और ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ को अवैध, अनैतिक और पति-पत्नी का एक दूसरे के प्रति किया गया द्रोहपूर्ण अपराध कहता है तो उसे रूढि़वादी और साम्प्रदायिक कहकर उसकी न्यायपूर्ण बातों को अमान्य घोषित कर दिया जाता है। साथ ही इस प्रकार की मान्यताओं को या सामाजिक उपचार को युवा पीढ़ी के स्वयं निर्णय लेने की स्वतंत्रता में बाधक मानकर इसे मुस्लिम और ईसाई समाज की मान्यताओं पर ‘भगवा का आक्रमण’ भी कह दिया जाता है। जिससे समाज सुधार करने की प्रक्रिया बाधित होती है। सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में काम कर रहे लोगों को यह समस्या आती है कि वह अपनी बात को कहां से और कैसे प्रारंभ करें? ऐसी परिस्थितियों में सारी व्यवस्था गुड़-गोबर होकर रह गयी है।
हमारे समाज में नारी का सम्मान करने की बातें बड़े जोर-शोर से की जाती हैं। यह कितनी मूर्खतापूर्ण बात है कि एक ओर तो नारी के सम्मान की बात की जाए और दूसरी ओर ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ के माध्यम से उसे रखैल बनाकर रखने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन दिया जाए। माना कि इस प्रकार स्वयं को ‘रखैल’ बनाकर रखने के लिए एक नारी भी अपनी सहमति देती है तो क्या उसकी इस सहमति को किसी नारी पर अत्याचार करने के लिए एक पर्याप्त साक्ष्य न मान लिया जाए? जी हां, वही नारी जो अपने पति की विवाहिता है और सच्चरित्र भी है, और जो अपने पति को अपना देवता मानकर उसकी पूजा करती है। पर आज वह अपने पति की उपेक्षा और अत्याचार का शिकार हो रही है। क्योंकि एक दुश्चरित्र महिला ने उस सच्चरित्र महिला का ही जीवन नरकमय बना दिया है, इतना ही नहीं उसने उस सच्चरित्र बहन की माता का, बहन का, पिता का, भाई का, उसके बच्चों का और कभी-कभी उसकी सास, ननद और ससुर का भी जीवन नरकमय बना दिया होता है।
समाज के जिन लोगों ने एकसाथ इतने लोगों की आहें इस संसार के पर्यावरण में विलीन कराई हैं, वे आहें ‘भूकम्प’ लाने के लिए पर्याप्त होनी चाहिए थीं। परंतु ‘भूकम्प’ (समाज सुधार) लाने वालों को रूढि़वादी और साम्प्रदायिक कहकर मौन रहने के लिए बाध्य किया जा रहा है। लगता है ये तथाकथित सभ्य समाज प्रलय की बाट जोह रहा है। जब उपचार अपचार लगने लगे और उपकार अपकार लगने लगे तब समझना चाहिए कि अंत निकट है।
ऐसे में योगी सरकार के उक्त निर्णय को समाज के गम्भीर और जिम्मेदार लोगों को एक मील के पत्थर के रूप में देखना चाहिए। इस निर्णय को कानून के माध्यम से लागू कराने में भी योगी सरकार को अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देना होगा। अधिकतर ऐसा होता रहा है कि कानून बनाने या निर्णय लेने में तो सरकारें शीघ्रता करती हैं, पर उन्हें लागू करने में शिथिलता का प्रदर्शन कर देती हैं। जिससे एक अच्छी पहल भी ‘फुस्स’ होकर रह जाती है। जिन बहनों को दृष्टिगत रखकर यह नियम लागू कराया गया है-उन्हें इसका लाभ भी मिलना चाहिए। यदि कानून किसी बहन का आंसू नहीं पोंछ पाया तो इसके बनने का भी कोई लाभ नहीं होगा। कानून की कोई जाति नहीं होती ना ही उसका कोई मजहब होता है। उसकी दृष्टि में समता होती है, इसलिए वह आंसू पोंछते समय यह नहीं देखता कि ये आंसू किसी मुस्लिम बहन के हैं या किसी हिंदू बहन के हैं। वैसे ही वह दण्ड देते समय भी यह ना देखे कि अत्याचारी पति मुस्लिम है या हिन्दू है। वास्तविक पंथनिरपेक्षता यही है। निश्चित रूप से भारत हम सबका है और यदि ऐसा है तो इसका कानून भी हम सबका है। उस कानून से हर वह दुष्ट पापाचारी, अधमी और अत्याचारी दंडित किया जाना चाहिए जो समाज में किसी भी प्रकार से अनाचार को बढ़ावा देता हो। महिला पर महिला ही यदि अत्याचार करती है और अपनी ‘वासना’ के कारण किसी के जीवन को नष्ट करती है तो ऐसी महिला को तो और भी कड़ा दण्ड दिया जाए। किसी को भी देह व्यापार और वैश्यावृत्ति की अपनी दुष्प्रवृत्ति को ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ की आड़ में जारी रखने अथवा किसी के वैवाहिक जीवन में प्रवेश करके उसकी सच्चरित्र पत्नी को आंसू बहाने के लिए विवश करने के लिए छूट न दी जाए। योगी सरकार प्रदेश में ऐसा परिवेश बना सकी तो यह उसकी बड़ी उपलब्धि होगी।

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